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एन. रघुरामन का कॉलम:रिसायकिलिंग मास मार्केटिंग का शिकार हो गई थी, लेकिन अब विकिसित देशों में ‘अंतरात्मा से बिज़नेस’ की सोच के साथ बढ़ रही

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Money Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कुछ समय पहले मैंने एक अमेरिकी प्रदर्शनी का विज्ञापन देखा। उसमें लिखा था, ‘अनंत तक आपके साथः सहेजने, सुधारने, स्वस्थ रखने के बारे में प्रदर्शनी’। प्रदर्शनी को अच्छी प्रतिक्रिया मिली। मैंने बीबीसी का टीवी शो ‘रिपेयर शॉप’ भी देखा है, जिसके हर एपीसोड को 70 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा है। दोनों जगह कई विशेषज्ञ आपको टूटे सामान सुधारना सिखाते हैं। कईयों के लिए यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनी थी, खासतौर पर कोविड के दौर में।

दोनों जगहों से लोगों ने सीखा कि टूटी चीजों की ‘केयर’ का नया विचार कैसे विकसित करें। यह वास्तव में किसी चीज़ को सुधारने से जुड़ी सचेतनता के बारे में है, जो किसी थैरेपी की तरह है। इसे देखने वाले और प्रदर्शनी में जाने वाले कई लोगों ने सामान को दूसरा मौका देकर, फेंकना कम किया है। इससे बार-बार खरीदारी कम हुई है क्योंकि वे पुरानी चीजें सुधार रहे हैं। इस तरह उनके खर्चे कम हो रहे हैं।

संक्षेप में, उन्हें ‘मरम्मत’ (मेंडिंग) शब्द से प्यार है। मरम्मत के चलन को देखते हुए अमेरिका और यूरोप के कई स्टोर ने, स्टोर में ही ‘रिन्यूएबल हब’ शुरू किए हैं और वहां नियुक्त व्यक्ति को नया पदनाम दिया है, ‘कॉन्शंस ऑफ़िसर।’ कॉन्शंस यानी अंतरात्मा। यह ऑफिसर लोगों की हर चीज़ को रिस्टोर करने में मदद करता है, जिससे न सिर्फ पैसा बचता है, बल्कि धरती को भी कम कचरा झेलना पड़ता है।

उधर, किताबों की दुकानों पर भी ‘जॉयफ़ुल मेंडिंग’, ‘मेंडिंग मेटर्स’, ‘द आर्ट ऑफ़ रिपेयर’ और ‘मॉडर्न मेंडिंग’ जैसी किताबें खूब बिक रही हैं। अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ़ विकसित देशों और महंगे उत्पादों के साथ हो रहा है तो आपको जानकर हैरानी होगी कि नीबू के छिलके जैसी चीज से भी ऐसा हो सकता है। हर शहर में हमने जूस की दुकानों के बाहर नीबू के छिलके फैले देखें।

स्थानीय निकाय समय-समय पर सफाई करते हैं और कचरा फेंकने पर जुर्माना भी लेते हैं। अंततः छिलके कचरा भरावक्षेत्र में चले जाते हैं। लेकिन जब यह दृश्य सोशल वेंचर पार्टनर्स की लीड पार्टनर, पद्मश्री बलराम ने देखा तो उन्हें नीबू के छिलकों से बायो-एंजाइम्स बनाने का विचार आया। इसके लिए उन्होंने अमोघ ट्रस्ट की संस्थापक, जयश्री वैथीस्वरन से हाथ मिलाया। इस नए आइडिया ने कुछ दिव्यांग लोगों को आजीविका भी दी है।

बायो-एंजाइम्स का इस्तेमाल सफ़ाई में उपयोग होने वाले ऑर्गनिक सॉल्यूशन में होता है। इन्हें फल, गुड़ और पानी के ज़रिए किण्वन से बनाया जाता है। ये बायो-एंजाइम्स मच्छर भगाने की दवाओं में भी इस्तेमाल होते हैं। नीबू के फेंके गए छिल्कों को विभिन्न बाज़ारों से इकट्ठा किया जाता है, फिर छांटकर, साफ किया जाता है और सही अनुपात में गुड़ तथा पानी के साथ मिलाया जाता है।

छह महीने बाद इसमें से बायो-एंजाइम्स छानकर निकाल लिए जाते हैं और बोतल बंदकर ऑनलाइन बेचे जाते हैं। फिलहाल करीब आठ दिव्यांग छात्र, अन्य प्रोजेक्ट के साथ-साथ इस पर काम करके 7000-8000 रुपए प्रतिमाह कमा रहे हैं। दिलचस्प है कि, इससे दिव्यांग छात्रों को ज़िंदगी के कई कौशल सीखने मिल रहे हैं, जो उन्हें ज्यादा नतीजे देने वाला बना सकते हैं। पहले इन छात्रों को मुख्यधारा की नौकरियां दिलाने की कोशिश की जाती है। ऐसा न हो पाने पर उन्हें सोशल आंत्रप्रेन्योर बनाया जाता है।

फंडा यह है कि दुर्भाग्यवश, रिसायकिलिंग मास मार्केटिंग का शिकार हो गई थी, लेकिन अब कोविड के बाद के दौर में इसने वापसी की है और विकिसित देशों में ‘अंतरात्मा से बिज़नेस’ की सोच के साथ बढ़ रही है।