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एन. रघुरामन का कॉलम:जिस भागम-भाग वाले समय में हम रह रहे हैं, वहां चीजों को आसान बनाने की जरूरत है

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Money Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

ये मेरी गलती थी। इस बुधवार जब जोधपुर की प्लाइट रुकी तो जल्दबाजी में मैंने हाथ का लगेज उठाया और आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा, जैसे अरजेंट काम हो। मेरे आगे मौजूद एक यात्री आपत्ति जताते हुए गरजने लगे, ‘आपको लगता है कि आपके पास एपल लैपटॉप-आइफोन है, इसलिए आप शिक्षित हैं? पता होना चाहिए कि सार्वजनिक जगहों पर व्यवहार के कुछ कायदे हैं।

पीछे बैठा आदमी आगे आकर यात्रियों के निकलने का रास्ता ब्लॉक नहीं कर सकता, जिन्होंने आगे की उन सीट के लिए ज्यादा पैसे दिए हैं।’ वह लगातार बोले जा रहा था और ईगो हर्ट कर रहा था। मैंने समझाने की कोशिश की कि मेरे पास भी आगे की एक सीट थी और उसके लिए मैंने पैसा दिया था। पर ये कहते हुए मैं कॉन्फिडेंट नहीं था और शब्द साथ नहीं दे रहे थे। उसका बड़बड़ाना जारी रहा। तब एयर हॉस्टेस मेरे बचाव में आईं। उसके कान में कुछ कहा और वह तुरंत शांत हो गया और मुझे पहले जाने दिया।

मैं उनमें से हूं, जिसे कभी भी 30 मिनट में पिज्जा नहीं चाहिए। मेरी जिंदगी में ऐसे चंद क्षण होंगे, जहां मैं जल्दी में रहा हूंगा। मैंने इसी कॉलम में उन लोगों की आलोचना की है जो विमान रुकने से पहले अपनी सीट से खड़े हो जाते हैं। पर इस बुधवार मैंने वही किया, जिसके खिलाफ होता हूं। वो इसलिए क्योंकि जैसे ही विमान ने उड़ान भरी, मुझे मैसेज मिला कि 58 साल के मेरे कजिन ब्रदर-इन-लॉ का हार्ट अटैक से निधन हो गया है।

आकाश में ऊंचाई की ओर बढ़ते विमान में मैं कुछ नहीं कर सकता था, किसी से बात नहीं कर सकता था, ये सब कब-कैसे हुआ, नहीं जान सकता था। चंद सेंकड में ही मोबाइल कनेक्शन कट गया। आप सोच सकते हैं कि जीवन की सबसे बुरी खबर जानने के बावजूद दो घंटे से ज्यादा समय बिना कुछ जाने बिताना पड़े, तो उसका क्या हाल होगा। मैं कई वजहों से गुस्सा था।

न सिर्फ इसलिए कि खबर ऐसे समय मिली, जब मैं कुछ नहीं कर सकता था, पर इससे भी रोष था कि मेरे ब्रदर-इन-लॉ डॉक्टर थे, वो भी बेहद लोकप्रिय और सोशल मीडिया जैसे फेसबुक पर हजारों फॉलोअर्स थे। डॉ. तिरुमलईस्वामी थिरुनारायण सिद्ध मेडिसिन के विशेषज्ञ थे और कोविड से काफी पहले हजारों की मदद के कारण लोकप्रिय थे। कोविड में मदद ने लोकप्रियता और बढ़ा दी थी।

फिलहाल वह ताड़ पत्र पर लिखी सारी पांडुलिपियों के डिजिटलाइजेशन में व्यस्त थे, औषधि का यह ज्ञान आम लोगों को उपलब्ध नहीं है और इसलिए दक्षिण भारत में सारे मेडिकल प्रोफेशनल्स ने इसकी सराहना की थी और उसे पूरा करने में मदद की पेशकश की थी। मैं जिन डॉक्टर्स को जानता हूं, उनमें चंद असाधारण डॉक्टर्स में से वह एक थे।

‘सिद्ध’ को जो विशिष्ट पहचान की जरूरत थी, उसे आगे बढ़ाने वालों में वह प्रमुख थे, कोविड मरीजों पर सिद्ध के आश्चर्यजनक परिणामों पर कई मीटिंग्स में चर्चा हुई थी। मैं उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं पसंद करता था कि वे मेरे ब्रदर-इन-लॉ थे, बल्कि इसलिए क्योंकि वह सामाजिक चेतना-मानवीयता के लिए जाने जाते थे। वह हमेशा कई चीजों को वक्त से पहले पूरा करने की जल्दी में रहते थे।

स्वास्थ्य से जुड़ी कई समस्याएं होने के बावजूद वह यात्रा कर रहे थे और अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी कर रहे थे। उनके बारे में सोचते हुए मैंने फ्लाइट में कुछ नहीं खाया। एयर हॉस्टेस ने मेरी भीगी आंखें देख ली थीं। उसने मेरे मित्र के साथ सीट चेंज करा दी। मैं बाहर आने की जल्दी में था और जानना चाहता था कि ये सब कैसे हुआ और इस प्रक्रिया में खुद भी अधीर लोगों का हिस्सा बन गया। मैं धैर्य रखना और खुद को थोड़ा स्लो-डाउन करना भूल गया।

फंडा यह है कि दशकों से कहा जा रहा है कि चीजों को आसान बनाने की जरूरत है, पर जिस भागम-भाग वाले समय में हम रह रहे हैं, वहां यह और जरूरी हो जाता है।