एमएसएमई /लोन के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया एमएसएमई के लिए फायदेमंद

  • कॉन्‍टैक्‍टलेस लेंडिंग की प्रक्रिया में उधारकर्ता और ऋणदाता के बीच कोई संपर्क नहीं होता है

Moneybhaskar.com

Dec 06,2019 03:00:00 PM IST

नई दिल्ली. नवंबर 2016 में सरकार के 500 और 1,000 रुपए के नोटों की कानूनी वैधता खत्‍म करने की घोषणा के बाद से डिजिटल फाइनेंस स्पेस में भारी बदलाव आया है। तब से, डिजिटल वॉलेट और यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) ने भारत में भुगतान के तरीके को बदल कर रख दिया है। जहां डिजिटल फ़ाइनेंस के रीटेल ऐप्लिकेशंस ने इस क्षेत्र में क्रांति लाई है, वहीं एक ऐसा पक्ष भी है जिसे कम प्रचार मिला है- बिजनेस को डिजिटल लेंडिंग, खासतौर से एमएसएमई के लिए।

कॉन्‍टैक्‍टलेस लेंडिंग की प्रक्रिया में उधारकर्ता और ऋणदाता के बीच कोई संपर्क नहीं होता है

हालांकि, बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने डिजिटल लेंडिंग के कुछ पहलुओं को अपनाया है, लेकिन वह फिनटेक स्टार्टअप थे जिन्होंने उद्योग में विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इन स्टार्टअप ने न केवल ऋण देने की प्रक्रिया को काफी डिजिटाइज़ किया, बल्कि कॉन्‍टैक्‍टलेस लेंडिंग (संपर्करहित उधारी) की प्रक्रिया भी शुरू की। कॉन्‍टैक्‍टलेस लेंडिंग कहता है कि उधारकर्ता और ऋणदाता के बीच कोई संपर्क नहीं है। लोन के वितरण से पहले सभी सत्यापन और जांच डिजिटल तरीके से की जाती है। परंपरागत रूप से, बैंकिंग प्रणालियों द्वारा उधारकर्ता के लिए लोन प्रक्रिया के लगभग हर चरण - आवेदन से लेकर वितरण तक, में भौतिक रूप से मौजूद होने की मांग की जाती थी। यह एक उद्यमी या किसी एमएसएमई के सीईओ के लिए समय का बेहतर उपयोग नहीं था।

कॉन्‍टैक्‍टलेस लेंडिंग फिनटेक कंपनियों और कुछ बहुराष्ट्रीय लेंडिंग संस्थाओं तक सीमित

फिनटेक स्टार्ट-अप ने एक रास्ता निकाला। उन्होंने न केवल एमएसएमई को कोलेटरल-फ़्री क्रेडिट की पेशकश की, बल्कि लोन के लिए आवेदन करते समय उधारकर्ताओं के भौतिक रूप से मौजूद होने की जरूरत को भी खत्‍म किया। सभी कागजी कार्रवाई डिजिटल हो गई और लोन तेजी से और अधिक सुगमता से वितरित किए गए। परिणामस्‍वरूप, उधारकर्ताओं ने समय और प्रयास बचाया, और ऋणदाता ऑनलाइन बिजनेस की व्यवहार्यता की जांच कर सकते हैं। 2017 की शुरुआत तक, कॉन्‍टैक्‍टलेस लेंडिंग फिनटेक कंपनियों और कुछ बहुराष्ट्रीय लेंडिंग संस्थाओं तक सीमित थी। भारतीय बैंकों, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, आकार और नियामक बाधाओं से बाधित थे और इसलिए उन्होंने तुरंत डिजिटल लेंडिंग के सभी पहलुओं को नहीं अपनाया।

लोन मंजूर होने में कभी-कभी एक महीने का समय लग जाता था

अधिकांश एमएसएमई के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक से लोन महत्वपूर्ण था क्योंकि यह बैंक कम ब्याज दर की पेशकश करते थे, और आमतौर पर 1 करोड़ रुपये तक के लोन के लिए कोलेटरल की मांग नहीं करते थे। दूसरी ओर, निजी बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफ़सी) सार्वजनिक बैंकों की तुलना में 7% तक अधिक ब्याज दरें लेती थीं। उन्होंने उन ऋणों के लिए कोलेटरल पर जोर दिया जो बहुत छोटे थे, आम तौर पर 10-50 लाख के बीच के। उद्योग के स्रोतों से पता चला है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास 25 करोड़ रुपए से कम के एमएसएमई लोन का 50 फीसदी है। लेकिन इस तरह के लोन लेना इतना आसान नहीं था। उधारकर्ताओं को पहले कागजी कार्रवाई के दायरे पार करना था और फिर कई स्‍तरों पर, अपने आवेदन को व्यक्तिगत रूप से ट्रैक करना होता था। लोन मंजूर होने में कभी-कभी एक महीने का समय लग जाता था, और फिर लगभग उतना ही समय उसे डिस्बर्स होने में लगता था।

बैंकों ने पोर्टल के माध्यम से 30,000 करोड़ रुपए के लोन का वितरण किया था

एमएसएमई तक क्रेडिट पहुंच को आसान बनाने के लिए, सरकार ने कुछ डिजिटल पहलों की शुरुआत की। इस तरह की एक पहल एक पोर्टल का शुभारंभ है, जो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से एमएसएमई को एक घंटे के भीतर लोन मुहैया करा सकता है और 8 दिनों के भीतर उन्हें लोन वितरित भी कर सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि फरवरी 2019 तक, बैंकों ने पोर्टल के माध्यम से 30,000 करोड़ रुपए के लोन का वितरण किया था। एमएसएमई क्षेत्र के लिए कॉन्‍टैक्‍टलेस लेंडिंग के कई लाभ थे। एक तो यह कि नई प्रणाली ने कर्ज लेने वाले को लोन वितरण के फ़ॉलो-अप से दूर किया, जिसमें एक महीने का समय लग सकता था। दूसरा, इसने कंपनियों को छोटे लोन तक आसान पहुंच प्रदान की। तीसरी, सभी उचित दस्तावेज ऑनलाइन अपलोड किए जा सकते थे, जिससे संपूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित हुई।

लेखक-पुष्कर मुकेवार, को-फाउंडर और को-सीईओ, ड्रिप कैपिटल, अमेरिका एवं भारत स्थित ट्रेड फाइनेंस फर्म

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