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    पश्चिमी वर्चस्व और उससे भारत को मिलती चुनौतियां

    पश्चिमी वर्चस्व और उससे भारत को मिलती चुनौतियां
    बाली में आयोजित नौवां मंत्रिस्तरीय सम्मेलन को संपन्न हुए काफी समय बीत चुका है लेकिन यह सम्मेलन आज भी पश्चिमी वर्चस्व को भारतीय चुनौती के रूप में याद रखा जा रहा है। यह सम्मेलन एक प्रकार की रोलर कोस्टर सवारी साबित हुई।
     
    व्यक्तिगत रूप से इसमें शामिल होने से सूक्ष्म और प्रत्यक्ष बदलाव का आभास हुआ। कानकून, जहां भारत को एक तरीके से धमकाया गया, यहां अक्सर फैसले बड़े देशों की ओर से आते थे। हांगकांग में भारत ने खुद को विकासशील देशों के मुखिया के रूप में खुद को पेश किया। पिछले कई सालों से भारत को वैश्विक मंच पर विशेष दर्जा मिलता आया है। जिन नियमों को विकसित देशों ने फिक्स कर दिया है, उसे समझने की कोशिश जारी है, यहां गेंद भी उन्हीं के पाले में है। बाली ने यह दिखाया कि भारत यह खेल वैसे ही खेलने का माद्दा रखता है, जैसे कि विकसित देश खेलते हैं और उन्हें हरा भी सकता है।
     
    भारत ने बाली में उस समझौते को लाने में अहम रोल निभाया जिसकी वजह से दुनिया को फायदा हो सकता है। नुसादुआ में पहुंचने के बाद भारत का महत्व और इसकी भूमिका सामने आई, जहां पर इंडोनेशिया के प्रतिनिधिमंडल से पहली मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि हर किसी को भारत के व्यापार मंत्री के वक्तव्य का इंतजार था, जिसपर मंत्रियों का विश्वास निर्भर था और आगे चलकर डब्ल्यूटीओ का विश्वास भी। यह अटकलें प्रारंभिक मुलाकात में ही व्यापार निकायों और संगठनों की बात से पता चल रहा था। शुरुआती कार्यक्रम में सब की निगाहें हमारे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पर टिकीं थीं। इसकी बजाय कि भारत की स्थिति स्पष्ट हो, ज्यादातर देशों के प्रतिनिधिमंडल खास कर विकसित अर्थव्यवस्था का एक प्रतिनिधि यह चाहता था कि 159 देशों के संबोधन में साथियों के दबाव पर हमारे मंत्री अपना लहजा जरा नरम रखेंगे।
     
    खेती के मामले में हमारे वाणिज्य मंत्रालय ने कहा कि इससे लाखों किसानों की जीविका चलती है, उनके हितों की सुरक्षा होनी चाहिए। दुनियाभर के अरबों लोगों की भी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। भारत में खाद्य सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। साल 1986-88 के मूल्य आधार दर पर अभी भी पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन प्रोग्राम्स के आधार पर फूड सब्सिडी निर्धारित की जाती है, इसे जल्द से जल्द समाप्त किया जाना चाहिए। बाली में सभी देशों की निगाहें भारत के फैसले पर टिकी थीं कि वह शुरू आती परिणामों पर क्या प्रतिक्रिया देता है। भारत ने व्यापार के सरलीकरण पर जोर दिया।
     
    यह जरूरी है। मंत्री ने घोषणा की कि संतुलित परिणाम के लिए भारत समझौते के लिए अपना समर्थन देगा। हालांकि इस सौदेबाजी का कुछ ही हिस्सा हमारे पास था, जिससे विकसित देशों को हम अपनी स्थिति का एहसास करा सकें। मंत्री का संक्षिप्त भाषण दृढ़ संकल्प और सिद्धांतों के इर्द-गिर्द था। उन्होंने कहा कि यदि भारत से कहा जाता है कि वह निर्वाह किसानों और लाखों भूखे लोगों के खाद्य सुरक्षा से समझौता करने को कहा जाता है तो हमारा उत्तर 'ना' होगा, इस पर 3000 सशक्त श्रोताओं में कानाफूसी सी शुरू हो गई। इसके साथ ही आक्रामक दबाव की रणनीति शुरू हो गई, जो विकसित देशों की पूर्व कल्पित एवं सामरिक प्रतिक्रिया थी। वे इस खेल के पुराने एवं मंझे खिलाड़ी थे।
     
    इसी के परिप्रेक्ष्य में हमारे रणनीतिकार और मंत्री ने असाधारण भूमिका निभाई। विकसित देशों के हमारे समकक्ष संगठनों की ओर से हम पर काफी दबाव था। उनका कहना था कि व्यापार सरलीकरण बेहतर विकल्प है और इसके बाद हम अपनी सरकारों पर इसके सहयोग के लिए दबाव डाल सकते हैं। हालांकि हमारा जवाब था कि हम अपने एजेंडे के अनुसार टिकाऊ और समेकित विकास पर ध्यान दे रहे हैं।
     
    सीआईआई में हमने इसे विकास की आधारशिला माना है। जब तक कि खाद्य सुरक्षा जैसे शांतिपूर्ण वातावरण नहीं बन जाता, व्यापारिक वातावरण तैयार नहीं किया जा सकेगा। दूसरे दिन, सीआईआई ने विकसित देश के हमारे समकक्षों के साथ हमारा सेशन रखा था। शुरू में मैंने सभी संदर्भित मुद्दों को रखा, धीरे-धीरे बहस खाद्य सुरक्षा बिल मुद्दे की ओर बढ़ा।
     
    विकसित देशों के संगठनों के ज्यादातर प्रतिनिधि सवालों की वर्षा करने लगे कि क्या भारतीय उद्योग में यह बताने की हिम्मत नहीं है कि बाली मंत्रिस्तरीय बैठक सफल नहीं होती तो ट्रेड और इंडस्ट्री को काफी हानि हो सकती है? एक प्रतिनिधि ने कहा, यदि बाली वार्ता फेल हो जाती है तो उनके देशों से भारत में निवेश बंद हो जाएंगे। यहां पर यह महत्वपूर्ण है कि हम व्यक्तिगत रुचियों से ऊपर उठकर देश के प्रतिनिधि के रूप में यहां आए हैं। हमने इस पर विचार नहीं किया कि भारत में फुड सिक्योरिटी के राजनीतिक मायने हैं।
     
    मौके पर दूसरे देशों से आवश्यकता से अधिक लोग आए थे। अफ्रीकी देशों के साथ हमारे मंत्रियों के व्यक्तिगत परिचय और व्यापक राजनीतिक वार्ता ने सदस्य देशों के बीच उत्प्रेरक का काम किया। इसी बीच एक महत्वपूर्ण घटना घटी, जब मंत्री ने बयान दिया कि डब्ल्यूटीओ को बनाए रखने के लिए हम भूखी जनता और निर्वाह किसानों के अधिकारों से समझौता नहीं कर सकते।
    दूसरी बात उन्होंने कही कि डब्ल्यूटीओ के सदस्यों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए, यह भारत का मसला नहीं है बल्कि कई देशों से जुड़ा है। उन्होंने बहुआयामी सिस्टम और डब्ल्यूटीओ के प्रति विश्वास में अपनी प्रतिबद्धता जताई। इससे बड़ा बदलाव हुआ। हमारे वार्ताकारों ने रातभर नींद खराब करके काफी मेहनत की।
     
    उन चारों दिनों में यहां तक कि मंत्री भी बड़ी मुश्किल से सो सके। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि काफी मेहनत करके हमारे मंत्री और वार्ताकारों ने जनहित सुरक्षा का खाका तैयार किया। इस दौरान भारतीय वार्ताकारों और विदेशी वार्ताकारों ने अपनी अपनी चालें चली। वास्तविकता यह है कि डब्ल्यूटीओ जैसी सम्मेलनों में छोटे और अल्पविकसित देश अपना मंतव्य दबाव के कारण व्यक्त नहीं कर सकते।
     
    यहां पर हमारे मंत्री ने 25 देशों को भारत के पक्ष में लाने का महत्वपूर्ण काम किया। इसकी वजह से पिछले 19 सालों में पहली बार ऐसे महत्वपूर्ण समझौते हुए। बाहर से देखकर खामियां निकालना आसान है, लेकिन जटिल बहुस्तरीय मसलों पर आम सहमति बनाना आसान नहीं होता। इसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय, मीडिया, निगरानी और सिक्योरिटी के बीच केवल सूझ-बूझ और कूटनीतिक चालों के जरिए ही प्राप्त किया जा सकता है।

    लेखक हाईटेक गियर लि.के अध्‍यक्ष और ग्‍लोबल मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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