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क्‍या रेट कट पर खत्‍म होगा 4 माह का इंतजार, सस्‍ते कर्ज पर रिजर्व बैंक का फैसला आज

रिजर्व बैंक की मॉनीटरी पॉलिसी कमेटी (एमपीसी) की बैठक जारी है। कमेटी आज रेट कट पर फैसला करेगी।

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नई दिल्‍ली। रिजर्व बैंक की मॉनीटरी पॉलिसी कमेटी  (एमपीसी) की बैठक जारी है। कमेटी  रेट कट पर बुधवार को फैसला करेगी। एमपीसी अगर रेट कट का फैसला करती है तो आम आदमी से लेकर इंडस्‍ट्री तक को सस्‍ते कर्ज का फायदा मिलेगा। वहीं अगर रेट कट नहीं होता है तो आम आदमी से लेकर इंडस्‍ट्री तक को सस्‍ते कर्ज के लिए फरवरी में होने वाली एमपीसी की अगली बैठक का इंतजार करना पड़ सकता है। मौजूदा समय में रेपो रेट रेट 6 फीसदी और रिवर्स रेपो रेट 5.75 फीसदी है। 

 

रेट कट पर EXPERT VIEW 

 

एक्‍सपर्ट्स का मानना है कि रिजर्व बैंक के लिए महंगाई एक अहम मुद्दा है। महंगाई बढ़ने का ट्रेड जारी है। वहीं दूसरी तिमाही के जीडीपी के बेहतर आंकड़े भी रिजर्व बैंक के अनुमान के अनुरूप हैं एमपीसी के सामने कोई सरप्राइज फैक्‍टर नहीं है। ऐसे में रेट कट की उम्‍मीद बहुत कम है। क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्‍ट डीके जोशी का कहना है कि अक्‍टूबर में हुई एएमपीसी की बैठक के समय इकोनॉमी के सामने जो चुनौतियां थीं। अब भी लगभग वही चुनौतियां बरकरार हैं। ऐसे में रेट में कटौती होने की संभावना नहीं है। वहीं यूनियन बैंक के एमडी और सीईओ राजकिरण राय जी का कहना है कि पॉलिसी रेट में बदलाव नहीं होने जा रहा है। बैकिंग सिस्‍टम में तरलता बहुत कम है। डिपॉजिट रेट बढ़ रहे हैं और बाजार में महंगाई को लेकर चिंता है। 

 

सरकार और रिजर्व बैंक की रेट पर अलग सोच क्‍यों है 

 

रिजर्व बैंक का अनुमान है कि आने वाले महीनों में भी महंगाई बढ़ने का ट्रेंड जारी रहेगा। ऐसे में रेट में कटौती नहीं की जा सकती है। वहीं सरकार का नजरिया अलग है। डीके जोशी का कहना है कि रेट कट पर रिजर्व बैंक और सरकार का नजरिया अलग होना कोई नई बात नहीं है। रिजर्व बैंक का फोकस महंगाई को नियंत्रण में रखने पर होता है वहीं सरकार ग्रोथ को बढ़ावा देने के बारे में सोचती है। ऐसे में यह दिखता है कि रिजर्व बैंक और सरकार की रेट कट को लेकर राय अलग अलग है। 

 

रेट कट से किसको होगा फायदा 

 

अगर रिजर्व बैंक रेट करता है तो आम आदमी, बिजनेस मैन से लेकर इंडस्ट्री सबको फायदा होगा। आम लोगों के लिए पर्सनल लोन, होम लोन, कार लोन और बिजनेस लोन सस्‍ता होगा वहीं इकोनॉमिक एक्टिविटी बढ़ने से मांग बढेंगी और इंडस्‍ट्री को भी इसका फायदा मिलेगा। इसके अलावा इंडस्‍ट्री को भी कम लागत में फंड मिलेगा। 

 

रिजर्व बैंक को रेट कट पर किस बात का है डर 

 

रिजर्व बैंक की मॉनीटरी पॉलिसी महंगाई को नियंत्रण में रखने पर केंद्रित है। ऐसे में रिजर्व बैंक को लगता है कि रेट में कटौती करने से महंगाई और भड़क सकती है। अगर महंगाई ज्‍यादा बढ़ जाएगी तो उसे नियंत्रित करने में लंबा समय लगेगा। महंगाई का नकारात्‍मक असर पूरी अर्थव्‍यवस्‍था पर पड़ता है। 

 

आखिरी बार कब हुआ था रेट कट 

 

रिजर्व बैंक ने 2 अगस्‍त को हुई मॉनीटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक में रेपो रेट में 25 बेसिस प्‍वाइंट यानी 0.25 फीसदी कटौती की थी और रेपो रेट 6 फीसदी हो गया था। इसके बाद रिजर्व बैंक ने अक्‍टूबर में हुई एमपीसी की मीटिंग में पॉलिसी रेट में कोई बदलाव नहीं किया था। इसके लिए रिजर्व बैंक ने महंगाई बढ़ने का हवाला दिया था। उस समय रिजर्व बैंक ने अगले कुछ महीनों में महंगाई की दर 4.2 फीसदी से 4.4 फीसदी रहने का अनुमान जताया था। 

 

 

आगे पढें- रिजर्व बैंक के सामने ये हैं चुनौतियां 

 
महंगाई में हुआ है इजाफा 
 
रिजर्व बैंक ने अक्‍टूबर में हुई मॉनिटरी पॉलिसी बैठक में दूसरी छमाही में महंगाई की दर 4.2 फीसदी से 4.6 फीसदी की रेंज में रहने का अनुमान जताया था। ताजा आंकड़ों के अनुसार महंगाई में इजाफा हुआ है। नवंबर में जारी की गई अक्‍टूबर की थोक महंगाई दर बढ़ कर 3.56 फीसदी के स्‍तर पर आ गई। ऐसा फूड प्राइस में इजाफा होने की वजह से हुआ। वहीं अक्‍टूबर में खुदरा महंगाई दर 3.58 फीसदी के स्‍तर पर पहुंच गई। वहीं सितंबर माह में खुदरा महंगाई की दर 3.28 फीसदी थी। एमपीसी ने पिछली बैठक में महंगाई बढ़ने के ट्रेंड पर चिंता जताई थी। ऐसे में इस बैठक में भी एमपीसी के लिए महंगाई अहम मुद्दा होगा। 
 
नहीं बढ़ रहा है निजी क्षेत्र का निवेश 
 
इकोनॉमिस्‍ट पई पणिंदकर का कहना है कि एमपीसी जीडीपी के आंकड़ों पर जरूर विचार करेगी। इसके साथ ही वह बेहतर जीडीपी आंकड़ों को देखते हुए अपने ग्रोथ प्रोजेकशन में भी बदलाव कर सकती है। जीडीपी के आंकड़ों के अलावा एमपीसी के सामने अहम मसला होगा कि देश में निजी क्षेत्र का निवेश नहीं बढ़ रहा है। वास्‍तव में निजी क्षेत्र का निवेश घटा है। एमपीसी इस मसले पर भी विचार करेगी। 
 
तेल की कीमतें भी होगी अहम फैक्‍टर 
 
पई पणिंदकर का कहना है कि एमपीसी की बैठक में अंतराष्‍ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें भी अहम मुद्दा होगा। मोजूदा समय में कच्‍चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल है। लेकिन कीमतों में इजाफा होने की संभावना नहीं है। ओपेक ने तेल का उत्‍पादन घटाने की बात कही है लेकिन सभी ओपेक देश ऐसा करेंगे इसकी उम्‍मीद बहुत कम है। इसके अलावा अमेरिका ने भी शैल गैस का उत्‍पादन शुरू कर दिया है। ऐसे में अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में खास इजाफा होने की संभावना नहीं है। 
 
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