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5 साल में बैंकों को करनी पड़ी 1.15 लाखCr की प्रोविजनिंग, डिफॉल्टर्स ने बढ़ाई परेशानी

पीएसयू बैंकों को 5 साल में एक लाख करोड़ रुपए केवल प्रोविजनिंग की वजह से गंवाना पड़ा है

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नई दिल्ली। पीएसयू बैंकों को  5 साल में एक लाख करोड़ रुपए केवल प्रोविजनिंग की वजह से गंवाना पड़ा है। जिसकी वजह से उनका प्रॉफिट 10 साल के निचले लेवल पर पहुंच गया है। बढ़ते एनपीए के कारण बैंकों की प्रोविजनिंग उनके ऑपरेटिंग प्रॉफिट के 113 फीसदी के खतरनाक लेवल पर पहुंच गई है। जिसका सीधा असर बैंकों की कर्ज देने की क्षमता पर निगेटिव रुप से पड़ा है। बैंकर्स के अनुसार जिस तरह से बैंकों में विलफुल डिफॉल्ट की संख्य़ा बढ़ी है, उसकी वजह से उनकी साख पर और  बट्टा लगा है। हाल ही में नीरव मोदी और मेहुल चौकसे के जरिए पीएनबी में हुए 11500 करोड़ रुपए का फ्रॉड उसी का एक रुप है।
 
ऑपरेटिंग प्रॉफिट से ज्यादा प्रोविजनिंग में खप गई कमाई
 
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2017 तक बैंकों का एनपीए 7.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। जिसकी वजह से उनकी प्रोविजनिंक भी बढ़ती गई है। बैंकिंग इंडस्ट्री से मिली जानकारी के अनुसार मार्च 2012 में बैंकों का ऑपरेटिंग प्रॉफिट 1.12 लाख करोड़ रुपए था, वहीं उसके बदले उन्हें 38177 करोड़ रुपए की प्रोविजनिंग करनी पड़ी थी। वह अब बढ़कर मार्च 2106 तक 1.53 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। वहीं इस अवधि में इनका ऑपरेटिंग प्रॉफिट 1.36 लाख करोड़ रुपए रह गया।
 
साल ऑपरेटिंग प्रॉफिट  एनपीए के लिए प्रोविजनिंग प्रोविजनिंग (फीसदी )
मार्च 2012 1,12,290 करोड़ रु 38177 करोड़ 34%
मार्च 2013 1,21,838 करोड़ रु 43051 करोड़ 35%
मार्च 2014 1,27,651 करोड़ रु 55237 करोड़ 43%
मार्च 2015 1,37,817 करोड़ रु 68158 करोड़ 49%
मार्च 2016 1,36,926 करोड़ 1,53,713 करोड़ 113%
 
58 हजार से ज्यादा विलफुल डिफॉल्टर
 
सूत्रों के अनुसार देश के पब्लिक सेक्टर बैंकों के अकेले 58 हजार से ज्यादा विलफुल डिफॉल्टर हैं। जिन पर करीब 50 हजार करोड़ रुपए बकाया है। इसकी वजह से बैंकों की प्रोविजनिंग बढ़ गई है। बैंंकर्स के अनुसार विलफुल डिफॉल्टर बढ़ने  की वजह से बैंकों की क्रेडिट रिकवरी पर सीधा इम्पैक्ट हुआ है। साथ ही इकोनॉमी में स्लोडाउन की वजह से भी बैंकों का एनपीए बढ़ता जा रहा है।
 
क्या होती है प्रोविजनिंग
 
आरबीआई के नियमों के अनुसार बैैंकों को एनपीए के अनुरूप एक निश्चित राशि प्रोविजनिंग के रुपए में करनी पड़ती है। जिसकी वजह से उनके प्रॉफिट पर सीधा इम्पैक्ट पड़ता है। साथ ही उसका असर क्रेडिट ग्रोथ और एक्सपेंशन पर भी दिखता है।
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