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गलत नीतियां छोड़ें बहुराष्ट्रीय कंपनियां

जेरी डेविस

May 18,2013 01:08:00 AM IST

वैश्वीकरण दुनिया के हर कोने में जहां भी है वहीं पर उसके साथ कुछ विरोधाभास जुड़े हैं। अभी पिछले महीने बांग्लादेश में एक इमारत ढह जाने से लगभग ग्यारह सौ लोगों की मौत हो गई। ये लोग इस इमारत में एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करते थे।

इन मौतों से पता चलता है कि ये लोग अपनी जान की कीमत पर दुनिया के लिए सस्ती टी-शर्ट उपलब्ध करा रहे थे। ज्यादातर ग्राहक जो बाजार से सामान नहीं खरीदते हैं वे सीधे उसे बनाने वालों से नहीं जुड़े होते हैं इसलिए उन्हें यह नहीं पता होता है कि जिस सामान को हम सस्ता मानकर खरीद रहे हैं उसे तैयार करने में किसने क्या कीमत चुकाई है।

आज इंटरनेट की दुनिया है और ग्राहक चाहे तो यह इस बात का पता लगा सकते हैं कि कहां क्या हो रहा है। लेकिन बांग्लादेश में जिस तरह से यह हादसा हुआ है उससे पता चलता है कि लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि उत्पादन करने वाले संस्थानों की हालत कितनी बुरी है।

गारमेंट उद्योग अभी भी पारंपरिक तरीके से काम कर रहा है जबकि इसे वैश्वीकरण से जोड़ दिया गया है। दुनियाभर के बड़े ब्रांड जैसे नाइकी आदि अपने उत्पादों का निर्माण इसी तरह से करते हैं। दुनिया भर के ये बड़े ब्रांड अपने सामानों का उत्पादन एशिया जैसी सस्ती जगहों पर ही करते हैं।

पिछली पीढ़ी में लगभग हर उद्योग का नाइकीकरण हुआ है। बात चाहे इलेक्ट्रानिक सामानों की हो, दवा की हो या फिर दूसरी चीजों की हो, लगभग सारी कंपनियों ने नाइकी का ही फंडा अपनाया है। इनके पास वैश्विक स्तर की उत्पादन और बिक्री चेन है। इन कंपनियों के दुनियाभर में लाखों प्रोडक्ट नियमित रूप से बेचे जाते हैं।

खास बात यह है कि इन प्रोडक्ट पर भले की कंपनी का लेबल लगा हो लेकिन कंपनी का कोई कर्मचारी तक इन्हें हाथ से छूता तक नहीं है। ये बाहर से बनकर आते हैं और कंपनी का लेबल लगाकर इन्हें बाजार में उतार दिया जाता है। हालांकि कुछ कंपनियां इस तरह का माहौल बदलने के लिए कदम उठाती हैं लेकिन ये केवल अपवाद स्वरूप ही है।

आमतौर पर ऐसा नहीं किया जाता है और इसके लिए कोई कानूनी बाध्यता भी नहीं है। हालांकि जब से सभी क्षेत्रों का नाइकीफिकेशन हुआ है तब से सभी कंपनियां एक जैसे तरीके से ही काम करती हैं। लेकिन आज के इंटरनेट के युग में आप आसानी से यह जान सकते हैं कि जिस कंपनी का जो उत्पाद आपने खरीदा है वह कहां बना है।

अमेरिकी की कई नामी गिरामी कंपनियों के उत्पाद चीन की बहुत छोटी इकाइयों में बनते हैं। हालांकि जिस नाइकीफिकेशन के कारण दुनिया में यह प्रथा शुरू हुई उसी नाइकीफिकेशन के माध्यम से इसका हल भी ढूंढ़ाजा सकता है। आज टेक्नोलॉजी ने यह बहुत आसान कर दिया है कि आप किसी भी उत्पाद को शुरू से लेकर उसे खरीदने तक ट्रैक कर सकते हैं।

दिक्कत की बात ये है कि दुनिया में आर्ट जैसे कुछ ही मुद्दे हैं जिनके बारे में लोग ये जानने की कोशिश करते हैं कि मौलिकता कितनी है। उदाहरण के लिए अगर आप कोई पेंटिग्स खरीदते हैं तो ये जरूर जानते हैं कि यह वास्तव में उसी कलाकार द्वारा बनाई गई है या नहीं जिसके नाम से बेची जा रही है। लेकिन दूसरे उत्पादों के मामले में लोगों में यह जागरूकता नहीं दिखती है।

अब अनेक ऐसे एप्स आ गए हैं जिनसे बारकोड और दूसरे संकेतों के माध्यम से चीजों को ट्रैक किया जा सकता है। यही नहीं अब ये टेक्नोलॉजी न केवल सबके पास बल्कि सस्ती भी हो रही हैं। अब यह भी पता लगाया जा सकता है कि इस चीज के उत्पादन में किसी नियम का उल्लंघन तो नहीं किया गया है। अब मैट्रिक्स बारकोड को सेलफोन से भी स्कैन किया जा सकता है।

हालांकि ये बात सही है कि अब कंपनियों के व्यवहार में कुछ परिवर्तन आया है लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि यह व्यवहार अब देशों के स्तर तक जा चुका है। जिस तरह के तरीके कंपनियां अपने उत्पादों को बेचने के लिए अपनाती हैं वैसे ही तरीके दुनिया के कई देश निर्माताओं को अपने यहां आकर्षित करने के लिए अपनाते हैं ताकि नौकरियां सृजित की जा सके।

यह व्यवहार गरीब देशों में विशेष रूप से देखा जाता है जैसे कंबोडिया, होंडुरास, पाकिस्तान और इंडोनेशिया आदि। इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि इस तरह का कोई भी प्रयास कभी भी मजदूरों के पक्ष में नहीं रहा है। यह केवल बांग्लादेश की बात नहीं है बल्कि उत्पादन कर्ता देश हमेशा ही श्रमिकों के हितों के विरोधी रहे हैं।

एक सवाल यह उठता है कि आखिरकार अमेरिका के उद्यमी दूर के देशों में निवेश क्यों करते हैं? जब कोई पोलो की शर्ट खरीदता है तो क्या वह उसके पीछे की कहानी जानने की कोशिश करता है। दरअसल बात यह है कि इन गरीब देशों को निवेश की जरूरत है और कंपनियों को ऐसे बाजार की जरूरत है जहां सस्ते में काम हो सके ताकि बाजार में अपने उत्पादों की लागत को कम किया जा सके।

ये कंपनियां इन उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में कानूनों और नियमों को भी तोड़ मरोड़ लेती हैं। जहां तक उपभोक्ताओं की बात है तो कोई भी देश या कंपनी बॉटम में काम करने वाले लोगों की परवाह नहीं करती है। सबको इस बात की परवाह रहती है कि किसी भी तरह से उपभोक्ता को खुश किया जा सके।

फिर वह चाहे श्रमिकों का शोषण करके सस्ते में उत्पाद उपलब्ध कराने की ही बात क्यों ना हो। जहां तक कंपनियों द्वारा लोगों को शोषण की बात है तो इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि उपभोक्ताओं में जागरुकता का अभाव है। और यह अभाव ही इस क्षेत्र में सुधार के कदमों को रोक रहा है। कंपनियों और सरकारों को मजबूरी में श्रमिकों के हितों में कदम उठाने पड़ेंगे अगर उपभोक्ता उस उत्पाद को खरीदे जिसमें व्यापार के नियमों का पालन किया गया हो।

अगर उपभोक्ता ऐसे स्थानों के उत्पादों का बहिष्कार करने लगे जहां पर शोषण होता है तो फिर निश्चित ही इन कंपनियों को अपना रवैया बदलना पड़ेगा। लोगों को बांग्लादेश के बजाय उन देशों के उत्पाद की खरीद को प्राथमिकता देनी चाहिए जहां श्रमिकों का शोषण ना किया गया हो। लेकिन इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरत उपभोक्ताओं को जागरुक होने की है।

जेरी डेविस
लेखक मिशिगन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। व्यापार में गलत नीतियों पर उनका यह लेख

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