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बैंकों के हर 100 में से 76 रु डुबा रहे हैं नीरव-माल्या जैसे कॉरपोरेट, किसान-SME की हिस्सेदारी कम

नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे कॉरपोरेट बैंकों को कैसे खोखला कर रहे हैं, वह आरबीआई के नए आंकड़ों से साफ हो जाता है।

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नई दिल्ली।  नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे कॉरपोरेट बैंकों को कैसे खोखला कर रहे हैं, वह आरबीआई के नए आंकड़ों से साफ हो जाता है। बैंकों के कुल डूबे लोन (एनपीए) में से 76 फीसदी पैसे बड़े कॉरपोरेट डुबा रहे हैं। यानी अगर किसी बैंक के 100 रुपए डूबते हैं तो उसमें से 76 रु प्रमुख तौर पर कॉरपोरेट द्वारा डुबाए जाते हैं। जबकि बाकी रकम, छोटे कारोबारी, किसान, होम लोन, एजुकेशन लोन लेने वाले कस्टमर की वजह से डूब रही है। खास बात यह है कि पिछले 4 साल में कॉरपोरेट्स के लोन डिफॉल्ट की हिस्सेदारी काफी तेजी से बढ़ी है। साल 2013 में यह 59 रु के लेवल पर थी। यानी बैंकों के डूबे 100 रु में कॉरपोरेट की हिस्सेदारी 59 रु हुआ करती थी।

 
कैसे बढ़ता गया कॉरपोरेट फ्रॉड
 
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार गैर प्राथमिकता वाले सेक्टर (जिसके तहत प्रमुख रुप से कॉरपोरेट लोन आते है)  की साल 2017 में बैंकों के ग्रॉस एनपीए में 76.6 फीसदी हिस्सेदारी थी। जबकि प्राथमिकता वाले सेक्टर (एग्री लोन, एजुकेशन, होम और माइक्रो एंड स्मॉल सेक्टर को दिए गए लोन) की हिस्सेदारी 23.4 फीसदी थी। रिपोर्ट के अनुसार पिछले 4 साल में यह हिस्सेदारी काफी तेजी से बढ़ी है। साल 2013 में  गैर प्राथमिकता वाले सेक्टर (जिसके तहत प्रमुख रुप से कॉरपोरेट लोन आते है) की हिस्सेदारी कुल एनपीए में 59 फीसदी थी, जो 2014 में बढ़कर 64.4 फीसदी, 2015 में 65.7 फीसदी, 2016 में 74.9 फीसदी पहुंच गई।
 
एसबीआई पर सबसे ज्यादा इम्पैक्ट
 
आरबीआई  आंकड़ों के अनुसार गैर प्राथमिकता वाले सेक्टर (जिसके तहत प्रमुख रुप से कॉरपोरेट लोन आते है) द्वारा किए गए डिफॉल्ट का सबसे ज्यादा असर एसबीआई को हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार एसबीआई में गैर प्राथमिकता वाले सेक्टर के जरिए हुए एनपीए की हिस्सेदारी 82.4 फीसदी है। जो कि पिछले 4 साल से लगातार बढ़ रहा है। साल 2013 में यह हिस्सेदारी केवल 55.9 फीसदी थी जो कि अब 82 फीसदी तक पहुंच गई है। इसी तरह प्राइवेट सेक्टर  बैंकों में यह हिस्सेदारी पिछले 4 साल में 74 फीसदी से बढ़कर 82 फीसदी तक पहुंच गई है।
 
सख्ती की वजह से एनपीए आ रहे हैं सामने
 
बैंकर जी.एस.बिंद्रा के अनुसार पिछले 3-4 साल में एनपीए की समस्या काफी बड़ी हो गई है। इसकी वजह इकोनॉमिक स्लोडाउन के साथ-साथ नियमों का सख्त होना भी रहा है। आरबीआई ने कई ऐसे कदम उठाएं है जिसकी वजह से बैंक अब अंडर रिपोर्टिंग नहीं कर  सकते हैं। इसकी वजह से एनपीए भी काफी तेजी से सामने आ रहे हैं। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार सितंबर 2017 तक अकेले पब्लिक सेक्टर बैंकों का एनपीए 8 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।
 
देश में 9063 विलफुल डिफॉल्टर
 
वित्त मंत्रालय के अनुसार  दिसंबर 2017 तक देश में कुल 9063 विलफुल डिफॉल्टर है। यानी ये ऐसे लोग हैं जो कि कर्ज चुकाने की क्षमता रखते हैं लेकिन जानबूझ कर कर्ज नहीं चुका रहे हैं। सरकार के अनुसार अकेले इन 9063 लोगों पर 1.10 लाख करोड़  रुपए से ज्यादा का लोन बैंकों पर बकाया है।
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