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    जीरो डिफेक्‍ट, जीरो इफेक्‍ट से एमएसएमई बनेगी वर्ल्‍ड क्‍लास

    जीरो डिफेक्‍ट, जीरो इफेक्‍ट से एमएसएमई बनेगी वर्ल्‍ड क्‍लास
    पिछले पांच दशकों में देश की आबादी लगभग दोगुनी हो गई है, जबकि हमारी कृषि  भूमि और प्राकृतिक संसाधन या तो उतने ही हैं या कई इलाकों में कम ही हुए हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था की उच्च विकास दर, विशेषकर दो अंकों में ले जाने के लिए मैन्‍युफैक्‍चरिंग ( विनिर्माण ) एवं सर्विस सेक्‍टर को बढ़ावा देना आवश्‍यक है। इसके लिए जरूरी है कि मैन्‍युफैक्‍चरिंग और एक्‍सपोर्ट सेक्‍टर की रीढ़ माने जाने वाले सूक्ष्‍म, लघु एवं मध्‍यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र की ओर विशेष ध्‍यान दिया जाए और एक ऐसा ‘इको सिस्‍टम’ तैयार करना होगा, जिससे एमएसएमई में उत्‍पादन में वृद्धि हो, प्रतिस्‍पर्धा बढ़े और क्‍वालिटी बढ़े।
     
    एमएसएमई में जीरो डिफेक्‍ट, जीरो इफेक्‍ट मॉडल अपनाना होगा, ताकि वे विश्‍व स्‍तर की कंपनियों से मुकाबला कर सकें।
     
    आईएसओ मानकों ने खोया महत्‍व
    अगर हम वर्तमान इकोसिस्टम को देखें, तो गुणवत्ता, उत्पादकता और ऊर्जा दक्षता के क्षेत्रों में काम कर रही एजेंसियों को विभिन्‍न या विपरीत दिशाओं में काम करना पड़ता है। आज की तारीख में उद्योगों को क्‍वालिटी सर्टिफिकेट पाने के लिए कई प्रक्रियाओं और प्रणालियों से होकर गुजरना पड़ता है, परन्‍तु प्रक्रिया की सख्ती में कमी और निगरानी व्यवस्था में कमी के कारण बहुत से सर्टिफिकेट, खासकर आईएसओ 9001 ने अपना महत्व खो दिया है। कई मामलों में एसएमई या तो सब्सिडी लेने या विदेशी खरीदारों को आकर्षित करने के लिए ऐसे सर्टिफिकेट प्राप्त तो कर लेते हैं, परंतु उनके नवीनीकरण और मानक बरकरार रखने की दिशा में बाद में कोई विशेष प्रयास नहीं करते। वर्तमान समय में प्रमाणन सर्टिफिकेशन प्रणाली में कोई ग्रेडिंग सिस्‍टम भी नहीं है, जो उद्योगों को लगातार अपने गुणवत्‍ता स्‍तर में सुधार करने और प्रमाणन के बेहतर ग्रेड प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित कर सके।
     

    लीन मैन्‍युफैक्‍चरिंग तकनीक की जरूरत

    हमारे देश में क्‍वालिटी प्रमाणन की दिशा में तो काम हुआ, परन्‍तु उत्‍पादकता को बढ़ाने के प्रयासों खासकर ‘लीन मैन्‍युफैक्‍चरिंग तकनीक’ को अपनाने के प्रयास बहुत कम हुए। इस दिशा में वर्ष 2009 में एमएसएमई मंत्रालय ने 5एस, सिक्स सिग्मा, विजुअल कंट्रोल, जस्ट इन टाइम, पोका-योक, कानबान और काइजान जैसी तकनीकों को अपनाते हुए उद्योगों में उत्पादकता को बढ़ाने और बर्बादी कम करने के लिए एक लीन विनिर्माण प्रतिस्पर्धात्मकता कार्यक्रम (एलएमसीएस) शुरू किया, जिसके नतीजे बहुत उत्‍साहजनक आए।
     
    एक अध्‍ययन के अनुसार इस प्रयास से विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में लीन तकनीकों को अपनाते हुए उद्योग अपनी उत्पादकता को 20-30 प्रतिशत तक बढ़ा सके ।
     

    एमएसएमई मंत्रालय ने बनाया कार्यक्रम

     
    कार्यक्रम की सफलता को ध्‍यान में रखते हुए मंत्रालय ने इस स्‍कीम को और भी व्‍यापक बनाया है। जिसे देशभर में 500 से अधिक क्‍लस्‍टरों में कार्यान्‍वित किया जाना है। यद्यपि कुछ ओईएम खासतौर पर ऑटोमोबाईल सेक्‍टर में विगत कुछ वर्षों से अपने टीयर 1 और 2 कंपनियों में लीन मैन्‍युफैक्‍चरिंग तकनीकों को अपनाने के लिए कार्य कर रहे थे, परन्‍तु देश स्‍तर पर लीन मैन्‍युफैक्‍चरिंग को बढ़ावा देने का कोई संगठित प्रयास नहीं हुआ था। आज एमएसएमई मंत्रालय दो क्रियान्‍वयन संस्‍थाओं क्रमश: नेशनल प्रोडक्टिविटी काउंसिल (एनपीसी) तथा क्‍वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (क्‍यूसीआई) की मदद से 350 से ज्‍यादा क्‍लस्‍टरों में यह कार्य कर रही है।
     
    जेड सर्टिफिकेशन की जरूरत
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि देश में जीरो डिफेक्‍ट और जीरो इफेक्‍ट मैन्‍युफैक्‍चरिंग की आवश्‍यकता है। लेकिन इसे यथार्थ में बदलने के लिए कई कदम उठाने होंगे। देश में एक एकीकृत और समग्रतावादी जेड सर्टिफिकेशन (ZED Certification) प्रणाली विकसित करनी होगी। जो गुणवत्‍ता, उत्‍पादकता, ऊर्जा दक्षता, प्रदूषण नियंत्रण, वित्‍तीय स्‍थिति, एचआर और उत्‍पाद के साथ साथ मैन्‍युफैक्‍चरिंग  में डिजाइन व आईपीआर सहित टेक्‍नोलॉजी को समाहित किया जाए। इस प्रमाणन में क्षैतिज और उर्ध्‍व दोनों स्‍कोरिंग प्रणाली हो सकती है, ताकि निरंतर उन्‍नयन के लिए स्‍वाभाविक रूप से जोर दिया जा सके जब तक कि कोई उद्योग प्रमाणन पिरामिड में उच्‍चतम स्‍कोर न प्राप्‍त कर ले। इस सर्टिफिकेशन को प्राप्त करने के लिए एमएसएमई को फाइनेंसियल और तकनीकी सहयोग दिया जा सकता है और इसके लिए एमएसएमई मंत्रालय आगे आ सकता है।
     
    मार्केट में बने रहने को क्‍वालिटी सर्टिफिकेशन जरूरी
     
    एक और सवाल पूछा जाता रहा है कि एमएसएमई क्‍वालिटी सर्टिफिकेशन के लिए क्‍यों आगे आएंगे तो केंद्र सरकार ने पिछले दिनों निर्णय लिया है कि पीएसयू को एमएसई से उनकी वार्षिक खरीद के 20 प्रतिशत की खरीद करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा एकल एवं मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्रों में एफडीआई, विभिन्‍न विनिर्माण क्षेत्रों में एफडीआई ई-बिजनेस, डिफेंस ऑफसेट पॉलिसी आदि द्वारा उद्योगों को अपने उत्‍पादकता को वैश्‍विक बाजार तक पहुंच बनाने के लिए पर्याप्‍त अवसर प्रदान किया जा सकेगा। किन्‍तु यह तभी होगा, जब मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर में जीरो डिफेक्‍ट और जीरो इफेक्‍ट प्रणाली लागू हो जाएगी, क्‍योंकि इसी से उच्‍च गुणवत्‍ता का सामान विश्‍व व्‍यापार के लिए तैयार हो सकेगा। और इसके लिए क्‍वालिटी सर्टिफिकेशन की बेहद जरूरत होगी।  
     
    * (रमेश पांडेय, एमएसएमई मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली में संयुक्त विकास आयुक्त के रूप में कार्यरत हैं। यहां अभिव्यक्त सभी विचार उनके निजी हैं और अधिक सूचना के लिए कृपया संपर्क करें: (rameshpandeyifs@gmail.com)

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