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एन. रघुरामन का कॉलम:ड्यूटी से चंद कदम आगे बढ़कर काम करेंगे तो दुनिया वाहवाही करेगी

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Money Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

45 वर्षीय सुंदरी पलनीवेल मुंबई में लोगों के घरों में काम करती हैं और लंबे समय से कर्ज तले दबी थीं। उन्हें पता था कि बेटी की होने वाली शादी से और बोझ पड़ेगा। कई माता-पिताओं की तरह उन्होंने अपना सोना गिरवी रखने का तय किया। लोगों की नजरों से दूर 25 सालों में जोड़ा 117 ग्राम सोना ही उनकी इकलौती बचत थी। 13 जून को उन्होंने सोने को सफाई से एक पाउच में पैक किया और फिर उसे प्लास्टिक की थैली में डालकर सीने से चिपकाए काम पर चली गईं।

जब दोपहर के 2 बजे काम खत्म हुआ तो उस घर के मालिक ने उसे एक और प्लास्टिक की पॉलीथिन थमा दी, इसमें कुछ बड़ापाव रखे थे और कहा कि रास्ते में किसी गरीब, भिखारी या किसी जानवर को दे दे। हां में सिर हिलाकर उसने वो पॉलीथिन उसी थैली में रख ली और बैंक की ओर चल दी। रास्ते में उसे एक भिखारिन अपने बच्चों के साथ दिखी, उसे ये देखकर बुरा लगा।

उसका दिमाग उलझा हुआ था, तब भी बैंक जाने से पहले उसने वो बड़ावाप की थैली सौंपते हुए खाने की गुणवत्ता के बारे में आगाह कर दिया था। ठीक 15 मिनट बाद जब वह बैंक पहुंची तो देखा कि सोने वाला पाउच तो बड़ापाव के पैकेट के नीचे उसी थैली में रखा था, जो उसने उस भिखारिन के बच्चे को दे दी थी। उसे खोजने के लिए वो भागकर गई और वो वहां नहीं मिले।

उसे डर था कि मौके पर शोर-शराबा किया तो कोई भी सोना ढूंढकर चुरा सकता है, इसलिए वह सीधा पुलिस स्टेशन पहुंची और पूरा मामला बताया। 10 मिनट के अंदर पुलिस की टीम उस भिखारी महिला की तलाश में उस जगह पहुंची। ऑटोवालों और स्थानीय लोगों से पूछताछ के बाद पुलिस को भिखारी की लोकेशन पता करने में मदद मिली, जिसने कुछ महीनों पहले ही अपनी जगह बदली थी।

वे नई जगह पहुंचे और पता किया, उस तक पहुंचकर मालूम चला कि बड़ापाव रूखा था तो उसने वो थैली डस्टबिन में डाल दी थी। अब अधिकारियों के पास कोई सुराग नहीं था। पुलिस ने डस्टबिन के आसपास के फुटेज देखने के लिए लगभग चार सीसीटीवी खंगाले। पहले फुटेज में थैली दिखी तो पुलिस वालों ने वापस डस्टबिन को अच्छी तरह चैक किया। यहां थैली तो मिली लेकिन उसमें सोने का पाउच नहीं था।

फिर दूसरी फुटेज में देखा कि थैली हिल रही है, तब समझ आया कि गटर के चूहे उसे हिला रहे हैं। फिर शक उन चूहों पर गया और गटर खोलने के लिए मजदूरों को बुलाया गया। आखिरकार सोना मिल गया! करीब 12 घंटों के अंदर सुंदरी को वह लौटा दिया गया। ऐसा नहीं है कि सिर्फ पुलिस वालों को ही ऐसे काम करने के मौके मिलते हैं।

पुणे सिटी बस के ड्राइवर अरुण दसवाडकर और कंडक्टर नागनाथ ननवारे की संवेदनशीलता और नौकरी के परे जाकर उनके प्रयासों का उदाहरण देखें। इस बुधवार को रात के 11 बजे एक महिला और उसके बच्चे को उसके पति ने बस में बैठाया। आखिरी बस स्टॉप पर महिला का भाई उन्हें लेने आने वाला था, पर वो नहीं आया।

बस में ड्राइवर-कंडक्टर ने देखा कि 600 मीटर दूर उसकी कॉलोनी तक की पूरी सड़क सुनसान है, ऐसे में उन्होंने उतकर मदद मांगने की कोशिश की। ऐसा इसलिए क्योंकि पुणे में हाल ही में एक महिला बस यात्री के साथ ऐसी सुनसान सड़क पर हमला हो चुका है। वहां से गुजर रहे स्थानीय पूर्व कॉर्पोरेटर वसंत मोरे ने मदद की और अपनी कार से उन्हें उनके घर तक छोड़ा। जाहिर है कि दोनों कर्मचारियों को उनके प्रयासों के कारण अगले दिन सम्मानित किया गया।

फंडा यह है कि आप जिस भी पेशे में हों, अगर अपनी ड्यूटी से चंद कदम आगे बढ़कर काम करते हैं, तो फिर आपको चारों ओर से सराहना मिलती है।