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बाजार /अगले दशक में संपत्ति का सृजन

  • 2009 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डाॅलर के बराबर था, 2018 में 2.7 हो गया

Moneybhaskar.com

Sep 24,2019 03:33:00 PM IST

नई दिल्ली. दुनिया पहले से कहीं ज्यादा तेजी से बदल रही है और आज हमारे जीवन में टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव के कारण इतने अधिक लोग हमसे जुड़ते जा रहे हैं, जितने पहले कभी नहीं जुड़े हैं। मौजूदा दौर में जबकि एक साल की अवधि को भी बहुत लंबा माना जाता है, वहां महान फ्रांसीसी ज्योतिषी नास्त्रेदमस के भी लिए भी शायद यह भविष्यवाणी कर पाना कि एक दशक बाद दुनिया कहां होगी- निश्चित तौर पर एक मुश्किल काम होगा और हो सकता है कि इस काम में उनके पसीने ही छूट जाएं। हालांकि इस दौर में भी अगर कुछ निश्चित हो सकता है, तो वह यह कि धन सृजन के लिए प्रयास ठीक उसी तरह जारी रहेंगे, जैसे कि अतीत में रहे हैं।

कम से कम कहने के लिए तो पिछला दशक घटनापूर्ण रहा है।

2009 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डाॅलर के बराबर था, 2018 में 2.7 हो गया

10 साल पहले, 2009 में, दुनिया ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के झटके से उबर रही थी। इस संकट ने पूरे विश्व को व्यापक नुकसान पहुंचाया और वित्तीय बाजारों में निवेशकों का विश्वास डगमगाने लगा। अगर किसी ने 2009 में संपत्ति सृजन के बारे में बात की होगी, तो यह उसके लिए एक अप्रिय स्थिति रही होगी। हालांकि यह ध्यान देने योग्य बात है कि चीजें तब से कैसे बदलती रही हैं। 31 जुलाई 2009 तक निफ्टी 50 सूचकांक 4,600 अंकों पर था, यह 31 जुलाई 2019 तक 2.4 गुना बढकर 9 प्रतिशत सीएजीआर की दर से 11,000 अंकों तक पहुंच गया है। यह वृद्धि भारत के सकल घरेलू उत्पाद के दो गुना से अधिक विकास के साथ है। 2009 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर था, जो 2018 में 2.7 ट्रिलियन अमेरिकी डाॅलर के बराबर हो गया। हालांकि पिछले दशक में हम विभिन्न वैश्विक और घरेलू घटनाओं के साक्षी भी बने, जैसे सत्यम घोटाला, यूरोपीय साॅवरिन ऋण संकट, टेपर टैंट्रम, डिमोनेटाइजेशन, जीएसटी का लागू होना, ट्रेड वाॅर आदि।

अगले 6 वर्षों के समय में भारत जहां खुद को देखता है, उस संदर्भ में एक मानक निर्धारित करता है

इस दौरान इक्विटी में निवेश राशि पर अर्थव्यवस्था की वृद्धि के अनुरूप प्रतिफल प्राप्त हुआ।लंबे समय में पूंजी में वृद्धि और आर्थिक विकास के बीच यह संबंध तब और भी प्रासंगिक हो जाता है जब हम दीर्घ अवधि में संपत्ति सृजन के लिए इक्विटी में निवेश करना जारी रखते हैं, विशेषकर एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां आने वाले वर्षों में जीडीपी में वृद्धि होने की उम्मीद रहती है। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पहले बजट में भारत की अर्थव्यवस्था को 2025 तक 5 ट्रिलियन अमरीकी डालर तक पहुंचाने के लिए एक विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत किया गया, जिसके लिए 9 प्रतिशत की मामूली वृद्धि दर की आवश्यकता है। हालांकि 5 ट्रिलियन अमरीकी डालर की अर्थव्यवस्था को इस स्तर पर सिर्फ एक संख्या या एक लक्ष्य माना जा सकता है, फिर भी यह अगले 6 वर्षों के समय में भारत जहां खुद को देखता है, उस संदर्भ में एक मानक निर्धारित करता है।


ऐसे समय के दौरान ही निवेशक की सूक्ष्म परीक्षा होती है

जैसे-जैसे चीजें बदलती हैं, घरेलू और वैश्विक दोनों वित्तीय बाजार लगभग एक समान प्रतिकूल हालात का सामना करते हैं, जैसे कम खपत और धीमा विकास, व्यापार युद्ध, भू-राजनीतिक मुद्दों आदि। ऐसे विपरीत हालात में खुदरा निवेशक घबरा जाते हैं और वे अपने निवेश को बेचने लगते हैं, चाहे इच्छित रिटर्न हासिल हो अथवा नहीं। हालांकि अगर हम इतिहास से सीखने का प्रयास करें, तो ऐसे समय के दौरान ही निवेशक की सूक्ष्म परीक्षा होती है।
दीर्घ अवधि में मजबूत फंडामेंटल वाली कंपनियों में किए गए निवेश में अस्थायी उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है पर यहां निवेशकों के लिए धन का सृजन होता है। दूसरी बात यह कि हालांकि अल्पावधि में अन्य परिसंपत्ति वर्गों की तुलना में इक्विटी निश्चित रूप से अधिक अस्थिर है, लेकिन इक्विटी रिटर्न लंबी अवधि में देश की आर्थिक वृद्धि को ही दर्शाता है।

म्युचुअल फंड में एसआईपी अस्थिर बाजार की स्थितियों पर काबू पाने का एक प्रभावी तरीका है

म्युचुअल फंड में एसआईपी का रास्ता अपनाना अपने आवेगपूर्ण व्यवहार को रोकने और अस्थिर बाजार की स्थितियों पर काबू पाने का एक प्रभावी तरीका है। इसके अलावा, कोई भी इक्विटी, डेट और गोल्ड जैसे विभिन्न परिसंपत्ति वर्गों में विविधता लाने के लिए अच्छा प्रयास करेगा। अगले दशक में जो महत्वपूर्ण ट्रेंड्स चर्चा में रहेंगे, उनमें ईंधन वाले वाहनों से इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) में बदलाव, सौर ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत के रूप में उभरना और तेल उत्पादन की बढ़ती गतिशीलता और ईवी की वृद्धि के कारण तेल उत्पादन और मांग की गतिशीलता में बदलाव आना प्रमुख हैं। ये रुझान भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं और लंबे समय में धन सृजन की क्षमता पैदा कर सकते हैं। निवेश की दुनिया में, संपत्ति सृजन के लिए निरंतर प्रयास करना ही एकमात्र स्थायी काम है, हालांकि संपत्ति सृजन के विषय और इसके कारक समय-समय पर बदल भी सकते हैं।

लेखक: मिस. श्यामली बासु, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट एंड हेड- प्रॉडक्ट्स एवं मार्केटिंग, एचडीएफसी एसेट मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड

नोट : आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अपने विचार हैं और जरूरी नहीं कि वे एचडीएफसी एसेट मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड (एचडीएफसी एएमसी) के विचारों से मेल खाते हों। विचार एक निवेश संबंधी सलाह नहीं हैं। किसी भी प्रकार की प्रतिभूतियों में निवेश करने का निर्णय लेने से पहले निवेशकों को अपनी स्वतंत्र सलाह लेनी चाहिए। म्युचुअल फंड निवेश बाजार की जोखिम के अधीन हैं, स्कीम संबंधी सभी दस्तावेजों को ध्यान से पढ़ें।

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