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खास खबर: क्‍या क्‍वालिटी की कीमत पर बढ़ रहा है सरकारी बैंकों का बिजनेस?

पिछले 10-15 सालों में सरकारी बैंकों का धंधा तो कई गुना बढ़ा है लेकिन बैंकिंग की क्‍वालिटी में भी उसी अनुपात में गिरावट आ

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नई दिल्‍ली. सरकारी बैंक का मैनेजर आम आदमी से लेकर कॉरपोरेट तक को लोन देता , लोन की रिकवरी करता है, डिपॉजिट भी लेता है, जन धन अकाउंट भी खोलता है और बीमा प्रोडक्‍ट भी बेचता है। क्‍या एक आदमी इन सभी चीजों का एक्‍सपर्ट हो सकता है? एक पूर्व बैंकर का जवाब है- नहीं। जब आप एक साथ इतने काम करते हैं, तो किसी एक चीज में आप की एक्‍सपर्टीज नहीं हो सकती है। ऐसे में काम की क्‍वालिटी पर असर पड़ना लाजिमी है। सरकारी बैंकों में बैकिंग की क्‍वालिटी कैसे बद से बदतर होती जा रही है। इसे आप इस उदाहरण से आसानी से समझ सकते हैं।

 

10 साल में 4 गुनी बढ़ी सरकारी बैंकों की लेंडिंग 

 

 मार्च 2017 तक बैंकों ने दिया कुल कर्ज  58664 अरब  रुपए 
ग्रॉस एनपीए  11.7 %
मार्च 2007 तक बैंकों का कुल कर्ज  14691अरब  रुपए 
ग्रॉस एनपीए  2.7%

 

सरकारी बैंकों ने यह भी किया 

जन धन अकाउंट खुले   38 करोड़ 
बीमा उत्‍पाद बिके 18 करोड़ 

पिछले 10-15 सालों में सरकारी बैंकों का धंधा तो कई गुना बढ़ा है लेकिन बैंकिंग की क्‍वालिटी में भी उसी अनुपात में गिरावट आई है। पीएनबी बैंक फ्रॉड और सरकारी बैंकों का एनपीए बढ़ कर 7.50 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच जाने के बीच इस बात की पड़ताल करना जरूरी है कि क्‍या काम और टारगेट के दबाव में बैकर्स बैंकिंग की क्‍वालिटी की कीमत पर बिजनेस बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो इसका नतीजा आम आदमी को किस तरह से भुगतना पड़ रहा है। 

 

 

कैसे खराब हुई बैंकिंग की क्‍वालिटी? 

- सरकारी बैंकों पर बढ़ा कमर्शियल बैंकिंग का दबाव 

- जन-धन अकाउंट खोलने से लेकर वित्‍तीय समावेशन का काम 
- थर्ड पार्टी प्रोडक्‍ट जैसे बीमा उत्‍पाद बेचने का काम भी कर रहे बैंक 
- 10 साल तक बैंकों में भर्तिया रहीं थी ठप 
- एक्‍सपर्टीज डेवलप करने पर नहीं रहा फोकस 
- अनुभवी लोग जल्‍द होने वाले हैं रिटायर 

 

'पहले के मुकाबले गिरी है सरकारी बैंकों की क्‍वालिटी'

पिछले लगभग दो दशकों में सरकारी बैंकों का बिजनेस तो कई गुना बढ़ा लेकिन ऐसा बैकिंग की क्‍वालिटी की कीमत पर हुआ। बैंकर्स ने पूरी तरह से इस बात की जांच पड़ताल किए बिना धड़ाधड़ लोन लिए कि यह प्रोजेक्‍ट आर्थिक तौर पर वहनीय है या नहीं। अब सरकारी बैंकों को इसका खामियाजा 7.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक के एनपीए के तौर पर चुकाना पड़ रहा है। भारतीय स्‍टेट बैंक के पूर्व सीजीएम सुनील पंत ने moneybhaskar.com को बताया कि अगर आप पहले से तुलना करें तो निश्चित तौर पर सरकारी बैंकों में बैकिंग की क्‍वालिटी खराब हुई है। अब यह जरूरी हो गया है कि बैकिंग की क्‍वालिटी को सुधारा जाए वरना आम लोगों का भरोसा सरकारी बैंकों से उठ जाएगा।

 

'प्राइवेट बैंकों में हर काम के लिए अलग डिपार्टमेंट'

नेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ बैंक वर्कर्स के उपाध्‍यक्ष अश्विनी राणा का कहना है कि जब लोन देने से लेकर लोन की रिकवरी करने और म्‍युचुअल फंड बेचने तक का काम एक ही आदमी करेगा जो बैकिंग क्‍वालिटी पर असर तो पड़ेगा ही। अब तो सरकार ने आधार को अपडेट करने का काम भी बैंकों के हवाले कर दिया है। अश्विनी राणा का कहना है कि प्राइवेट बैंकों में लोन देने, लोन की रिकवरी, म्‍युचुअल फंड बेचने के लिए अलग अलग डिपार्टमेंट होता है। ऐसे में वहां बैकिंग की क्‍वालिटी बेहतर है।

 

'अर्बन, रूरल ब्रांच में क्‍वालिटी को लेकर दिक्‍कत'

पंजाब एंड सिंध बैंक के पूर्व जीएम जीएस बिंद्रा का कहना है कि सेमी अरबन और रूरल में सरकारी बैंकों की ब्रांच में क्‍वालिटी या वर्कफोर्स को लेकर दिक्‍कत है। लेकिन शहरों में जो बैंकों की ब्रांच हैं वहां अलग अलग लोग अलग तरह का काम करते हैं। वहां एक्‍सपर्टीज की दिक्‍कत नहीं है। 

 

पहले कैसे थी बैंकिंग की क्‍वालिटी? 

- पहले सरकारी बैंक करते थे साधारण बैकिंग 

- कॉरपोरेट्स और बड़े प्रोजेक्‍ट को फाइनेंस करते थे फाइनेंशियल इंस्‍टीट्यूशन 
- सरकारी योजनाओं को लागू करने की नहीं थी जिम्‍मेदारी 
- बैंक कर्मियों पर नहीं था काम का भारी दबाव 

 

'पहले काम का दबाव इतना नहीं था'

90 के दशक में भी सरकारी बैंक जमा निकासी सहित साधारण बैंकिंग करते थे। बड़े कॉरपोरेट्स और बड़े प्रोजेक्‍ट के लिए लोन देने के लिए अलग फाइनेंश्यिल इंस्‍टीट्यूशन थे। बैंक मैनेजर को जन-धन अकाउंट खोलने या बीमा उत्‍पाद बेचने की चिंता नहीं करनी पड़ती थी। बैंक मे काम करने वाले कर्मचारियों पर काम का भी दबाव भी उतना नही था। अश्विनी राणा का कहना है कि पहले सरकारी बैंकों में बैकिंग की क्‍वालिटी बेहतर थी। लोग सरकारी बैंकों पर आंख मूंद कर भरोसा करते थे। वहीं पंजाब एंड सिंध बैंक के पूर्व जीएम जीएस  बिंद्रा का कहना है कि पहले बैंक उस समय की जरूरतों के मुताबिक बैकिंग करते थे और अब लोगों की जरूरतें बदल गई हैं। ऐसे में अब बैंकों को भी अपनी एप्रोच को बदलना पड़ा है। 

 

 

आगे पढ़ें... बैंकिंग क्‍वालिटी गिरने की आम आदमी कैसे चुकाता है कीमत

आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है ये खामियाजा-  
 
- काम ज्‍यादा होने से ब्रांच में आम आदमी को बैंकिंग सेवा मिलने में देरी 
- बिजनेस के नजरिए से छोटा लोन लेने वाले बैंकों की प्रॉयरिटी में नहीं 
- बैंक मिनिमम अकाउंट बैंलेंस सहित कई सेवाओं के लिए वसूल रहे चार्ज 
- बैंकिंग की क्‍वालिटी गिरने से आम आदमी का सरकारी बैंकों पर भरोसा घटा 

 

बैंक अब लोन को लेकर ज्‍यादा सतर्क हैं

सरकारी बैंकों में बैंकिंग की क्‍वालिटी में गिरावट आने का खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ रहा है। अगर आप सरकारी बैंकों में बढ़ते एनपीए का ही असर देखें तो बैंक अब लोन को लेकर ज्‍यादा सतर्क हो गए हैं। पहले भी आम आदमी को या छोटे बिजनेस मैन को आसानी से लोन नहीं मिलता था। अब यह और मुश्किल हो गया है। बैंकों को जन-धन अकाउंट और दूसरी बीमा योनजाओं को भी लागू करना पड़ रहा है। इस पर उनका जो खर्च आ रहा है उसकी भरपाई के लिए वे आम आदमी से मिनिमम अकाउंट बैलेंस मेनेटेन न करने सहित कई दूसरी सेवाओं के लिए चार्ज वसूल रहे हैं। पहले इन सेवाओं के लिए लोगों को कोई पैसा नहीं देना पड़ता था। सुनील पंत का कहना है कि आने वाले समय में यह हो सकता है कि सरकारी बैंक में आपको कोई भी सेवा मुफ्त में न मिले। 

 

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