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कानून बना, सजा हुई, जुर्माना लगा, लेकिन 30 लाख होम बायर्स को नहीं मिला घर

पिछले चार साल के दौरान होम बायर्स को घर क्‍यों नहीं मिले, इसकी पड़ताल करती मनी भास्‍कर की रिपोर्ट

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नई दिल्‍ली। देश में रियल एस्‍टेट रेग्‍युलेशन एक्‍ट (रेरा) लागू किया गया। सरकार की सख्‍ती के चलते कई बिल्‍डर्स जेल की हवा खा रहे हैं। राज्‍य सरकारें भी अपने-अपने स्‍तर पर कार्रवाई कर रही है। अदालतों के फैसले भी होम बायर्स के पक्ष में आ रहे हैं, लेकिन इन सबके बावजूद ग्राउंड रियलटी यह है कि होम बायर्स को न तो उनका पैसा वापस मिल रहा है और ना ही उन्‍हें घर मिल रहा है। पिछले चार साल के दौरान होम बायर्स को घर क्‍यों नहीं मिले, इसकी पड़ताल करती मनी भास्‍कर की रिपोर्ट - 

 

30 लाख होम बायर्स को इंतजार

भारत की रियल एस्‍टेट मार्केट पर लगातार रिसर्च करने वाली एजेंसी लियासेस फोरास ने नवंबर 2017 में एक रिपोर्ट जारी की थी। जिसके बाद से कोई रिपोर्ट जारी नहीं की गई। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था देश के 43 शहरों में लगभग 29.23 लाख अंडर कंस्‍ट्रक्‍शन घर अपने तय समय से डिले हैं। इसमे से 6 लाख घर दिल्‍ली एनसीआर में हैं, जिनका कंस्‍ट्रक्‍शन पूरा नहीं हो पाया। इसके अलावा केंद्र सरकार की ओर से बॉम्‍बे हाईकोर्ट को बताया गया था कि अकेले महाराष्‍ट्र में अंडर कंस्‍ट्रक्‍शन प्रोजेक्‍ट्स में 5.3 लाख अपार्टमेंट डिले हैं। हालांकि लियासेस फोरास की रिपोर्ट लगभग 6 माह पुरानी है, लेकिन बायर्स का आरोप है कि बिल्‍डर्स का रवैया नहीं बदला है और बिल्‍डर्स कंस्‍ट्रक्‍शन की ओर फोकस नहीं कर रहे हैं।

 

क्‍या है ताजा मामला 
आइए, सबसे पहले शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले से करते हैं। बृहस्‍पतिवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा के डेवलपर आम्रपाली को कहा कि वह 250 करोड़ रुपए जमा कराए, ताकि को-डेवलपर्स के माध्‍यम से अधूरे पड़े फ्लैट्स का निर्माण शुरू कराया जा सके। दरअसल, नोएडा-ग्रेटर नोएडा में लगभग 40 हजार फ्लैट्स ऐसे हैं, जो आम्रपाली डेवलपर्स के अलग-अलग प्रोजेक्‍ट्स के हिस्‍से हैं और अधूरे पड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट पहुंचे होम बायर्स के समक्ष एक फार्मूला रखा गया कि ये अधूरे प्रोजेक्‍ट्स को-डेवलपर्स द्वारा पूरे किए जाएंगे। बायर्स इस फार्मूले पर सहमत हो गए और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश भी हैं। लेकिन, उन्‍हें लगता है कि यह एक छोटी जीत है, लड़ाई अभी बाकी है। नोएडा एक्‍सटेंशन फ्लैट ऑनर्स वेलफेयर एसोसिएशन (नेफोवा) के अध्‍यक्ष अभिषेक कुमार ने कहा कि आम्रपाली डेवलपर्स का अब तक का जो रवैया रहा है, उससे यह सब आसान नहीं लगता। फिर भी उनकी लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक फ्लैट नहीं मिल जाते। 

 

क्‍या है दिक्‍कत 
बायर्स के वकील कुमार मिहिर ने मनीभास्‍कर से कहा कि आम्रपाली डेवलपर्स का कहना है कि अपने सारे प्रोजेक्‍ट्स का कंस्‍ट्रक्‍शन वर्क पूरा करने के लिए उसे लगभग 4000 करोड़ रुपए चाहिए, जबकि उसके पास कई फ्लैट्स अनसोल्‍ड हैं और बायर्स से भी उसने बकाया लेना है। इस तरह उसे लगभग 6000 करोड़ रुपए लेना है। जबकि बैंकों और अथॉरिटी का 2000 करोड़ रुपए देना है। जबकि उसके पास लैंड पार्सल भी है। यदि को-डेवलपर्स लैंड पार्सल और अनसोल्‍ड इंवेंटरी बेच देते हैं और बायर्स से बकाया ले लेते हैं तो उन्‍हें बचत हो सकती है। मिहिर कहते हैं कि आम्रपाली का यह गणित तो समझ में आता है, लेकिन कंस्‍ट्रक्‍शन वर्क शुरू करने के लिए को-डेवलपर्स को पैसा चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 15 जून तक 250 करोड़ रुपए जमा कराने को कहा है। लेकिन मनीभास्‍कर ने जब कुमार मिहिर से पूछा कि यदि आम्रपाली ने 250 करोड़ रुपए नहीं जमा कराए तो के जवाब में कुमार मिहिर ने कहा कि तब तो कोर्ट को ही कुछ करना पड़ेगा। 

 

नहीं काम आई योगी की सख्‍ती 
उत्‍तर प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना अथॉरिटी एरिया में अधूरे पड़े फ्लैट्स के बायर्स को उम्‍मीद थी कि अब उन्‍हें जल्‍द ही फ्लैट्स मिल जाएंगे। उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरते हुए योगी ने बिल्‍डर्स को निर्देश दिए थे कि 31 दिसंबर 2017 तक 50 हजार होम बायर्स को उनके घर दिए जाएं, लेकिन इस डेडलाइन को खत्‍म हुए पांच माह बीत गए, लेकिन अब तक होम बायर्स को घर नहीं मिले हैं। उल्‍टे, उनके इस निर्देश का फायदा बिल्‍डर्स उठा रहे हैं। नेफोवा के अध्‍यक्ष अभिषेक कुमार ने मनीभास्‍कर से कहा कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी द्वारा अधूरे पड़े प्रोजेक्‍ट्स को भी कंप्‍लीशन सर्टिफिकेट दिया जा रहा है। जबकि बिल्‍डर्स, होम बायर्स को कब्‍जा नहीं दे रहे हैं। इसके लिए नए सिरे से योगी सरकार से बातचीत की जाएगी। 

 

रेरा का भी नहीं मिला फायदा 
दो साल पहले देश भर में रियल एस्‍टेट रेग्‍युलेशन एक्‍ट (रेरा) लागू हो गया था और एक साल पहले राज्‍यों में रेरा अथॉरिटी भी बन गई, लेकिन ग्राउंड पर इसका कोई फायदा नहीं मिला। नोएडा एस्‍टेट फ्लैट ऑनर्स एंड मेंबर्स एसोसिएशन (नेफोमा) के अध्‍यक्ष अन्‍नू खान ने मनीभास्‍कर से कहा कि डेवलपर्स ने रेरा में नए सिरे से रजिस्‍ट्रेशन करा लिया है। जिन डेवलपर्स को 2014 में कब्‍जा देना चाहिए था, वे अब 2021-22 में पजेशन देने की बात कर रहे हैं। जिससे बायर्स निराश हैं। खान के मुताबिक, बायर्स को अपनी शिकायत करने के लिए रेरा में 1000 रुपए भरने पड़ रहे हैं, जो उनकी निराशा बढ़ा रहा है। 

 

केंद्र से की शिकायत 
फाइट फॉर रेरा के संयोजक अभय उपाध्‍याय ने मनीभास्‍कर से कहा कि इस सिलसिले में पिछले दिनों में केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री हरदीप पुरी के साथ बैठक हुई। जिसमें शिकायत की गई कि राज्‍य सरकारें रेरा को गंभीरता से नहीं ले रही हैं। उन्‍होंने कहा कि महाराष्‍ट्र के अलावा किसी भी राज्‍य में रेरा को ढंग से लागू नहीं किया जा रहा है। इसलिए इसका फायदा बायर्स को नहीं मिल रहा है। 

 

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NCLT से भी निराशा 
नोएडा-ग्रेटर नोएडा के सबसे बड़े डेवलपर जेपी इंफ्राटेक का मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्‍यूनल में जाने के बाद से होम बायर्स को नए सिरे से संघर्ष करना पड़ रहा है। जेपी इंफ्राटेक और जेपी एसोसिएट्स के लगभग 32 हजार बायर्स को घर नहीं मिला है। पिछले दिनों एनसीएलटी ने जेपी इंफ्राटेक की संपत्ति कुर्क करने का आदेश दिया तो बायर्स ने सुप्रीम कोर्ट से दखल की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है और 15 जून तक जेपी ग्रुप से 1000 करोड़ रुपए जमा कराने को कहा है। वहीं, जेपी बायर्स एसोसिएशन के एसके पुरी ने मनीभास्‍कर से कहा कि अब तो सुप्रीम कोर्ट से ही कोई उम्‍मीद है। वरना मामला कभी कहीं तो कभी कहीं उलझाया जा रहा है, हमारे घर मिलेंगे, यह कोई नहीं बता रहा। 

 

कौन काट रहा है जेल

गुड़गांव के प्रमुख बिल्‍डर यूनिटेक के मालिक संजय चंद्रा जेल में बंद हैं। बावजूद इसके, बायर्स को नहीं लगता कि उन्‍हें जल्‍द ही घर मिल जाएंगे।।

 
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