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खास खबर: सबको घर-उम्मीद से ज्यादा निराशा, PMAY के स्लो स्पीड की ये है कहानी

नई दिल्‍ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2022 तक 2 करोड़ घर बनाने का वादा किया था, लेकिन लगभग 4 साल बाद केवल 3.4 लाख घर ही बन पाए। इनमें से लगभग 2.97 लाख घरों में ही लोगों ने रहना शुरू किया है। सरकार प्रयास कर रही है कि 2019 तक इस स्‍कीम की परफॉरमेंस दिखाई जा सके, इसके लिए सरकार बराबर प्रयास भी कर रही है, लेकिन अब तक इस योजना के स्‍पीड पकड़ने की संभावना न के बराबर दिख रही है। इस स्‍कीम का टारगेट हासिल करने के लिए सरकार ने प्राइवेट डेवलपर्स को कई तरह के इन्‍सेंटिव भी दे दिए हैं, बावजूद इसके प्राइवेट डेवलपर आगे नहीं आ रहे हैं। 

 

क्‍या है वर्तमान स्थिति 
मिनिस्‍ट्री ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन अफेयर्स की वेबसाइट के मुताबिक, प्रधानमंत्री आवास योजना (अर्बन) का 5 मार्च तक  का स्‍टेट्स इस प्रकार है। 
प्रस्‍तावित प्रोजेक्‍ट्स : 8341 
प्रस्‍तावित इन्‍वेस्‍टमेंट : 225219 करोड़ रुपए 
केंद्र को देना है : 62463 करोड़ रुपए 
केंद्र ने जारी किया : 13507 करोड़ रुपए 
प्रस्‍तावित घर : 4062364 
घर बनने शुरू हुए : 1799159 
घर बने : 339866 
जहां लोग रहने लगे : 297183 घर 

 

किन राज्‍यों में है बुरे हालात 

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कई राज्‍यों की परफॉरमेंस काफी बुरी है। जैसे - 
गोवा : 65 घर 
हिमाचल प्रदेश : 194 
जम्‍मू कश्‍मीर : 193 
अरुणाचल प्रदेश : 16 
सिक्किम : 2 
नागालैंड : 9 
अंडमान निकोबार : एक भी नहीं 
लक्षद्वीप : एक भी नहीं 
पंजाब : 1366 
तेलंगाना : 1465 

 

क्‍या हैं वजह 
प्रधानमंत्री आवास योजना की धीमी गति के कई कारण हैं। नेशनल फोरम फॉर हाउसिंग राइट्स के संयोजक इंदु प्रकाश सिंह ने कहा कि सरकार की दिशा ही ठीक नहीं है। सरकार चाहती है कि इस मिशन को प्राइवेट डेवलपर्स पूरा करें, इसलिए उनके लिए कई तरह के इन्‍सेंटिव की शुरुआत की गई है, परंतु प्राइवेट डेवलपर्स और फायदे चाहते हैं, इसलिए अब तक प्राइवेट डेवलपर्स आगे नहीं आ रहे हैं। अब तक जो भी मकान बने हैं, वे ज्‍यादातर बेनिफिशयरी लेड कंस्‍ट्रक्‍शन कंपोनेंट के तहत बने हैं, यानी कि लोग अपनी जमीन पर सरकार से पैसे लेकर घर बना रहे हैं। कुछ जगह सरकार ने भी घर बनाए हैं, परंतु जिस स्पीड से घर बनने चाहिए, नहीं बन रहे। उन्‍होंने कहा कि यदि यही स्‍पीड रही तो मिशन किसी भी हालत में 2022 तक पूरा नहीं हो सकता। 

 

कितनी होनी चाहिए कीमत 
इस योजना को पूरा करने के लिए चार कंपोनेंट में बांटा गया है। इसमें से एक है अफोर्डेबल हाउसिंग इन पार्टनरशिप और दूसरा है क्रेडिट लिंक्‍ड सब्सिडी के माध्‍यम से अफोर्डेबल हाउसिंग। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन सेटलमेंट्स के गौतम भान ने कहा कि अफोर्डेबल स्‍कीम के तहत बन रहे घरों की कीमत 5 से 10 लाख रुपए के बीच होनी चाहिए, लेकिन ये इससे काफी महंगे हैं। लगभग 1 करोड़ 70 लाख ऐसे घरों की जरूरत है, जो 10 लाख रुपए से नीचे होनी चाहिए। अब सवाल उठता है कि इस कीमत पर घर बनाएगा कौन। कम से कम प्राइवेट डेवलर्स तो नहीं बनाएंगे। 

 

झुग्‍गी की जगह मकान कौन बनाएगा 
प्रधानमंत्री आवास योजना का एक और कंपोनेंट है इनसीटू स्‍लम रिडेवलपमेंट (आईएसएसआर) । जिसका मतलब है कि जहां स्‍लम है, वहीं लोगों को पक्‍के घर बनाकर दिए जाएं। इस कंपोनेंट के तहत सरकार प्राइवेट डेवलपर्स को स्‍लम बस्‍ती वाली जमीन देकर घर बनवाना चाहती है, लेकिन प्राइवेट डेवलपर्स इसके लिए आगे नहीं आ रहे हैं।  सिंह का आरोप है कि आईएसएसआर स्‍कीम के तहत सरकारें प्राइवेट सेक्‍टर को फायदा पहुंचाना चाहती है, लेकिन प्राइवेट सेक्‍टर को इसमें फायदा नहीं दिख रहा है। 

 

ये है एक उदाहरण 

इंदु प्रकाश सिंह ने कहा कि इस स्‍कीम के तहत यदि दिल्‍ली का उदाहरण देखा जाए तो पता चलेगा कि यह योजना फेल क्‍यों हुई। दिल्‍ली की एक बस्‍ती है, कठपुतली कॉलोनी। दिल्‍ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) ने रहेजा बिल्‍डर्स को 6 करोड़ रुपए में यह सारी जमीन दे दी और बिल्‍डर से कहा कि इस जमीन पर 10 मंजिला फ्लैट बनाकर यहां झुग्गियों में रहने वाले लोगों को दे दें और बाकी हिस्‍सा में बिल्‍डर मॉल या सोसायटी फ्लैट बेच सकते हैं। सिंह के मुताबिक, झुग्‍गी वालों के लिए 10 फीसदी ही जमीन रखी गई, शेष 90 फीसदी हिस्‍से में बिल्‍डर को मनमुताबिक तौर पर बेचने का एमओयू साइन कर दिया गया। कठपुतली कॉलोनी के लोग (जिनमें ज्‍यादातर कलाकार हैं)  इसका विरोध करने लगे। क्‍योंकि यह समझ आ गया कि उन्‍हें छोटे-छोटे फ्लैट में बसा दिया जाएगा। उन्‍हें जब कहा कि वे आपस में मिला जुलाकर 6 करोड़ रुपए दे देंगे तो सरकार ने उनकी बात नहीं मानी।

 

जमीन की कीमत बनी मुसीबत 
इस स्‍कीम के तहत राज्‍य सरकारों को घर बनाने के लिए पैसा देती है, लेकिन जमीन की कीमत को देखते हुए यह पैसा नाकाफी है। इसके चलते राज्‍य सरकारें आगे नहीं आ रही हैं। राज्‍य सरकारों का फोकस भी प्राइवेट सेक्‍टर पर ही है। इसलिए राज्‍य सरकारों ने अपनी-अपनी अफोर्डेबल हाउसिंग पॉलिसी बना ली है और डेवलपर्स इस पॉलिसी के तहत घर बनाने को कहा जा रहा है। लेकिन डेवलपर्स इसे दोयम दर्जे का सेगमेंट मानते हुए आगे नहीं आ रहे हैं। एक डेवलपर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि 5-6 साल से रियल एस्‍टेट मार्केट में जिस तरह की मंदी छाई है, उससे डेवलपर्स के पास पैसा ही नहीं है कि वे अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्‍ट्स लॉन्‍च कर सकें। जिनके पास पैसा है भी तो वे इतनी कम कीमत के घर लॉन्‍च कर पैसा फंसाना नहीं चाहते। 

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