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    महाशक्तियों के जमघट में चीन पर टिकी हैं सबकी नजरें

    महाशक्तियों के जमघट में चीन पर टिकी हैं सबकी नजरें
    अमेरिका-चीन दुनिया की दो महाशक्तियों के आर्थिक मोर्चे पर परस्पर निर्भरता के खत्‍म हो रहे दौर पर एक बार फिर सबकी नजरें चीन पर हैं। वर्ष 2014 की शुरुआत में उभरते बाजार टूटते दिखे हैं। चीन को लेकर गुस्सा होने की कई बड़ी वजहें हैं। निश्चित रूप से फेडरल रिजर्व की टैपरिंग (बांड खरीद कार्यक्रम में कटौती) भी बाजारों को दिशा देने की एक वजह रही है। इससे वैश्विक पूंजी प्रवाह पर बहुत ज्यादा निर्भर हो चुकी उभरती अर्थव्यवस्थाओं (जैसे भारत, इंडोनेशिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और टर्की) को अपनी आर्थिक वृद्धि की फंडिंग के लिए जरूरी रकम हासिल करना मुश्किल हो गया है। हालांकि, उनके लिए चीन का डर भी कम नहीं है।
     
    चीनी अर्थव्यवस्था में आ रही मुश्किलों को लेकर दीर्घकालिक चिंताएं फिर से गहराने लगी हैं।चीन यदि विफल होता है तो इसकी गूंज उभरते बाजारों तक पहुंचेगी और बाकी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी तत्काल इसका असर देखने को मिलेगा। हालांकि चीन 1990 के दशक के अंत में क्षेत्रीय संकट के दौरान एशिया की सबसे टिकाऊ अर्थव्यवस्था रहा है और आज भी उतना ही कठोर साबित हो सकता है। यह ठीक है कि चीनी अर्थव्यवस्था अब सुस्त पड़ रही है, लेकिन ग्रोथ में इस कमी को सही तरीके से समझा नहीं गया है। चीन की यह सुस्ती वास्तव में स्वागत योग्य है। चीन के लिए न तो यह वांछित है और न ही संभव है कि 10 फीसदी की आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर हमेशा चला जा सके जो उसने लगातार तीन दशकों में हासिल किया था।
     
    चीन के जीडीपी ग्रोथ के शीर्ष स्तर के बारे में एक सतही स्थायी भाव मान लिया गया है-चीन 10 फीसदी की वृद्धि करने वाला ऐसा ग्रोथ इंजन है जो अब 7 से 8 फीसदी के दौर में पहुंच गया है और आधुनिक दुनिया के तीव्र विकास गाथा के दौर में यह 25 फीसदी की गिरावट कही जाएगी। बिना सोचे-समझे की गई इस प्रतिक्रिया में यह मान लिया जाता है कि यह गिरावट ग्रोथ के मामले में और निराशा मिल सकने का पूर्व संकेत है।
     
    खासकर, चीन के बारे में तमाम तरह की विनाशकारी खबरों की लंबी आशंकाओं के बीच जिनमें सामाजिक अशांति से लेकर पर्यावरण विनाश, हाउसिंग बबल और बैंकों के ढहने का खतरा शामिल है। इन चिंताओं को एक सिरे से खारिज तो नहीं किया जा सकता, लेकिन मौजूदा सुस्ती की वजह ये बिल्कुल नहीं हैं।
     
    यह असल में लंबे समय से प्रतीक्षित चीनी अर्थव्यवस्था के पुनर्संतुलन प्रयासों की वजह से है, जो अब निर्यात और निवेश द्वारा प्रेरित ग्रोथ (गतिशील मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर) से ज्यादा टिकाऊ उपभोक्ता खर्च और सेवाओं पर ज्यादा निर्भर मॉडल की तरफ बढ़ रहा है। वास्तव में चीन का सेवा क्षेत्र सालाना स्तर पर चीनी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सेक्टर बन गया है और इसकी हिस्सेदारी मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण के योग से भी ज्यादा है।
     
    पिछले 30 वर्ष में लंबे समय से खासकर अमेरिका, चीन की आर्थिक वृद्धि पर निर्भर रहा है और इस वजह से ही दुनिया अब उसकी धीमी गति के लिए तैयार नहीं है जो कि उपभोक्ता और सेवा आधारित ग्रोथ की वजह से होना स्वाभाविक है। यह मेरी नई किताब अनबैलेंस्ड: द को- इनडिपेन्डेंसी ऑफ अमेरिका एंड चीन का बुनियादी थीम है।
     
    परस्पर निर्भरता निश्चित रूप से मानवीय रिश्ते का मनोवैज्ञानिक लक्षण है, जहां जरूरत या सुविधा के मुताबिक दो पार्टनर एक-दूसरे से सहयोग करते हैं। अंतत: इसकी वजह से व्यक्तिगत पहचान खत्म हो जाती है और इसके बाद टकराव और आखिरकार अलगाव की प्रक्रिया आ जाती है-जब तक एक या दोनों साझेदार एक दूसरे पर ज्यादा निर्भर न हों और अपने पैरों पर न खड़े हो जाएं। मेरा मानना यह है कि चीन और अमेरिका दोनों की आर्थिक हालत एक जैसी है। चीन में निर्यात आधारित वृद्धि का चमत्कार को असाधारण सफलता नहीं मिल पाती, यदि अमेरिकी उपभोक्ताओं की तरफ से अतिरिक्त बाहरी मांग नहीं आती।
     
    चीन अपने निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिहाज से अपने  करेंसी को टिकाए रखने के लिए अमेरिकी डॉलर पर बहुत ज्यादा निर्भर था। दूसरी तरफ, अमेरिका चीन से खूब सस्ते माल मंगाता रहा ताकि दबाव का सामना कर रहे और तंग आमदनी वाले उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति बढ़े। अमेरिका चीनियों की अतिरिक्त बचत पर भी निर्भर है ताकि दुनिया में घरेलू बचत में सबसे ज्यादा गिरावट की भरपाई करने के लिए वह चीन में अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज की भूख का फायदा उठा सके। इससे अपने भारी बजट घाटे को पूरा करे और अमेरिकी ब्याज दरों में सब्सिडी दे। अंत में कह सकते हैं कि यह परस्पर निर्भरता सुविधा की शादी है, न कि प्यार।
     
    दोनों पार्टनर के बीच कई मसलों पर टकराव हुए हैं जैसे व्यापार एवं मुद्रा के तनाव, भू-सामरिक सुरक्षा के टकराव, बौद्धिक संपदा और साइबर हैकिंग जैसे विवाद। अब, एक पार्टनर ने अलग होने का फैसला कर लिया है और यह निश्चित रूप से चीन ही है। पिछले सात वर्षों में चीनी नेतृत्व ने अपनी आर्थिक वृद्धि और विकास की रणनीति में भारी बदलावों के लिए काफी बहस-विमर्श किया है। अब अमेरिका और चीन के बीच परस्पर निर्भरता के दिन करीब खत्म हो रहे हैं। चीन अपनी अलग राह पकड़ रहा है। अमेरिका भी यदि ऐसा नहीं करता है तो उसे इसकी गंभीर कीमत चुकानी होगी। हम केवल इस बात की उम्मीद कर सकते हैं कि अमेरिका इस मौके का फायदा उठाएगा और चीन के पुनर्संतुलन प्रयासों को अपने लिए आर्थिक तरक्की और संपन्नता के नए स्रोत में बदलेगा।
     
    चीन से बेहद खराब खबरों का लंबे समय तक इंतजार करने वाले वित्तीय बाजारों को भी यही आभास करना होगा। चीन अपने अतिरिक्त बचत को अवशोषित करने के रास्ते पर बढ़ रहा है। इसके तहत अब उसका जोर बचतों से सामाजिक सुरक्षा जाल तैयार करना और अपनी जनसंख्या के लिए निवेश करने पर है। लंबे समय तक दुनिया का प्रमुख उत्पादक रहा चीन अब उपभोक्ता बनने के लिए भी दृढ़ है।
     
    अब सवाल यह है कि आखिर कब तक अमेरिका दुनिया का अंतिम उपभोक्ता बना रहेगा और चीन के सस्ते माल तथा सस्ती पूंजी पर निर्भर रहेगा। उसे भी बदलना होगा। अमेरिका अब अति उपभोगवाद से बचत और निवेश आधारित मॉडल को अपना सकता है। ऐसे में अमेरिका को अपने निर्यात से भी मदद मिलेगी, खासकर चीन को जो तीसरा सबसे बड़ा और तेजी से बढ़ता निर्यात बाजार है।

    लेखक येल यूनिवर्सिटी के फैकेल्टी सदस्य हैं।
     

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