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मुकेश माथुर का कॉलम:आपत्तियां व सुझाव लागू करने के लिए 1000 करोड़ की संपत्ति स्वाह होने की नौबत क्यों आई?

2 महीने पहले
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मुकेश माथुर, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर, राजस्थान - Money Bhaskar
मुकेश माथुर, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर, राजस्थान

यह आलेख लिखने से पहले मैंने सम्पादकीय साथियों के विचार जाने। लिख लेने के बाद मैं उनसे अपनी कॉपी भी बतौर पत्रकार और पाठक दाेनों तरह से पढ़ने को कहूंगा। जितनी महत्वपूर्ण विशेषज्ञ की राय, उतनी ही उनकी, जिनके लिए वह काम किया जा रहा है। अग्निपथ अब कम्पलीट पैकेज है। बहुत कुछ नया जोड़ा जा रहा है। आयु सीमा बढ़ाना, गृह-रक्षा मंत्रालय में 10 प्रतिशत कोटा, राज्यों की नौकरियों में प्राथमिकता।

यहां तक कि उद्योगपति आनंद महेंद्रा और हर्ष गोयनका तक ने अग्निवीरों के लिए अवसर देने की घोषणा की है। अब यह योजना और चार साल बाद की नई सम्भावनाओं के हिसाब से पूरा विचार खारिज करने लायक तो बिल्कुल नहीं है। फोर्स ऑप्टिमाइजेशन, तकनीक को बढ़ावा देना और रक्षा बजट पर 25 प्रतिशत पेंशन खर्च के भार को नियंत्रित करने के दूरगामी लक्ष्य भी इससे सध रहे हैं।

सवाल है कि आपत्तियां और सुझाव लागू करने के लिए 1000 करोड़ की सार्वजनिक संपत्ति स्वाह होने की नौबत क्यों आई? दरअसल, हमें जादू नहीं सरकार चाहिए। टोपी से कबूतर निकालकर मत दिखाइए। अनिश्चितताओं से भरी जिंदगी वैसे ही रोज सरप्राइज देती है। ‘आज रात आठ बजे…’ की घोषणा से लेकर जीएसटी, किसान कानून और बड़े तबकों को प्रभावित करने वाली हर योजना का इतिहास यही है।

एक छोटी-सी कंपनी भी प्रोडक्ट बनाने से पहले उपभोक्ता के पास जाती है। उसकी जिंदगी, जरूरतें, रुझान जानती है। प्रोडक्ट का खाका दिखाकर पूछती है- बताएं, क्या जोड़ें-घटाएं? पैसा, समय, लॉजिस्टिक, ब्रांडिंग पर लगने वाली ऊर्जा के बावजूद लगातार बदलाव करती है। रतन टाटा ने अपने उत्तराधिकारी साइरस मिस्त्री को सलाह दी थी- जो भी फैसला लें उसे जनता की नजरों से गुजरना चाहिए।

जनता की नजर में ठीक है तो ही आगे बढ़ें। लेकिन आप हमारे सरकार हैं। कुछ भी लाकर माथे पर पटक देंगे। प्रतिक्रिया आएगी तो खारिज करने की मुद्रा में आ जाएंगे। कुतर्क करेंगे कि विपक्ष भड़का रहा है। खालिस्तान वाले मिले हुए हैं। अहंकार ऐसा कि थोपी हुई चीज में बदलाव करना या उसे वापस लेना आपको अपमान लगेगा।

वापस लेंगे भी तो ऐसे, जैसे कि आपका सर्वश्रेष्ठ आइडिया जनता समझ नहीं पाई! क्या अग्निपथ योजना का ड्राफ्ट बनाने से पहले उन युवाओं तक सरकार पहुंची थी जिनके लिए इसे बनाया है? इसके मूल विचार को पब्लिक डोमेन में डालकर सुझाव क्यों नहीं लिए? हम जानते ही हैं कि बिना सबको भरोसे में लिए अचानक लगा दिए गए लॉकडाउन के बाद पहली लहर में कुल 14 करोड़ लोग बेरोजगार हुए थे।

आरटीआई में सामने आया कि राजधानी दिल्ली में एलजी, सीएम और मुख्य सचिव तक को कोई पूर्व-जानकारी नहीं थी, विमर्श तो दूर की बात। असम, तेलंगाना के मुख्यमंत्री कार्यालय ने भी आरटीआई में यही बताया। किसान बिल पर किसान संगठनों से राय नहीं ली गई। जीएसटी लाने के बाद पहले माह में करीब 100 बदलाव करने पड़े और कुल मिलाकर 500 के करीब। कहीं ऐसा नहीं होता। ब्रिटिश सरकार जानती थी कि यूरोपीय संघ में बने रहने से नुकसान हो रहा है, फिर भी फैसला जनमत से लिया।

इसमें भी 48 प्रतिशत मत असहमति के पड़े तो साढ़े तीन साल लग गए ब्रेग्जिट लाने में। प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने लिखा- ‘मैं सभी की भावनाएं समझता हूं और बतौर सरकार ये हमारी खास तौर पर जिम्मेदारी है कि मैं इस देश को साथ लेकर चलूं और इसे आगे बढ़ाऊं।’ हमारा देश अब अग्निपथ पर बढ़ चुका है। जनता योजना को समझने की कोशिश कर रही है। क्या सरकार भी इस पथ पर आए कांटों से सबक सीखने को तैयार है?

क्या अग्निपथ योजना का ड्राफ्ट बनाने से पहले उन युवाओं तक सरकार पहुंची थी, जिनके लिए इसे बनाया गया है? इसके मूल विचार को पहले पब्लिक डोमेन में डालकर इस पर सुझाव क्यों नहीं लिए गए?