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स्‍वास्‍थ्‍य और पोषण में बि‍हार, एमपी और राजस्‍थान से पीछे रह गया यूपी

उत्‍तर प्रदेश ने पांच साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में कमी लाने के लिए अन्‍य राज्‍यों को राह दि‍खाई मगर स्‍वास्‍थ्‍य और पोषण के मामले में उसकी हालत बहुत अच्‍छी नहीं है।

UP is left behind Bihar and MP on the front of social health
नई दि‍ल्‍ली. भारत में सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्‍तर प्रदेश ने पांच साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में कमी लाने के लिए अन्‍य राज्‍यों को राह दि‍खाई मगर स्‍वास्‍थ्‍य और पोषण के मामले में उसकी हालत बहुत अच्‍छी नहीं है।
 
नेशनल फैमि‍ली हेल्‍थ सर्वे (NFHS) 1998-99, नेशनल हेल्‍थ सर्वे (AHS) 2012-13 और रैपि‍ड सर्वे ऑन चिल्ड्रन (RSOC) 2013-14  के आंकड़ों को एनलाइज करने पर यह बात सामने आती है कि‍ 20 करोड़ की जनसंख्या वाला यूपी स्‍वास्‍थ्‍य और पोषण के मामले में ऐम्पावर्ड एक्‍शन ग्रुप (EAG) के तीन अन्य राज्यों - बिहार,  मध्य प्रदेश व राजस्थान के मुकाबले पीछे है।
 
कैसा रहा EAG राज्‍यों का प्रदर्शन
 
वर्ष 2012-13 के दौरान भारत में नवजात मृत्यु दर (IMR) प्रति 1000 जीवित जन्मों में 42 थी, जबकि यूपी में यह आंकड़ा 68 था। बिहार, मध्यप्रदेश व राजस्थान के आंकड़े क्रमवार 48, 62 व 55 थे। वैसे तो सभी राज्‍यों ने इसमें सुधार दर्ज कि‍या, मगर बिहार,  मध्‍यप्रदेश व राजस्थान ने यूपी के मुकाबले ज्यादा तेजी से सुधार किया।
 
1998-99 से लेकर 2012-13 के दौरान यूपी में नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्म पर 89 से घट कर 68 तक पहुंची। यह 21 अंकों का सुधार है। जबकि बिहार में 30, मध्‍य प्रदेश में 25 तथा राजस्थान में 26 अंकों का सुधार हुआ है।
 
इसी प्रकार, पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर घटाने में भी यूपी की प्रगति धीमी रही है। उ.प्र. में 1998-99 में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 132 थी जो वर्ष 2012-13 में घट कर 90 पर पहुंची। जबकि इसी अवधि में बिहार का आंकड़ा 112 से घट कर 70 मध्‍य प्रदेश का आंकड़ा 145 से 83 तथा राजस्थान में 125 से 74 पर आ गया।
 
फैमि‍ली प्‍लानिंग और इंस्‍टीट्यूशनल डि‍लीवरी की स्‍थि‍ति‍
 
2012-13 में उ.प्र. में महिलाओं द्वारा गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल का आंकड़ा 59 फीसदी था जो कि बिहार (41 फीसदी) से ज्यादा मगर मध्य प्रदेश (63 फीसदी) और राजस्थान के 70 प्रति‍शत से कम है। इसलिए यूपी को  गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल एवं परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के लिए काफी काम करना होगा।
 
प्रसव का स्थान इसकी जानकारी देता है कि लोग सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को कितना बेहतर समझते हैं। जो लोग आर्थिक तौर पर सक्षम हैं वे प्राइवेट क्लीनिक की सेवाएं ले सकते हैं,  मगर ज्यादातर लोग इतने सक्षम नहीं होते। उ.प्र. में संस्थागत प्रसव की दर करीबन 57 प्रति‍शत है, जबकि मध्‍य प्रदेश व राजस्थान में यह आंकड़ा 83 फीसदी और 78 फीसदी है, बिहार में यह आंकड़ा 55 प्रति‍शत  के आसपास है। 2012-13 के बीच म.प्र. ने संस्थागत प्रसव में 61 प्रति‍शत अंकों का सुधार किया जबकि यूपी में केवल 35 फीसदी अंको का ही सुधार हुआ।
 
टीकाकरण की स्‍थि‍ति‍ 
 
EAG राज्यों की बात करें तो यूपी में यह सबसे कम है। 2012-13 में यूपी के 53 प्रतिषत बच्चों का पूर्ण टीकाकरण हुआ। बिहार, एमपी और राजस्थान में ये आंकड़े क्रमश: 70 प्रतिशत , 66 प्रतिशत और 74 प्रति‍शत रहे। खराब टीकाकरण कवरेज का यह मतलब है कि जिन बीमारियों की रोकथाम टीका लगा कर की जा सकती थी उनकी वजह से अस्पतालों पर गैर-जरूरी बोझ बढ़ेगा।
 
स्‍वास्‍थ्‍य के लक्ष्‍यों को हासि‍ल करने में भी पीछे है यूपी
 
केन्द्र सरकार ने 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत की थी। इसके लक्ष्‍यों को हासि‍ल करने की दि‍शा में यूपी अन्‍य EAG राज्‍यों से पीछे है। हालांकि‍ इस राज्‍य ने इसमें काफी काम कि‍या है। उदाहरण के लिए 1992-93 और 1998-99 के बीच यूपी में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर केवल 9 अंक कम हुई, लेकिन 1998-98 और 2012-13 के बीच यह घटत 42 अंकों की रही। यह बढ़ोतरी काबि‍लेगौर है मगर इस राज्‍य के सामने चुनौति‍यां कम नहीं हैं।
 
प्रोवेंशि‍यल मेडिकल सर्विस, पीएमएस में डॉक्टरों के केवल तिहाई पद ही भरे जा सके हैं। यह समस्या और भी बढ़ गई है क्योंकि पीएमएस डॉक्टर ग्रामीण इलाकों में नियुक्ति से कतराते हैं। इसके अलावा पैरामेडि‍कल स्‍टाफ की भी कमी है। इन वजहों से उ.प्र. की कम से कम आधी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं चौबीसों घंटे काम नहीं कर पाती हैं।
 
 
 
(लेखक जवाहरलाल नेहरू यूनि‍वर्सि‍टी में इकोनॉमि‍क्‍स के प्रोफेसर हैं।)
 

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