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संन्‍यासी भारतीय अरबपति फंसा धोखाधड़ी में, पाक से आकर दादा ने शुरू किया था बिजनेस

कहते हैं कि इंसान भले ही अपने प्रोफेशन को छोड़ कोई दूसरा रास्‍ता अपना ले लेकिन अतीत उसका पीछा नहीं छोड़ता है।

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नई दिल्‍ली। कहते हैं कि इंसान भले ही अपने प्रोफेशन को छोड़ कोई दूसरा रास्‍ता अपना ले लेकिन अतीत उसका पीछा नहीं छोड़ता है। यह कहावत फोर्टिस हेल्थकेयर के को-फाउंडर शिविंदर सिहं को बिल्‍कुल सटीक बैठती है। दरअसल, संन्‍यास का जीवन बिता रहे शिविंदर सिंह पर जालसाजी के मामले में एक मुकदमा दर्ज हुआ है। इसमें शिविंदर के अरबपति भाई मालविंदर सिंह को भी आरोपी बनाया गया है।  


इसलिए हैं चर्चा में 


दरअसल, न्‍यूयॉर्क के एक इन्‍वेस्‍टर ने दिल्‍ली के हाई कोर्ट में फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनी रैलीगेयर एंटरप्राइजेज लिमिटेड के मालिक मालविंदर और उनके संन्‍यासी बन चुके भाई शिविंदर सिहं पर एसेट्स में धोखाधड़ी और अनयिमितता का आरोप लगाते हुए केस दर्ज किया है।  बहरहाल, आज हम आपको इस रिपोर्ट में संन्‍यासी शिविंदर सिंह के बारे में बताने जा रहे हैं। 

 

बन चुके हैं संन्‍यासी 

शिविंदर मोहन सिंह ने 2015 में संन्‍यासी बनने का एलान किया था। उन्‍होंने फोर्टिस हेल्‍थकेयर के वाइस चेयरमैन पद से इस्‍तीफा देकर 1 जनवरी 2016 से आध्यात्मिक संगठन, राधा स्वामी सत्संग ब्यास (RSSB) से जुड़ गए। RSSB का मुख्यालय अमृतसर के नजदीक है। 

 

भाई के साथ मिलकर की थी शुरुआत


2001 में शिविंदर ने अपने बड़े भाई मलविंदर मोहन सिंह के साथ मिलकर फोर्टिस हेल्थकेयर की शुरुआत की थी। बीएसई के मुताबिक वर्तमान में शिविंदर सिंह के पास कंपनी के 11,508 शेयर हैं। इनकी कीमत 35 लाख रुपए के करीब है। बता दें कि अस्पतालों की ये चेन दुनिया भर के कई देशों में काम कर रही है। 


फाइनेंशियल सर्विस फर्म  में भी शेयर 


इसके अलावा फाइनेंशियल सर्विस फर्म  रेलिगेयर इंटरप्राइजेज में सिंह ब्रदर्स की 2.51 फीसदी हिस्‍सेदारी है। इसमें शिविंदर के शेयर 1 फीसदी ( 27,26,602 )के करीब हैं। इन शेयर्स की कीमत करीब 13 करोड़ रुपए है।   आगे पढ़ें .....पाकिस्तान से आए थे भारत


 

पाकिस्तान से आए थे भारत
शिविंदर सिंह के दादा मोहन सिंह भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद रावलपिंडी से दिल्ली आ गए। उन्होंने यहां सेकेंड वर्ल्ड वार के दौरान कमाए पैसे को ब्याज पर देना शुरू किया। बड़ी दवा कंपनियों में शुमार रेनबैक्सी ने भी 2.5 लाख रुपए उनसे पैसे उधार लिए और वापस नहीं कर पाई। यही कारण था कि मोहन सिंह ने 1952 में रेनबैक्सी को अपने हाथों में ले लिया। अपने बेहतरीन मैनेजमेंट और सोच से उन्होंने कंपनी को नई ऊंचाई पर पहुंचाया। 

 

 

यह है आरोप 
बहरहाल, शिविंदर सिंह और उनके बड़े भाई पर जालसाजी का आरोप है। आरोप के मुताबिक रैलीगेयर की एक लेंडिंग आर्म ने कुछ इंडिपेंडेंट कंपनियों को 21 लोन दिए थे, लेकिन इन कंपनियों में सिंह ब्रदर्स के फर्म की भी हिस्‍सेदारी थी। लोन 30 करोड़ डॉलर के थे। सिहं ब्रदर्स पर आरोप है कि उन्‍होंने इन कंपनियों को कर्ज के नाम पर जो पैसा दिया, उसे अपनी हिस्‍सेदारी का फायदा उठाते हुए लगभग 1.6 अरब डॉलर का पर्सनल कर्ज चुकाने के लिए इस्‍तेमाल किया। 

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