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जानिए, क्‍या होता है पीपीपी मॉडल और इससे क्या होता है फायदा

पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत सरकार निजी कंपनियों के साथ अपनी परियोजनाओं को अंजाम देती है।

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पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत सरकार निजी कंपनियों के साथ अपनी परियोजनाओं को अंजाम देती है। देश के कई हाईवे इसी मॉडल पर बने हैं। यह एक ऐसा करार है, जिसके द्वारा किसी जन सेवा या बुनियादी ढांचे के विकास के लिए धन की व्यवस्था की जाती है।
 
इसमें सरकारी और निजी संस्थान मिलकर अपने अनुभवों का प्रयोग करते हैं और पहले से निर्धारित लक्ष्य पर काम करते हैं और उस हासिल करते हैं। पीपीपी की जरूरत इसलिए पड़ती है, क्योंकि सरकार के पास इतना धन नहीं होता है, जिससे वह हजारों करोड़ रुपयों की घोषणाओं को पूरा कर सके। ऐसी स्थिति में सरकार प्राइवेट कंपनियों के साथ करार कर लेती है और इन परियोजनाओं को पूरा करती है।
 
क्या हैं पीपीपी मॉडल के फायदे-
 
=> पीपीपी मॉडल अपनाने से परियोजनाएं सही लागत पर और समय से पूरी हो जाती हैं।
 
=> पीपीपी से काम समय से पूरा होने के कारण निर्धारित परियोजनाओं से होने वाली आय भी समय से शुरू हो जाती है, जिससे सरकार की आय में भी बढ़ोत्तरी होने लगती है।
 
=> परियोजनाओं को पूरा करने में श्रम और पूंजी संसाधन की प्रोडक्टिविटी बढ़ाकर अर्थव्यवस्था की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।
 
=> पीपीपी मॉडल के तहत किए गए काम की क्वालिटी सरकारी काम के मुकाबले अच्छी होती है और साथ ही काम अपने निर्धारित योजना के अनुसार होता है।
 
 
आगे की स्लाइड में जानें क्यों फेल हो रहा है पीपीपी- 
 
 
पीपीपी के सामने चुनौतियां और फेल होने का कारण
 
=> वि‍शेषज्ञों के अनुसार, भारत में पीपीपी प्रोजेक्‍ट्स के वि‍फल होने के पीछे दोषपूर्ण रि‍स्‍क शेयरिंग, अयोग्‍य बि‍जनेस मॉडल और वि‍त्‍तीय अस्‍थि‍रता है, जि‍सकी वजह से प्राइवेट कंपनि‍यां कॉन्‍ट्रैक्‍ट हासि‍ल करने के बाद नि‍वेश बाहर नि‍काल देती हैं।
 
=> पीपीपी प्रोजेक्ट्स के बारे में कोई डेटाबेस नहीं है। निजी क्षेत्र की कंपनियों की हमेशा ऐसे ऑनलाइन डेटाबेस की डिमांड करती हैं, जहां पर फिजिबिलिटी रिपोर्ट, रियायत के एग्रीमेंट, विभिन्न मंजूरियां और भूमि अधिग्रहण जैसे किसी प्रोजेक्स के बारे में सारे दस्तावेज उपलब्ध हों।
 
=> कन्सेशनिंग अथॉरिटी द्वारा भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण/वन मंजूरी जैसे प्रोजेक्ट विकास गतिविधियों को पर्याप्त महत्व न दिया जाना भी पीपीपी मॉडल को कमजोर करता है।
 
=> पीपीपी किसी भी प्रोजेक्ट के लिए काफी हद तक निजी क्षेत्र बैंक कर्ज पर निर्भर रहते हैं। बैंकों का अपना सेक्टरवार लक्ष्य होता है, जिसके पूरा हो जाने के बाद पीपीपी प्रोजेक्ट के लिए कर्ज मिलना मुश्किल हो जाता है।
 
आगे की स्लाइड में जानें कहां नाकाम हुआ पीपीपी और कितने तरह का होता है ये-
कहां नाकाम हुआ पीपीपी
 
=> पि‍छले साल जीएमआर और जीवीके को गुड़गांव एक्‍सप्रेसवे का मेगा हाइवे प्रोजेक्‍ट्स मि‍ले, लेकि‍न वह उससे बाहर नि‍कल आए।
 
=> अदानी पावर और टाटा पावर अपने आयाति‍त कोल आधारि‍त प्रोजेक्‍ट्स को मुनाफा कमाने वाला वेंचर नहीं बना पा रहे, क्‍योंकि‍ उनकी लागत लगातार बढ़ रही है।
 
=> रि‍लायंस ने दि‍ल्‍ली में एयरपोर्ट एक्‍सप्रेस लाइन प्रोजेक्‍ट्स से हाथ खींच लि‍या, क्‍योंकि‍ कंपनी को मेट्रो लाइन चलाने पर कोई फायदा नहीं हो रहा था।  
 
कितने तरह के पीपीपी मॉडल
 
पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत सरकार निजी कंपनियों के साथ अपनी परियोजनाओं को अंजाम देती है। देश के कई हाईवे इसी मॉडल पर बने हैं। भारतीय रेलवे में ये तीन तरह के पीपीपी मॉडल इस्तेमाल किए जाते हैं।
 
बीओटी (बिल्ड, ऑपरेट, ट्रान्सफर)
 
बीओओटी (बिल्ड, ओन, ऑपरेट, ट्रान्सफर)
 
बीएलओटी (बिल्ड, लीज, ऑपरेट. ट्रान्सफर)
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