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खास खबर: सुस्त लेबर रिफॉर्म क्या छीन लेगा नौकरियां, ऑटोमेशन का बढ़ा खतरा

नई दिल्‍ली। जीएसटी, नोटबंदी जैसे बड़े सुधार का दावा करने वाली मोदी सरकार के सामने लेबर रिफॉर्म के नाम पर बहुत कुछ कहने को नहीं है। पॉलिटिकल इश्यू की वजह से सरकार ने शुरूआत में जो रिफॉर्मिस्ट रुख अपनाया था, उससे वह अब पीछे हट गई है। इसकी वजह से हायर एंड फायर जैसी पॉलिसी चाहने वाली इंडस्ट्री  में अब ऑटोमेशन का खतरा बढ़ता जा रहा है। यानी कंपनियां नौकरी देने की जगह मशीन पर ज्यादा भरोसा करेंगी। फिलहाल सरकार के पास फिक्सड टर्म इम्प्लयामेंट कानून के अलावा लेबर रिफॉर्म पर कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। चुनावी साल में अब सरकार सोशल सिक्युरिटी के जरिए अब बड़े वर्ग को फायदा पहुंचाना चाहती है।

 

 

राज्यों पर टाला रिफॉर्म

 

मोदी सरकार ने सत्‍ता में आने के बाद लेबर रिफॉर्म पर तेजी दिखाई लेकिन इन सुधारों पर विरोध को देखते हुए सरकार ने इसे राज्‍यों पर छोड़ दिया।सरकार का तर्क है कि जो राज्‍य अपने यहां निवेश आकर्षित करना चाहते हैं या ईज ऑफ डुइंग बिजनेस केा बढ़ावा देना चाहते हैं वे अपने यहां लेबर रिफॉर्म को आगे बढाएं। राजस्‍थान और गुजरात ने लेबर रिफॉर्म पर जरूर कुछ कदम उठाए हैं बाकी राज्‍यों में इस मोर्चे पर कुछ खास काम नहीं हुआ है। मोदी सरकार ने बोनस एक्‍ट, ग्रेच्‍युटी पेमेंट एक्‍ट में संशोधन और मैटरनिटी बेनेफिट को लेकर ऐसे कदम जरूर उठाएं है जिससे नौकरी करने वालों के लिए वर्किंग कंडीशन में सुधार हुआ है। 

 

विरोध को देखते हुए पीछे हटी सरकार 

 

क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्‍ट डीके जोशी ने moneybhaskar.com को बताया कि मोदी सरकार ने कार्यकाल की शुरुआत में ही लेबर रिफॉर्म पर काम शुरू किया था लेकिन इस पर विरोध को देखते हुए सरकार ने यह काम राज्‍यों पर छोड़ दिया। अगर लेबर रिफॉर्म की बात करें तो सरकार ने फिक्‍स्ड टर्म इम्‍पलॉयमेंट को लेकर बड़ा कदम उठाया है। इससे इंडस्‍ट्री को भी फायदा होगा और इससे नौकरियां भी पैदा होंगी। लेकिन बाकी प्रस्‍तावित सुधारों पर मोदी सरकार कुछ खास नहीं कर सकी है। सरकार का राज्‍यसभा में बहुमत नहीं है। ऐसे में उनके लिए बड़े लेबर रिफॉर्म को राज्‍यसभा में पारित कराना भी आसान नहीं है। इसके अलावा भारतीय मजदूर संघ जैसे ट्रेड यूनियन के विरोध की वजह से भी सरकार की राह मुश्किल हुई है। 

 

इन सुधारों पर आगे बढ़ी सरकार 

 

केंद्र सरकार ने सोशल सिक्‍योरिटी कोड, 2018 का मसौदा तैयार किया है। इसके तहत लगभग 50 करोड़ वर्कर्स को पीएफ, पेंशन, मेडिकल बेनेफिट सहित 10 बेनेफिट मुहैया कराए जाएंगे। ट्रेड यूनियन भारतीय मजदूर संघ के महासचिव विरजेश उपाध्‍याय का कहना है कि सोशल सिक्‍योरिटी कोड से देश में काम करने वाले लगभग सभी लोगों को सोशल सिक्‍योरिटरी बेनेफिट मुहैया कराया जाएगा। इसमें असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले भी शामिल हैं। इसके अलावा लेबर मिनिस्‍ट्री ने लेबर कोड ऑन आक्‍युपेशनल सेफ्टी, हेल्‍थ एंड वर्किंग कंडीशन, 2018 का मसौदा भी जारी किया है। सरकार ने इस मसौदे पर 31 मई तक टिप्‍पणी देने को कहा है। इसके अलावा केबिनेट कोड ऑन वेजेज को मंजूरी दे चुकी है। इसे संसद में पारित कराया जाना बाकी है। कोड ऑन वेजेज सभी सेक्‍टर में काम करने वालो को मिनिमम वेज सुनिश्चित करेगा। सभी राज्‍यों को भी इस मिनिमम वेज को अपने यहां लागू करना होगा। 

 

लेबर कोड ऑन इंडस्ट्रियल रिलेशंस बिल पर कदम पीछे खींच चुकी है सरकार 

 

केंद्र सरकार लेबर कोड ऑन इं‍डस्ट्रियल रिलेशंस बिल से जुड़े दो प्रस्‍तावों को वापस ले चुकी है। एक प्रस्‍ताव में कहा गया था कि ऐसी फैक्ट्रियां जिनमें 300 कर्मचारी तक काम करते हैं सरकार की अनुमति के बिना कर्मचारियों की छंटनी कर सकती है या यूनिट को बंद कर सकती है। दूसरे प्रस्‍ताव में कहा गया था कि किसी यूनिट की ट्रेड यूनियन के पदाधिकारी के लिए उस यूनिट में नौकरी करना जरूरी होगा। ट्रेड यूनियनों के विरोध को देखते हुए आने वाले समय में भी इस पर सरकार की ओर से किसी पहल के संकेत नहीं मिल रहे हैं। 

 

मशीनों के इस्‍तेमाल को बढ़ावा दे सकती है इंडस्‍ट्री 

 

डीके जोशी का कहना है कि अगर देश में लेबर लॉज को मौजूदा समय की इंडस्‍ट्री की जरूरतों के अनुरूप लचीला नहीं बनाया जाता है तो खतरा इस बात का है कि इंडस्‍ट्री मशीनों के इस्‍तेमाल को बढ़ावा दे सकती है। खास कर मैन्‍यूफैक्‍चरिंग सेक्‍टर में। ऐसे में युवाओं को नौकरियां नहीं मिल पाएंगी। इसके अलावा जापान सहित कई देश भारत में मौजूदा श्रम कानून को लेकर शिकायत दर्ज करा चुके हैं। 

 

 

 

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