पर्सनल फाइनेंस /म्युचुअल फंड में मिलती है 'साइड पॉकेट’ की सुविधा, जानिए इसके बारे में

  • साइड पॉकेटिंग नेट एसेट वैल्यू (NAV) में स्थिरता लाने में मदद करती है।

Moneybhaskar.com

Jul 01,2019 05:28:03 PM IST

नई दिल्ली.

IL&FS के डिफॉल्ट के बाद म्युचुअल फंडों को मुश्किल दौर का सामना करना पड़ा। इसके बाद लंबे समय से बार-बार एक शब्द सुनने में आया। वह है साइड पॉकेटिंग। आईएलएंडएफएस के डिफॉल्ट कर जाने के बाद म्युचुअल फंड इंडस्ट्री चाहती थी कि संकटग्रस्त कंपनियों के बॉन्डों में निवेश कर चुकी स्कीमों को साइड पॉकेटिंग की इजाजत मिले। बाजार नियामक सेबी ने इसकी अनुमति दे दी। अब कुछ स्कीमों ने साइड पॉकेटिंग शुरू कर दी है। अगर आप भी म्युचुअल फंड में निवेश करते हैं तो आपके लिए भी इसके बारे में जानना जरूरी है।

NAV में स्थिरता लाता है साइड पॉकेट

साइड पॉकेट एक विकल्प है। इसका इस्तेमाल डेट पोर्टफोलियो में जोखिम वाले एसेट को अन्य लिक्विड एसेट से अलग करने के लिए होता है। दरअसल, बॉन्डों की क्वालिटी का डेट पोर्टफोलियो के क्रेडिट प्रोफाइल पर असर पड़ता है। अकाउंटिंग के इस तरीके को अपनाकर छोटे निवेशकों को उस वक्त बचाया जा सकता है जब अचानक बड़े निवेशक स्कीम से पैसा निकालना शुरू कर दें। साइड पॉकेटिंग नेट एसेट वैल्यू (NAV) में स्थिरता लाने में मदद करती है। स्कीम से अचानक पैसा निकालने की रफ्तार को रोकती है।

इसमें तैयार होती हैं दो स्कीम

इस प्रक्रिया में पोर्टफोलियो में डिफॉल्ट कैटेगरी में शामिल इंस्ट्रूमेंट को दूसरों से अलग करते हैं। इससे दो स्कीमें तैयार हो जाती है। एक में वे इंस्ट्रूमेंट या बॉन्ड होते हैं जिनमें लिक्विडिटी नहीं होती है और दूसरे में वे जिनमें अच्छी लिक्विडिटी होती है।

निवेशकों के है उपयोगी

मान लेते हैं कि एक फिक्स्ड इनकम फंड है जिसका एयूएम 1,000 करोड़ रुपए है। अपने पोर्टफोलियो का 5 फीसदी या 50 करोड़ इस फंड ने उस कंपनी में लगाया जो डिफॉल्ट कर गई। यानी बाकी का 950 करोड़ रुपए अच्छे इंस्ट्रूमेंट में है। एक कंपनी के डिफॉल्ट के कारण कई बड़े निवेशक और नुकसान से बचने के लिए अमूमन स्कीम से पैसा खींचने लगते हैं। इन निवेशकों को भुगतान करने के लिए मजबूरन फंड मैनेजर अच्छे बॉन्डों को बेचते हैं। जबकि खराब वाले स्कीम में बने रहते हैं। कारण है कि इन्हें खरीदने वाले लिवाल बाजार से गुम हो जाते हैं।

निवेशकों को आसानी से मिल जाता है पैसा

इस स्थिति में पोर्टफोलियो में खराब एसेट की होल्डिंग बढ़ती है। इससे एनएवी में तेज गिरावट आती है। लिहाजा, निवेशकों को नुकसान होता है। इन हालात से बचने के लिए फंड प्रभावित कंपनी के डेट पेपरों (बॉन्ड) को अलग कर देता है। जबकि बाकी के अच्छे बॉन्ड मूल फंड में बने रहते हैं। ओरिजनल फंड के सभी निवेशकों को साइड पॉकेट किए गए फंडों की भी यूनिटें मिलती हैं। जब कभी प्रभावित कंपनी पैसे लौटाती है। निवेशक अपने पैसे पा जाते हैं।

सतर्कता से करें साइड-पॉकेटिंग का इस्तेमाल

साइड-पॉकेटिंग का इस्तेमाल बड़ी सतर्कता से करना चाहिए। विश्लेषक कहते हैं कि डिफॉल्ट एसेट के वैलुएशन का असर चूंकि अच्छे इंस्ट्रूमेंट पर पड़ता है। इसलिए खराब एसेट की वैल्यू का पता लगाना कठिन होता है। निवेशकों को अक्सर दो तरह की एनवीवी को ट्रैक करने में कठिनाई आती है। फंड हाउस को मैनेजरों की फीस बचाने के लिए साइड पॉकेट का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

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