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मकरंद परांजपे का कॉलम:अगर किसी को पसंद न हो, तो वह भर्ती की अर्जी न दे, आंदोलन की क्या जरूरत है?

2 महीने पहले
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मकरंद परांजपे, जेएनयू में प्राध्यापक - Money Bhaskar
मकरंद परांजपे, जेएनयू में प्राध्यापक

जब सशस्त्र बलों में भर्ती के लिए सरकार की नई योजना अग्निपथ की बात आती है, तो आइए सबसे पहले तथ्यों पर विचार करें। भारत के पास दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी स्थायी सेना है, जिसमें लगभग 15.5 लाख कर्मी सक्रिय ड्यूटी पर हैं। हम चीन से पीछे हैं, जहां करीब 20 लाख सैनिक सक्रिय ड्यूटी पर हैं। हमारा 77 अरब डॉलर का रक्षा बजट भी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा है, अमेरिका के 801 अरब और चीन के ₹292 अरब डॉलर के बाद।

मगर इस विशाल राशि का बहुत बड़ा हिस्सा पेंशन, वेतन और रखरखाव पर खर्च होता है, न कि उपकरण, प्रौद्योगिकी, आयुध, रसद, बुनियादी ढांचे, और जो कुछ भी हमारे फाइटिंग-फिट रहने और अपनी सीमाओं की रक्षा करने के लिए आवश्यक है। अपने पड़ोसियों के रूप में दो भारी हथियारों से लैस शत्रु हमारे इर्द-गिर्द हैं, जो कि परमाणु शक्तियां भी हैं।

हमारे सामने बहुत अधिक खतरे की धारणा को देखते हुए वेतन और पेंशन पर इतना बड़ा खर्च- जैसा कि अतीत में विशेषज्ञों और रिपोर्टों द्वारा बार-बार बताया गया है- वास्तव में हमारे सामरिक या राष्ट्रीय हित में नहीं है। 2013-14 में पेंशन पर सेना का खर्च वेतन का 82.5% हिस्सा था। लेकिन 2020-21 तक पेंशन बिल वेतन पर भुगतान से 125% अधिक हो गया।

इसका मतलब यह है कि हम वास्तव में सेवानिवृत्त सैनिकों की पेंशन पर सेवा में सेनानियों की तुलना में अधिक खर्च कर रहे हैं। मानो इस विसंगति के पीछे छिपी असलियत को साबित करने के लिए ही अग्निपथ भर्ती योजना को वापस लेने की मांग को लेकर हिंसक आंदोलन देश में हो रहे हैं। रोजगार गारंटी और पेंशन देश के सशस्त्र बलों की सेवा करने की तुलना में हमारे युवाओं के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, ऐसा प्रतीत होता है।

कड़वी आर्थिक सच्चाई हमारे सामने है। सशस्त्र बल ठीक इसीलिए आकर्षक हैं, क्योंकि वे नौकरी की सुरक्षा और आजीवन पेंशन प्रदान करते हैं। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि आप सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करके राज्य को आपको रोजगार देने के लिए मजबूर करते हैं? या ऐसा जताते हैं कि यदि पेश किया गया रोजगार आपकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो तोड़फोड़ करके आप देश में आतंक मचा देंगे?

जाहिर है कि आंदोलन के पीछे सियासती ताकतें भी अपना भयानक देश विरोधी खेल खेल रही हैं। मगर इसका यह मतलब थोड़े ही है कि अग्निपथ योजना में ही खराबी है? अगर किसी को पसंद ना हो, तो वह भर्ती की अर्जी ना दे। इसमें आंदोलन की क्या आवश्यकता है? हमारे सशस्त्र बलों को प्रतिस्पर्धी बने रहना चाहिए, जिसके लिए केवल सर्वश्रेष्ठ को ही दीर्घकालिक या स्थायी कर्मचारी बनना चाहिए।

बाकी, जैसा कि नई योजना का प्रस्ताव है, अन्य रोजगार विकल्पों पर आगे बढ़ते हुए छोटी अवधि के लिए काम कर सकते हैं। अग्निपथ योजना सशस्त्र बलों में सेवा के साथ-साथ डिग्री अर्जित करने की संभावना प्रदान करती है। कई राज्य सरकारों ने पहले ही बलों में उनके कार्यकाल के बाद राज्य की नौकरियों में अग्निवीरों को प्राथमिकता देने की घोषणा की है।

अर्थात्, जब इस योजना के बारे में गलतफहमियों और गलत सूचनाओं को हटा दिया जाता है, तो इसका उन युवा भारतीयों के लिए आकर्षक दिखना निश्चित है, जो अपने व्यक्तित्व और चरित्र को विकसित करने के अवसरों के अलावा लाभकारी रोजगार की तलाश में हैं। अगर मुआवजे के पैकेज पर गौर किया जाए तो ‘अग्निवीर’ को पहले वर्ष में ₹4.76 लाख प्रति वर्ष का भुगतान किया जाएगा, जिसे सेवा के चौथे वर्ष में बढ़ाकर ₹6.92 लाख कर दिया जाएगा।

इसके अलावा, सभी स्वीकार्य भत्ते- जिनमें काफी लाभ होता है- भी दिए जाएंगे। आंदोलनकारियों को एकमुश्त छूट के रूप में ऊपरी आयु सीमा भी 21 से बढ़ाकर 23 कर दी गई है। 46,000 नई भर्तियों में से केवल 25% को ही रखा जाएगा। अन्य को 11-12 लाख रुपए के सेवा निधि पैकेज सहित आकर्षक निकास लाभ होंगे।

इन सभी तथ्यों और कारकों को ध्यान में रखते हुए, हमें ‘अग्निपथ’ योजना का एक शानदार प्रस्ताव के रूप में समर्थन करना चाहिए। राष्ट्र को इसे आजमाना चाहिए। हां, सुधार की जो भी गुंजाइश हो, उसे अवश्य लागू भी किया जा सकता है, मगर शुरुआत से ही नकारात्मक सोच रखना अच्छा नहीं है।

देश में अग्निपथ योजना पर हो रहे हिंसक आंदोलनों से तो यही प्रतीत होता है कि रोजगार गारंटी और पेंशन देश के सशस्त्र बलों की सेवा करने की तुलना में हमारे युवाओं के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)