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अभय कुमार दुबे का कॉलम:क्या भाजपा के लिए शिव सेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे की स्थिति ओटीपी जैसी है?

2 महीने पहले
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अभय कुमार दुबे, अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर - Money Bhaskar
अभय कुमार दुबे, अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर

महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट पर टिप्पणी करते हुए निजी बातचीत में एक पत्रकार ने मुझसे कहा कि इस प्रकरण में भाजपा के लिए शिव सेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे की स्थिति ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) जैसी है। उनका मतलब था कि भाजपा जब शिंदे का इस्तेमाल बाल ठाकरे की विरासत को खत्म करने के लिए कर चुकेगी तो यह पासवर्ड अपने आप खारिज हो जाएगा।

यानी शायद शिंदे की स्वतंत्र राजनीति का कोई भविष्य नहीं है- उनकी भूमिका उद्धव ठाकरे के सांगठनिक और सत्तामूलक वर्तमान का पटाक्षेप करने तक ही है। वैसे में सवाल यह है कि अगर बाल ठाकरे की विरासत को भाजपा निगल लेती है तो क्या होगा? ध्यान रहे कि बाल ठाकरे ने हिंदुत्व की पैरोकारी करने के बावजूद खुद को और अपनी पार्टी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की अनुकृति नहीं बनने दिया था।

वे हिंदुत्व की एक ऐसी अति-आक्रामक किस्म की नुमाइंदगी करते थे, जिसके पास हिंदू एकता के भिन्न तरीके थे। ठाकरे की शैली से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा तीस साल तक साथ में गठबंधन चलाने के बावजूद कभी सहज नहीं हो पाए थे। शिव सेना के सेनापति के पास भी भाजपा की भर्त्सना के लिए कई चुनिंदा शब्द हुआ करते थे। भाजपा उनके लांछनों के मुकाबले चुप रहकर गठजोड़ चलाती रहती थी।

कहना न होगा कि देश में भाजपा और शिव सेना के अलावा भी हिंदुत्व के कुछ और संस्करण सक्रिय हैं। दिल्ली में आज तक सावरकर की हिंदू महासभा का दफ्तर है। स्वामी करपात्री की रामराज्य परिषद का कार्यालय भी तलाशने से मिल जाएगा। कर्नाटक में राम सेना भी एक अलग तरह के हिंदुत्व की पैरोकारी करती है। लेकिन जाहिर है कि ये संगठन प्रभावी नहीं हैं।

इसलिए अगर भाजपा शिव सेना के वजूद को नाममात्र का बनाने में कामयाब हो जाती है तो देश में एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छाप वाला ही हिंदुत्ववादी ब्रांड रह जाएगा। बंबई के एक अंग्रेजी अखबार में कार्टूनिस्ट रहे बाल ठाकरे की मान्यता थी कि ‘शिव सेना मेरा परिवार है और यहां परिवार नियोजन लागू है। ज्यादा नेताओं की जरूरत नहीं है।’ जाहिर है ‘वन मैन शो’ के उसूल पर चलते हुए उन्होंने संगठन का ढांचा बहुत सोची-समझी योजना के तहत तैयार न करके जरूरत के मुताबिक किश्तों में बनाया।

जिस तरह की ‘कल्याणकारी हुक्मशाही’ ठाकरे पूरे देश में चाहते थे, शिव सेना को उन्होंने उसी का नमूना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विभिन्न निर्णयों और नीति-निर्धारण का एकमात्र स्रोत ठाकरे की शख्सियत ही थी। यह सही है कि शुरुआत में शिव सेना का संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तर्ज पर विकसित होने की संभावनाओं से भरा था। 31 अक्टूबर 1966 को बाल ठाकरे ने अपनी पहली ‘अभूतपूर्व’ सभा में अपनी ताकत का एहसास कर लिया था।

अगर यह सभा इतनी सफल नहीं रही होती तो शायद ठाकरे का यह संगठन कुछ निजी मित्रों का क्लब बनकर रह जाता। ठाकरे को जैसे ही किसी इलाके में सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से सक्रिय किसी व्यक्ति की जानकारी मिलती, वे फौरन उससे सम्पर्क करते और उससे अपने यहां शिव सेना की शाखा खोलने का अनुरोध करते। शाखाएं बनाने के विचार के पीछे संघ का ही मॉडल था, लेकिन ठाकरे यह निश्चित नहीं कर पा रहे थे कि शाखाओं के नियम क्या होने चाहिए और उनमें भाग लेने वाले लोगों को क्या गतिविधियां करनी चाहिए।

1968 के नगर निगम चुनावों में भाग लेने से पहले ठाकरे के दिमाग में शाखाओं के कार्यभार के तर्कसंगत वितरण और विस्तार की योजना उभरी, ताकि चुनावी काम करने के लिए ज्यादा से ज्यादा वार्डों को सेना के दायरे में लाया जा सके। एक शाखा को एक वार्ड का जिम्मा सौंपा गया। अगर किसी इलाके में दो शाखाएं थीं तो दूसरी शाखा को बगल के वार्ड की जिम्मेदारी दी गई। तय किया गया कि अगर किसी वार्ड में कोई शाखा न हो तो बगल के वार्ड के लोग स्थानीय शक्तियों की मदद से वहां शाखा स्थापित करें।

चूंकि शाखाओं की स्थापना की यह मुहिम चुनाव से ठीक पहले चलाई जा रही थी, इसलिए नई शाखाओं को तुरंत सक्रिय होने का आधार भी मिल गया। निगम चुनावों में शिव सेना की शानदार जीत ने संगठन की इस शैली को जमा दिया। चुनाव की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ने के कारण शिव सेना के संगठन का यह स्वाभाविक स्वरूप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अलग होता चला गया। शाखाओं में होने वाला कामकाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भांति अर्ध फौजी प्रशिक्षण देने के बजाय स्थानीय समस्याओं के आसपास केंद्रित हो गया।

दिलचस्प बात यह थी कि कालांतर में शिव सेना एक ऐसे संगठन के तौर पर विकसित होती चली गई, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भांति शाखा-आधारित भी था, भाजपा की तरह चुनाव भी लड़ता था और राजनीतिक तिकड़में भी करता था। लेकिन चूंकि उसकी महात्वाकांक्षाओं के केंद्र में ‘मराठी माणूस’ ही था, इसलिए उसका प्रभाव-क्षेत्र सीमित होने के लिए अभिशप्त हो गया।

भाजपा ने शिव सेना से निकले नारायण राणे को अपने में मिलाकर कोंकण में अपना विस्तार किया। शिव सेना के ही एक अन्य नेता के जरिए विदर्भ में पांव जमा लिए। शिंदे के माध्यम से वह ठाणे को अपने दायरे में ले लेगी। रह गई मुंबई तो उद्धव के नेतृत्व की साख गिरते ही मुंबई भी उसके हाथ में आ जाएगी। जिस महाराष्ट्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्म 97 साल पहले हुआ था, तब उसके ऊपर पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एकछत्र प्रभाव होगा।

संघ के मॉडल पर बनी पार्टी
शिव सेना एक ऐसे संगठन के तौर पर विकसित होती चली गई थी, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भांति शाखा-आधारित भी था, भाजपा की तरह चुनाव भी लड़ता था और राजनीतिक तिकड़में भी करता था। लेकिन चूंकि उसकी महात्वाकांक्षाओं के केंद्र में ‘मराठी माणूस’ ही था, इसलिए उसका प्रभाव-क्षेत्र सीमित होने के लिए अभिशप्त हो गया था।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)