पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:अपनी भूमि के उपकार को कभी भूलें नहीं, राम की तरह

2 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
पं. विजयशंकर मेहता - Money Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

राम दु:ख में तो संयमित रहते ही थे, अपनी खुशी को व्यक्त करने में भी बहुत संयम रखते थे। वनवास से लौटते हुए जब विमान में से अयोध्या-नगरी देखी तो जैसे उनकी खुशी फूट पड़ी। राम खुशी को मंजिल नहीं, मार्ग मानते थे, लेकिन यह खुशी का पहला इजहार था- ‘जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि। अति प्रिय मोहि इहां के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।।’

अर्थात्, ‘यह सुहावनी अयोध्या नगरी मेरी जन्मभूमि है, इसकी उत्तर दिशा में पवित्र सरयू बहती है, यहां के लोग मुझे बहुत प्रिय हैं, सचमुच यह नगरी सुख की राशि और मेरे परमधाम को देने वाली है।’ राम की वाणी सुन सारे वानर हर्षित हो गए, क्योंकि अपने प्रभु को इतना प्रसन्न उन्होंने कम ही देखा था। ठीक भी है, सुख के युग पल में बीत जाते हैं और दुख के पल भी युग जैसे लगते हैं।

राम ने अपने जीवन में सुख और दु:ख का अद्भुत संतुलन उतारा था। अपनी जन्मभूमि के प्रति उनकी जो निष्ठा थी, वह एक बात हमें भी सिखाती है कि भूमि से हमारा जो भी संबंध हो- जन्म का या कर्म का- जीवनभर उसके उपकार को भूलना नहीं चाहिए। जहां भी हमारा जन्म हुआ हो, जहां शिक्षा ली हो, जहां कर्म किए हों, इन तीन स्थानों को जब लौटाने की बारी आए तो जैसे राम अपनी प्रसन्नता लौटा रहे थे, निष्ठा प्रदर्शित कर रहे थे, हमें भी इनके प्रति ऐसा ही भाव रखना चाहिए।