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    हाथी, अर्थव्यवस्था और छह बुद्धिमान व्यक्ति

    हाथी, अर्थव्यवस्था और छह बुद्धिमान व्यक्ति

    भारतीयअर्थव्यवस्था को लेकर इतनी ज्यादा टिप्पणियां आ रही हैं कि इससे और भ्रम ही बढ़ रहा है। अर्थव्यवस्था अब एक चर्चित पौराणिक कहानी के हाथी की तरह हो गई है और तरह-तरह के जो विचार आ रहे हैं वह छह नेत्रहीन लोगों की तरह। जो व्यक्ति हाथी के जिस हिस्से को छूता है वह हाथी का वर्णन वैसा ही करता है।

    एक व्यक्ति कहता है कि समस्या की जड़ महंगाई है, दूसरा कहता है कि रुपया है, तीसरा कहता है कि चालू खाता है तो कुछ अन्य कहते है कि समस्या वैश्विक अर्थव्यवस्था या भ्रष्टाचार, निष्क्रियता है या कुछ बस पुराने ढर्रे के मुताबिक बस यह कह देते हैं कि इसकी वजह सरकार का कुप्रबंधन है।

    तो वास्तव में अर्थव्यवस्था के साथ गलत क्या हो रहा है जिससे वह छह अंधों वाले उसी पौराणिक कहानी के हाथी की तरह ही सुस्त चाल से चल रही है।

    सच तो यह है कि आज अर्थव्यवस्था की हम जो हालत देख रहे हैं वह संभवत: इन सभी कारकों के संयोग से हुई है। पहली बात, यह बुनियादी तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि वैश्विक मानक के हिसाब से देखें तो भारत की हालत इतनी खराब भी नहीं है। अगर 5 फीसदी के आसपास की भी वृद्धि दर रहती है तो भी यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से रहेगा।

    दूसरी बात, मौजूदा धुंधले परिदृश्य के बावजूद योजना के आयोग के हाल के आंकड़े देखें तो पिछले दशक में गरीबी में उल्लेखनीय गिरावट आई है। वास्तव में इस आंकड़े से पता चलता है कि संभवत:गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों को अब नए सिरे से लक्षित करना होगा, यह देखते हुए कि इतनी बड़ी संख्या में लोग गरीबी रेखा से बाहर हो गए हैं।

    इसके साथ ही शहरी गरीबी उन्मूलन पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। आखिरी बात, भारत ने यह दिखा दिया है कि उसके पास अपनी जनसंख्या का पेट भरने की पूरी क्षमता है, कम से कम अनाज के संदर्भ में क्योंकि हमारे गोदाम खाद्यान्न से पटे पड़े हैं। यह अलग बात है कि यह भंडार उन लोगों में नहीं वितरित किया जाता जिनको इनकी वास्तव में जरूरत है।

    संभवत:नये खाद्य सुरक्षा विधेयक से इस समस्या का निराकरण हो जाएगा। आम भारतीय के लिए अर्थव्यवस्था में गिरावट का मतलब यह है कि बहुत से लोगों को तमाम उत्पादों के लिए ज्यादा कीमत चुकानी होगी, चाहे वह खाद्य पदार्थ हों, ईंधन या किराने का सामान। इसलिए महंगाई निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा हौवा है और इससे युद्ध स्तर तक निपटना होगा।

    रुपये में गिरावट से मध्यम और दीर्घकालिक अवधि में तो उपभोक्ताओं को ऊंची कीमत चुकानी पड़ सकती है, लेकिन इसका तत्काल कोई असर नहीं होता। मीडिया इस तरह की खबरें कर रहा है कि इसका यात्रा और पर्यटन पर क्या असर होगा, विदेश में पढ़ाई या ऑटो की कीमतों पर क्या असर होगा। इस समूचे हो-हल्ले के बावजूद यह बात नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि ये सिर्फ संपन्न तबके के मसले हैं।

    आम आदमी पर तो रुपये की गिरावट का असर तब ही होगा जब आयातित पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढऩे से खाद्य पदार्थों और अन्य कमोडिटी की कीमतें बढ़ जाएं। महंगाई के ऊंचाई पर डटे रहने के लिए सबसे बड़ा कारक आपूर्ति प्रबंधन ही लगता है।

    खासकर कई तरह के खाद्य पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ी है और जैसा कि हाल में प्याज के झमेले में देखा गया, आपूर्ति में व्यवधान अब भी जारी है। जमाखोर व्यापारी इसके लिए दोषी जरूर हैं, लेकिन खराब प्रशासन की वजह से ही उन्हें ऐसा करने का मौका मिला है।

    इस तरह से अपर्याप्त और भ्रष्ट शासन भी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचा रहा है। अनाज, केरोसीन, एलपीजी और यहां तक कि सब्जियां एवं फल सिर्फ इसलिए महंगे हुए हैं क्योंकि घटिया शासन ने आपूर्ति को काले बाजार में जाने दिया है या लालफीताशाही के बाजार व्यवस्था ने अंतत:उपभोक्ता के जेब को चोट पहुंचाई है।

    यह भी सच है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब पहले के मुकाबले ज्यादा वैश्वीकृत हो चुकी है। इसलिए अमेरिका में मात्रात्मक नरमी के संकेतों का हमारे देश के बाजारों पर तत्काल असर पड़ा है और दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तरह हमारे यहां से विदेशी निवेश की धारा पलटकर बाहर चली गई है।

    निवेशक अब अमेरिका या दूसरे आकर्षक बाजारों की तरफ अपने फंड ट्रांसफर कर रहे हैं या उसे यहां से ले जाने की सोच रहे हैं। यह एक ऐसा घटनाक्रम है जिसका अनुमान तो निश्चित रूप से हमारे देश के आर्थिक नीति-निर्माताओं को होना चाहिए था। यह बात भी उनके मन में साफ होनी चाहिए थी कि जैसे ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी, अमेरिकी फेडरल रिजर्व हर महीने 84 अरब डॉलर के बांड खरीदने के अपने कार्यक्रम पर रोक लगा देगा।

    यह तो पूरी तरह से अनुमान लगाने योग्य बात थी कि ऐसे में विदेशी निवेशक अमेरिकी बाजारों को ज्यादा आकर्षक मानेंगे। अचरज करने वाली बात बस यह है कि जब यह सब वास्तव में हुआ तो रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय दोनों इस पर चकित जैसे लगे रहे थे।

    इन वजहों से ही भारतीय शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव का दौर शुरू हो गया और इसके साथ ही रुपये में भी तेजी से गिरावट आने लगी। गिरावट सिर्फ रुपये में ही नहीं बल्कि सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्रा में हो रही है। रुपया संभवत:ब्राजील और टर्की की मुद्रा के साथ सबसे तेजी से गिरने वाली मुद्रा में से रहा।

    लेकिन अब यह माना जा रहा है कि डॉलर के मुकाबले 55 के स्तर तक रुपया बहुत ज्यादा ओवरवैल्यूड था। जानकारों का कहना है कि अगर सिर्फ इसे पिछले कुछ सालों की महंगाई से ही जुड़ा रखा जाता तो तार्किक रूप से यह डॉलर के मुकाबले 65 के स्तर पर होता और आखिरकार 60 से 62 के आसपास ठहर जाता।

    हालांकि, इन सभी कारकों के साथ ही, एक ऐसा तत्व है जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती को बढ़ावा दिया है। वह है पूरा सामान्य वातावरण जिससे संभावित निवेशक और समूचा मौजूदा घरेलू कॉर्पोरेट सेक्टर प्रभावित हो रहा है। यह अनुभव किया जा रहा है कि भ्रष्टाचार और घोटालों की वजह से सरकार निर्णय लेने के मामले में नीतिगत पक्षाघात का शिकार है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की तरफ से संवाद और भरोसे की कमी भी इसकी एक बड़ी वजह रही है।

    ऐसा माना जा रहा है कि आर्थिक मसलों पर निर्णय लेना अब उनके हाथ में नहीं रहा और अब असल ताकत उन दूसरे नेताओं के हाथ में है, जो लोकलुभावन उपायों में ज्यादा रुचि रखते हैं। इसलिए अब विदेशी निवेशक खुलकर कह रहे हैं कि वे अब कोई और निवेश वचनबद्धता की जगह अगले चुनाव तक इंतजार कर लेना पसंद करेंगे।

    सुषमा रामचंद्रन
    लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। अर्थव्यवस्था की बदहाली के लिए जिम्मेदार कारकों की जानकारी देता उनका
    यह लेख।

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