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PNB फ्रॉडः आरोपी इम्‍प्‍लॉई का 7 साल में 3 बार कैंसिल हुआ ट्रांसफर, रिटायर होने पर खुली पोल

नई दिल्‍ली. पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में 11,356 करोड़ रुपए के फ्रॉड को अंजाम देने में अहम भूमिका निभाने वाले इम्‍प्‍लॉई गोकुलनाथ शेट्टी का 7 साल में 3 बार ट्रांसफर कैंसिल किया गया। सूत्रों के मुताबिक, आरोपी इम्‍प्‍लॉई का ट्रांसफर इंटरनल रिक्‍वेस्‍ट पर कैंसिल किया गया। आरोपी इम्‍प्‍लॉई स्विफ्ट ऑपरेशन की जिम्‍मेदारी लगातार 7 साल तक संभालता रहा। इस घोटाले को स्विफ्ट से फर्जी मैसेज भेज कर अंजाम दिया गया। इसका मतलब यह है कि इस घोटाले में बैंक के शीर्ष प्रबंधन के अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं। 

 

बैंक के इंपोर्ट सेक्‍शन में तैनात था शेट्टी 

गोकुलनाथ शेट्टी बैंक पीएनबी के फॉरेन एक्‍सचेंज डिपार्टमेंट के इम्‍पोर्ट सेक्‍शन में मार्च 2010 से अपने रिटायरमेंट यानी मई 2017 तक तैनात था। शेट्टी का ट्रांसफर ऑर्डर तीन बार कैंसिल किया गया। इसके लिए हवाला दिया गया कि ट्रांजैक्‍शन की जटिल प्रकृति को देखते हुए कई इम्‍प्‍लॉई इम्‍पोर्ट सेक्‍शन में काम करने को लेकर उदासीन हैं। वहीं सूत्रों का कहना है कि पीएनबी संवदेनशील काम से जुड़े अधिकारियों का ट्रांसफर तीन साल पर कर देता है। 


आरोपी इम्‍प्‍लॉई के रिटायर होने पर खुली पोल 

सूत्रो के मुताबिक जब आरोपी इम्‍प्‍लॉई रिटायर हो गया और उसकी जगह पर दूसरा इम्प्‍लाई आया तो उसने देखा कि बिना लिमिट के ही पार्टी को लेटर ऑफ अंडरटेकिंग यानी एलओयू जारी की जा रही है तो उसने बैंक के इंटरनल सिस्‍टम को रिपोर्ट किया। नियम के मुताबिक लिमिट के बिना किसी पार्टी को एलओयू जारी नहीं किया जा सकता है। 

 

कर्मचारियों ने कैसे बायपास किया सिस्‍टम ?

- बैकिंग इंडस्‍ट्री से जुड़े सूत्रों ने moneybhaskar.com को बताया- किसी भी बैंक में कम से कम दो कर्मचारी ट्रांजैक्‍शन को अथॉराइज करते हैं। इस मामले में बैंक के दोनों कर्मचारी आरोपी पार्टी से मिल कर काम कर रहे थे। इस मामले में जब पार्टी यानी नीरव मोदी और उनके सहयोगी पीएनबी में लेटर ऑफ अंडरटेकिंग के लिए आए तो पीएनबी के कर्मचारियों ने उनको एलओयू जारी कर दिया।

- नियमों के मुताबिक पीएनबी को इस एलओयू को बैंक की बुक में दर्ज करना चाहिए था। यानी बैंक के कोर बैंकिंग सिस्‍टम में दर्ज करना चाहिए था। लेकिन कर्मचारियों ने ऐसा नहीं किया। इसके अलावा कर्मचारियों ने स्विफ्ट फाॅर्मेट में कोडेड मैसेज दूसरे बैंक को जारी कर दिया।इसके साथ ही पार्टी ने अपने लिए भी इलेक्‍ट्रॉनिक मैसेज जारी करा लिया। पार्टी ने बाद में इस मैसेज के आधार पर हजारों करोड़ दूसरे बैंक से जारी करा लिए।

 

होना क्या चाहिए था? यानी नियम क्या है?

- सूत्रों का कहना है कि नियम के मुताबिक, किसी पार्टी को एलओयू जारी करने से पहले उसकी लिमिट देखी जानी चाहिए थी। इस मामले में नीरव मोदी के पास कोई लिमिट नहीं थी। जब पीएनबी का एक कर्मचारी रिटायर हो गया और उसकी जगह पर दूसरा कर्मचारी आया। उसने देखा कि इस पार्टी को बिना लिमिट के ही एलओयू जारी किया जा रहा है। इसके बाद 31 दिसंबर को उस कर्मचारी ने बैंक के इंटरनल सिस्‍टम को रिपोर्ट किया। इसके बाद पीएनबी ने दूसरे रेग्युलेटर्स को इस बारे में बताया। यह घोटाला बैंकिंग सिस्‍टम को पूरी तरह से बायपास करके किया गया है। अगर सिस्‍टम को पूरी तरह से फॉलो किया जाता तो यह घोटाला मुमकिन ही नहीं था। 

  

बैंक में चेक एंड बैलेंस सिस्‍टम की खुली पोल 

- सूत्रों का कहना है कि फ्रॉड के इस मामले ने बैकों में चेक एंड बैलेंस सिस्‍टम पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। अगर दो कर्मचारी संबंधित पार्टी (लोन लेने वाले शख्स या संस्था) के साथ मिल कर फ्रॉड कर रहे थे तो इतनी बड़ी रकम एक ही पार्टी को जाती रही। टॉप लेवल पर किसी ने कोई ध्‍यान क्‍यों नहीं दिया। इसके अलावा बैंक के इंटरनल ऑडिट और रिजर्व बैंक के इंस्‍पेक्‍शन में भी यह बात सामने ना आना शक पैदा करता है। 


कैसे हुआ फ्रॉड?

- बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले को लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) के माध्यम से अंजाम दिया गया। यह एक तरह की गारंटी होती है, जिसके आधार पर दूसरे बैंक अकाउंटहोल्डर को पैसा मुहैया करा देते हैं।

- अब यदि अकाउंटहोल्डर डिफॉल्ट कर जाता है तो एलओयू मुहैया कराने वाले बैंक की यह जिम्मेदारी होती है कि वह संबंधित बैंक को ड्यूज का पेमेंट करे। 

- समझा जाता है कि पीएनबी के मामले में संदिग्ध ट्रांजैक्शन बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के जरिए हुआ।

- पीएनबी ने भले ही दूसरे लेंडर्स के नाम का जिक्र नहीं किया। लेकिन समझा जाता है कि पीएनबी द्वारा जारी एलओयू के आधार पर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक और एक्सिस बैंक ने भी क्रेडिट ऑफर कर दिया था।

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