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एन. रघुरामन का कॉलम:आप मूल्य-आधारित जीवन बिताएंगे तो समाज निश्चित इसे सराहेगा व मुश्किल घड़ी में आपकी मदद भी करेगा

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Money Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कल्पना करें कि आप भूखे हैं और काफी पहले फूड ऑर्डर कर देते हैं। 40 मिनट में डिलीवरी के वादे के बावजूद फूड 42वें मिनट में भी नहीं आता है। अब आपको थोड़ा-सा गुस्सा आने लगता है। तभी इंटरकॉम बजता है और वॉचमैन कहता है, डिलीवरी बॉय लॉबी में इंतजार कर रहा है, क्या आप नीचे आकर ले लेंगे? अब आपके गुस्से की सीमा ही नहीं रहती। आप पूछना भूल जाते हैं कि डिलीवरी पर्सन खुद ऊपर क्यों नहीं आ सकता?

तार्किक दिमाग सोचता है कि रेस्तरां ने तो डोर डिलीवरी की बात कही थी, लॉबी डिलीवरी की नहीं। आपका बच्चा आपको दुुखी देखकर खुद फूड पैकेट लेने लिफ्ट में चला जाता है। अब आपका पारा और चढ़ जाता है। आप रेस्तरां फोन लगाते हैं, पर फोन नहीं लगता। आप जोर से चिल्लाते हैं कि ऑर्डर प्लेस करते समय तो फोन कनेक्ट हो जाता है, लेकिन शिकायत दर्ज कराते समय नहीं। अब तक आपका बच्चा फूड लेकर आ जाता है।

वह टेबल पर पहले से रखी टिप उठाकर दौड़कर कॉरिडोर में जाता है और लिफ्ट का बटन दबाता है। आप भीतर से ही चिल्लाकर कहते हैं, वह टिप पाने योग्य नहीं है। बच्चा कहता है कि ‘चिल, मैं आकर समझाता हूं’, और नीचे चला जाता है। उसकी इस अचानक मैच्योरिटी से आप दंग रह जाते हैं। फिर आप भी दौड़कर बाहर जाते हैं, और यह देखने के लिए नीचे चले जाते हैं कि बच्चे ने ऐसा क्या देखा, जो वह इतना उदार हो गया है।

आप जो दृश्य देखते हैं, वह हैरान कर देता है! हां, डिलीवरी बॉय व्हीलचेयर पर था और बिल्डिंग की लिफ्ट में व्यवस्था नहीं थी कि व्हीलचेयर यूजर खुद उसे भीतर ले जाए। उसमें और ग्राउंड के बीच ऊंचाई का अंतर था। आप देखते हैं कि बच्चा डिलीवरी बॉय को गले लगाकर शुक्रिया कहता है। अगर आपको लग रहा है कि ये काल्पनिक कहानी है तो आपको पुणे जाकर जोमैटो से फूड ऑर्डर करना चाहिए।

हो सकता है कि इम्तियाज मुलानी आपके डिलीवरी बॉय हों, जो चल नहीं सकते, लेकिन इसके बावजूद वे जीवन की दौड़ में आगे हैं। 38 साल के मुलानी दिव्यांग हैं और डिलीवरी एजेंट के रूप में काम करते हैं। हाल ही में उनकी कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हुई। दस वर्षों तक उन्होंने चाइनीज रेस्तरां चलाया। 2015 में शरीर का निचला हिस्सा निष्क्रिय हो गया। यह बीमारी दस लाख में एक को होती है और अभी तक लाइलाज है।

उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया और उनका होटल बंद हो गया। सफल होटल बिजनेस से लेकर घर में बिना कुछ किए पड़े रहना बड़ा बदलाव था और यह उन्हें भीतर से खाने लगा। उनकी बहन घर पर मसाला व चाय पावडर बनाती थीं, वे उसे बेचने लगे। कुछ समय तक ये चला, लेकिन उस प्रोडक्ट का पहले से ही बड़ा स्थापित बाजार था। उनके पिता ने उस बिजनेस में उनकी मदद की, लेकिन पिता की मृत्यु के बाद यह भी बंद हो गया।

तब उन्होंने नियो मोशन का एक वीडियो देखा, जो दिव्यांगों के लिए कस्टमाइजेबल इलेक्ट्रिक व्हीकल्स बनाकर उन्हें नया जीवन देता है। इनकी कीमत 1.2 लाख रुपया है। उनके दोस्तों ने ये राशि जुटाने में उनकी हरसंभव मदद की। एक फाइनेंस कम्पनी ने ब्याज पर कर्ज देने का प्रस्ताव रखा। अब वे किस्तें चुकाने में सक्षम हैं।

फैमिली ने जज्बा देखकर उनका साथ दिया और उनके इन मूल्यों की सराहना की कि वे ‘अपने पैरों पर खड़ा होना चाहते हैं।’ दूसरों से तुलना करके आप कभी नहीं जान सकते कि आप सही ट्रैक पर हैं या नहीं, क्योंकि आप कभी दूसरा व्यक्ति नहीं बन सकते। इसलिए दूसरों से तुलना न करें, अपनी वैल्यूज को ही कसौटी बनाएं।

फंडा यह है कि अगर आप मूल्य-आधारित जीवन बिताएंगे तो समाज निश्चित इसे सराहेगा व मुश्किल घड़ी में आपकी मदद भी करेगा।