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कावेरी बामजेई का कॉलम:बॉलीवुड के दिल में अचानक ही ऐतिहासिक कहानियों के लिए प्यार नहीं जगा

3 महीने पहले
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कावेरी बामजेई, पत्रकार और लेखिका - Money Bhaskar
कावेरी बामजेई, पत्रकार और लेखिका

क्या हो जब बॉलीवुड इतिहास के साथ छेड़छाड़ में जानबूझकर एक सहयोगी की भूमिका निभाने लगे? तब बॉलीवुड इसके लिए कवियों और लेखकों को दोषी ठहराने लगता है। लिहाजा, जब फिल्म पर आपत्ति ली जाती है तो संजय लीला भंसाली कह देते हैं कि यह मलिक मुहम्मद जायसी की कविता पद्मावत पर आधारित है।

अब चंद्रप्रकाश द्विवेदी कह रहे हैं कि सम्राट पृथ्वीराज चंदबरदाई के पृथ्वीराज रासो पर आधारित है और जो उनकी फिल्म में इतिहास खोजने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। उनके ही शब्दों का उपयोग करें तो ‘यह फिल्म तो राजनीति का अखाड़ा बन गई!’ जबकि स्वयं उन्होंने यह फिल्म जनता को दिखाने से पहले केंद्रीय गृहमंत्री और यूपी के सीएम को दिखाई थी।

बॉलीवुड में लम्बे समय से एक व्यक्ति का इतिहास दूसरे के लिए पोलिटिकल एजेंडा रहा है। और इसके कारण भी हैं। बॉलीवुड में इतिहास पर आधारित फिल्में अमूमन पटरी से उतरती ही रही हैं। शहजादा सलीम और कनीज अनारकली की प्रेमकथा को ही ले लें, जिसका कोई ऐतिहासिक संदर्भ नहीं है, सिवाय इसके कि लाहौर स्थित पंजाब सचिवालय में अनारकली की कब्र है। लेकिन इसके बावजूद के. आसिफ की मुगले-आजम एक बड़ी कामयाबी साबित हुई थी।

आशुतोष गोवारीकर की जोधा अकबर की ही अगर बात करें तो उसकी कहानी भी विवादों में रही है। लेकिन सम्राट पृथ्वीराज के मामले में अंतर यह है कि फिल्म के निर्माता ने स्वयं फिल्म का राजनीतिकरण करना चाहा है। फिल्म में यह दावा किया गया है कि वे 1947 से पहले देश के अंतिम हिंदू शासक थे। फिल्म के प्रोमो में भी यही प्रचारित किया गया। ऐसा करके दक्षिण के बेहतरीन हिंदू साम्राज्यों की उपेक्षा की गई है।

फिल्म के मुख्य अभिनेता ने यह दावा भी किया कि आज स्कूलों में गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है, जिसमें आक्रांताओं पर अधिक जोर दिया गया है, जबकि पृथ्वीराज के बारे में चंद ही पंक्तियां लिखी जाती हैं। यकीनन, बॉलीवुड के अभिनेता खुद इतिहासकार नहीं हैं और हमें उनकी बातों को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। बॉलीवुड के दिल में अचानक ही ऐतिहासिक कहानियों के लिए प्यार नहीं जग गया है।

आखिरकार, भारत में बनाई गई पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र पर ही थी, जो ऐतिहासिक नहीं तो पौराणिक चरित्र अवश्य हैं। इसे वर्ष 1913 में दादासाहेब फालके ने बनाया था। इतिहास आधारित फिल्में कभी भी आलोचना से परे नहीं थीं। अनारकली पर ही अनेक फिल्में बनाई जा चुकी हैं। इन्हीं में से एक फिल्म 1928 की थी, जिसमें रूबी मेयर्स उर्फ सुलोचना ने मुख्य भूमिका निभाई थी।

इसके प्रदर्शन पर मेंगलौर के डीएम ने पाबंदी लगा दी थी, क्योंकि उस साल वहां साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। जल्द ही फिल्म पर पूरे देश में रोक लगा दी गई। अगर आज के. आसिफ से अनारकली की प्रामाणिकता के बारे में पूछा जाता तो वो भी एक लेखक की ही शरण में जाते- इम्तियाज अली ताज, जिनके 1922 में लिखे गए नाटक पर मुगले-आजम आधारित थी। लेकिन द्विवेदी कह रहे हैं, अबुल फजल जो कह दें, फैजी जो कह दें, वो सही, चंदबरदाई कह दें तो गलत।

द्विवेदी यह संकेत करना चाह रहे हैं कि अकबरनामा- जो कि मुगल बादशाह की अधिकृत जीवनी है- के लेखक फैजी और चंदबरदाई के समकक्ष हैं, जबकि फैजी और चंदबरदाई दोनों ही इतिहासकार नहीं, राजकवि थे। उनका तर्क यह है कि या तो अबुल फजल और चंदबरदाई दोनों की कृतियों को इतिहास मानें या किसी को भी नहीं।

सच तो ये है कि अतीत इतना महत्वपूर्ण है कि इसे शौकिया इतिहासकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। शायद फिल्मकारों को शौर्य से जुड़ी कहानियां खोजने के लिए अतीत में जाने के बजाय वर्तमान पर ही केंद्रित होना चाहिए। इतिहासकारों को ही सच बताने का काम करने दें।

अतीत इतना महत्वपूर्ण है कि इसे शौकिया इतिहासकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। शायद फिल्मकारों को शौर्य से जुड़ी कहानियां खोजने के लिए अतीत में जाने के बजाय वर्तमान पर ही केंद्रित होना चाहिए।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)