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स्किल डेवलपमेंट के लिए हो एक मॉडर्न फंडिंग मॉडल

भारत में कुशल कामगारों की बहुत बड़े पैमाने पर जरूरत है। जबकि, मौजूदा कर्मियों को प्रशिक्षित करने की क्षमता मामूली रूप से बढ़ी है।

Government should think about create national training fund for skill development
भारत में कुशल कामगारों की बहुत बड़े पैमाने पर जरूरत है। जबकि, मौजूदा कर्मियों को प्रशिक्षित करने की क्षमता मामूली रूप से बढ़ी है। भारत में कुशलता प्राप्‍त कर्मियों की जरूरतों पर दो राय हैं। नेशनल स्किल्स पॉलिसी 2015 के अनुसार, 2022 तक 40 करोड़ कुशल कामगारों की आवश्‍यकता होगी जबकि, दूसरी ओर इसे सिर्फ अनुमानित तौर पर 20 करोड़  माना जा रहा है। जोकि, वास्‍तविकता के काफी करीब है। लेकिन, भारत में केवल 50 लाख कर्मियों को ही हर साल प्रशिक्षित किया जा रहा है। इसके लिए प्रयासों को तेज करने की जरूरत है। देश में कौशल विकास के लिए अनुदान सीमित है, जो सामान्‍य टैक्‍स रेवेन्‍यू से आता है। इधर, कॉरपोरेट सोशल रिस्‍पॉन्सिबिलिटी से स्किल डेवलमेंट बहुत कम हो रहा है। औद्योगिक इकाईयों में होने वाली ट्रेनिंग की बात करें तो यह सभी कंपनियों में केवल 39 फीसदी तक ही सीमित हो पाई है।
 
 
जिन देशों में कौशल विकास सफल हुआ है, वहां पर निजी क्षेत्र से बहुत बड़ी फाइनेंसिंग हुई है। यदि ऐसा नहीं होता है तो स्किल डेवलपमेंट सप्‍लाई आधारित ही रह जाती है जो कि इंडस्‍ट्री आधारित और डिमांड आधारित नहीं होती और यही इसका फेल होने का कारण बनता है। सरकार को चाहिए कि स्किल डेवलपमेंट के लिए नए फानेंशियल मॉडल के बारे में सोचा जाए। सरकार कंपनियों पर टैक्‍स वसूली की ऐसी प्रक्रिया को लागू करे, जिससे उनके पास स्किल डेवलमेंट के लिए फंड निर्धारित हो सके। इसके बाद कंपनियों को ट्रेनिंग पर आने वाले खर्च पर वापस किया जाना चाहिए। दुनिया के 63 देशों में इस मॉडल को अपनाया गया है। इनमें 17 देश लेटिन अमेरिका के, 17 सब-सहारा अफ्रीका के, 14 यूरोप के, 7 मिडिल ईस्‍ट और नॉर्थ अफ्रीका व 7 देश एशिया के हैं। इन देशों में इस प्रकार के फंड की व्‍यवस्‍था की गई है।

भारत में नेशनल ट्रेनिंग फंड की जरूरत

भारत में नेशनल ट्रेनिंग फंड बनाने की जरूरतों पर ज्‍यादा ध्‍यान दिया जाना चाहिए। क्‍योंकि, यहां कौशल विकास सीमित है। यद्यपि पिछले एक दशक में स्किल डेवलपमेंट प्राथमिकता में जरूर आया है लेकिन कर्मियों को प्रशिक्षित की क्षमताओं में बहुत ज्‍यादा बदलाव नहीं आया है। मौजूदा समय में प्राइवेट आईटीआई और एनएसडीसी केवल 50 लाख कर्मियों को ही प्रशिक्षित कर पा रही हैं। अगर ऐसा ही रहा तो हमारा मेक इन इंडिया का सपना पूरा होने में कठिनाई आएगी। इसके चलते युवा शक्ति की आशाएं और आकांक्षाएं सभी अधूरी रह जाएंगी और हम अपनी जनसंख्‍या का लाभ उठाने में नाकाम हो जाएंगे। कौशल विकास के लिए सामान्‍य टैक्‍स आय पर कम निर्भर होना चाहिए। राजकोषीय घाटा नियंत्रित होना चाहिए और शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और बुनियादी ढांचों पर सरकार को खुद ध्‍यान देना चाहिए। इन्‍हें प्राइवेट सेक्‍टर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। इन क्षेत्रों प्राइवेट सेक्‍टर को वहीं आना चाहिए जहां सरकार की खुद की भी फंडिंग हो। परंतु, कौशल विकास के लिए निजी क्षेत्र की इकाईयों को ही देखा जाना चाहिए क्‍योंकि, उन्‍हें ही कुशल कर्मियों का सीधा लाभ मिलेगा। जबकि, सरकार को इसके लिए सुविधा देनी चाहिए। इसलिए देश में जल्‍द से जल्‍द नेशनल ट्रेनिंग फंड की जरूरत है , जिसका पैसा निजी क्षेत्र के उद्योगपतियों को एक लेवी के रूप में सरकार को देना चाहिए लेकिन, इसका पूर्ण लाभ निजी क्षेत्र की छोटी और बड़ी इकाईयों को मिलना चाहिए।
 
कैसा हो फाइनेंसिंग मॉडल?

1- नेशनल ट्रेनिंग फंड के लिए संगठित, मीडियम और लार्ज इंटरप्राइजेस  सभी से टैक्‍स लेना चाहिए।  देश में सिर्फ संगठित सेक्‍टर, मीडियम और लार्ज सेक्‍टर से ही टैक्‍स लिया जाना चाहिए। छोटे कारोबारियों से नेशनल ट्रेनिंग फंड के नाम पर टैक्‍स लेना बेहद कठिन होगा।

2- नेशनल ट्रेनिंग फंड से कुशल कामगारों का लाभ संगठित और असंगठित दोनों सेक्‍टर को मिलना चाहिए। इस बात की सुनिश्चितता को भी खुद सरकार ही करे।

3- प्रशिक्षण के दौरान प्रशिक्षु कामगारों और छात्र वजीफा का प्रावधान होना चाहिए। इससे वे स्‍टूडेंट भी लाभान्वित हो सकेंगे, जिनके पास प्रशिक्षण के लिए धन नहीं है। मौजूदा समय में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से बहुत छोटे स्‍तर पर ही टार्गे‍ट किया जा रहा है।

नई फंडिंग योजना का हो सकता है विरोध
 
नेशनल ट्रेनिंग फंड बनाने के लिए जो टैक्‍स का प्रा‍वधान की बात है, उसका विरोध भी हो सकता है। क्‍योंकि, पिछले 5 साल में निवेश काफी कम हुआ है। इसका इस बात को लेकर विरोध हो सकता है कि अगर इंडस्‍ट्रीज पर एक नया टैक्‍स लगाया जाता है तो निवेश और कम हो जाएगा। इसका विरोध खुद कंपनियां और इंटरप्राइजेस भी कर सकते हैं। लेकिन, अगर इस विरोध को नजरअंदाज कर इंडस्‍ट्रीज को कुशल कर्मियों से उत्‍पादकता में इजाफे की बात को समझाया जा सके, तो हो सकता है कि वे राजी हो जाएं।

(लेखक जेएनयू में अर्थशास्‍त्र के प्रोफेसर और इंडियाज स्किल्‍स चैलेंज के एडीटर हैं।)
 
 

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