गौरव /दिग्विजय ने जिन राजा भोज का जिक्र किया, उन्होंने एक हजार साल पहले बसाया था देश का सबसे प्लांड शहर

  • राजा भोज नगर नियोजक ही नहीं थे बल्कि आला दर्जे के इंजीनियर भी थे
  • भोज ने बनाया था ऐसा तालाब कि लोग दांतों तले अंगुली चबा जाएं 
  • लेखक विजय मनोहर तिवारी ने बताया कैसे बसाया था राजा भोज ने भोपाल शहर 
  • रिसचर्स संगीत वर्मा और नेहा तिवारी ने किया है सेटेलाइट इमेजरी के जरिए किया है शोध 
     

money bhaskar

Apr 21,2019 04:33:01 PM IST

नई दिल्ली. कुलदीप सिंगोरिया
गैस त्रासदी जैसी दुखद घटना के बाद एक बार फिर भोपाल देश ही नहीं बल्कि विदेशों में एक वजह से चर्चा में हैं। चर्चा का केंद्र है भोपाल में लोकसभा चुनाव के प्रत्याशी। एक हैं भगवा आतंकवाद शब्द के जनक कहे जाने वाले कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह तो दूसरी ओर हैं भाजपा से आतंकवाद की आरोपी रहीं साध्वी प्रज्ञा ठाकुर। दिग्विजय ने बंटाढार की छवि को दूर करने के लिए सिंह ने रविवार को भोपाल का विजन डॉक्यूमेंट पेश किया। सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने पहले राजा भोज की जिक्र किया। वहीं राजा भोज जिनके नाम पर भोजपाल और बाद भोपाल नामकरण हुआ। यह भी जानना दिलचस्प है कि राजा भोज द्वारा भोपाल की बसाहट को लेकर इतिहासकारों में मतभेद भी है। कुछ इतिहासकार मुस्लिम शासक दोस्त मोहम्मद खान को भोपाल का श्रेय देते हैं तो कुछ राजा भोज को। छवि निखारने में लगे दिग्विजय ने राजा भोज का जिक्र कर हिंदुओं को लुभाने की कोशिश की है। वरिष्ठ लेखक विजय मनोहर तिवारी ने मनी भास्कर को इस मामले में सारे तथ्य उजागर किए हैं। उन्होंने विभिन्न रिसर्चों का हवाला देते हुए बताया कि कैसे एक हजार साल पहले देश का सबसे नियोजित शहर भोपाल बसाया गया।

रिसर्च जिससे साबित होता है भोज का भोपाल

बीते चार-पांच सालों से रिसचर्स संगीत वर्मा और पुरातात्विक शोध करने वाली नेहा तिवारी ने सेटेलाइट इमेजरी के जरिए इस विषय में गहन अध्ययन किया है। उनके मुताबिक राजा भोज की किताब समरांगण सूत्रधार में बताई गई डिजाइन हूबहू भोपाल से मिलती है। रिसचर्स ने किताब में बताए गए सारे नाप-जोख को भोपाल के नक्शे पर रख कर देखा तो यह एकदम ग्रिड में बैठा।

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लेखक श्री विजय मनोहर तिवारी की जुबानी पढ़िए भोपाल का इतिहास

एक साल पुराने नक्शे पर देश के शायद ही किसी और शहर की बसाहट इतनी स्पष्ट हो, जितना मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की है। यह बात तो सब जानते हैं कि परमार वंश के महान् राजा भोज ने भोपाल शहर को बसाया था। भोपाल का बड़ा तालाब भी जिस विशाल बांध पर बना, वह भी राजा भोज ने ही बनवाया था। सिर्फ यही नहीं, भोपाल से भोजपुर के बीच ऐसी कई संरचनाएं आज भी नज़र आती हैं, जिनका निर्माण भोज के समय हुआ। लेकिन मंदिरों और तालाबों से हटकर शहर की प्लानिंग का एक अलग ही महत्त्व है। खुशकिस्मती है कि समय का इतना अंतराल होने के बावजूद अपने मूल डिज़ाइन में भोपाल आज भी दर्शनीय है...

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हर दीवार 660 मीटर लंबी

राजा भोज का समय है ईसवी सन् 1010 से 1050 बीच। यानी पूरे एक हजार साल पहले। तब भोज ने जिस शहर का डिज़ाइन बनाया था, वह आज के जुमेराती गेट, पीरगेट, इब्राहिमपुरा और इतवारा के बीच था। वह एक स्मार्ट टाउन प्लानिंग की आदर्श मिसाल है। गूगल मैप से आज भी उस नक्शे को एकदम स्पष्ट देखा जा सकता है। वह छोटा-सा भोपाल तब 12 दरवाज़ों के साथ एक चौकोर चारदीवारी से घिरा हुआ था। हर एक दीवार की लंबाई 660 मीटर थी। दुर्ग की चारदीवारी से सटकर चारों तरफ शहर को घेरने वाला एक रिंगरोड भी था। दुर्ग की दीवार के बाहर एक गहरी खाई सुरक्षा के मद्देनज़र थी। खास बात यह है कि बड़े तालाब का पानी इस खाई से होकर चारों तरफ बहता हुआ नीचे की तरफ ओवरफ्लो होता था। उस डिज़ाइन के अनुसार बनाए गए शहर के बीचों-बीच था एक विशाल चौराहा, जो आज का चौक बाज़ार है।

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डिज़ाइन का आधार समरांगण सूत्रधार

ख्यात शोधकर्ता संगीत वर्मा और नेहा तिवारी ने पाँच साल पहले एक केस स्टडी की-“सिटी प्लानिंग ऑफ़ राजा भोज इन समरांगण सूत्रधार।” राजा भोज और उनके बनाए तालाब और भोपाल शहर का सामान्य ज्ञान इसके पहले सबको था। इस केस स्टडी से भोज की कल्पना के भोपाल का असल डिज़ाइन पहली बार सामने आया। संगीत वर्मा का कहना है कि 660 मीटर लंबाई की चारों दीवारों के भीतर 90 डिग्री पर एक-दूसरे को काटती सड़कों का जाल बिछाया गया था और इनके बीच अलग-अलग इस्तेमाल के लिए बसाहटें तय हुई थीं। अधिकारी, कर्मचारी, कारोबारी, कारीगर, पुरोहित और सेना के ठिकाने कहाँ होंगे, यह तय था। किसी आपात स्थिति में अगर शहर को खाली करना पड़े तो हर ब्लॉक से बाहर जाने के लिए दो दिशाओं में दरवाजे थे। भोज के वास्तु ज्ञान और भोपाल के डिजाइन की पुष्टि “समरांगण सूत्रधार” नाम की एक किताब से की गई है। यह राजा भोज की ही लिखी वास्तु पर बेशकीमती किताब है। इसमें बताए गए तरीकों से बाकायदा वही डिज़ाइन बनता है, जैसा पुराने भोपाल का हमने देखा। भोपाल के स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर ने तो इस केस स्टडी के बाद समरांगण सूत्रधार को पीजी कोर्स में शामिल किया था। इतना ही नहीं स्कूल के तत्कालीन डीन प्रोफेसर अजय खरे ने राजा भोज की राजधानी धार पर भी ऐसी ही एक केस स्टडी कराई थी।

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शहर के केंद्र में ब्रह्मस्थान की कल्पना

शहर के एकदम बीच सबसे बड़ा चौराहा आज का चौक बाजार है, जहाँ चारों दीवारों के बीच में बने प्रमुख प्रवेश द्वारों से आए रास्ते एक दूसरे को 90 डिग्री पर काटते हैं। मप्र आदिवासी एवं लोककला अकादमी के पूर्व निदेशक और भारतीय संस्कृति के जाने-माने अध्येता डॉ. कपिल तिवारी का मानना है कि राजा भोज सिर्फ एक शासक नहीं थे। वे कई विषयों के ज्ञाता भी थे। वास्तु और सिटी प्लानिंग की उनकी समझ अद्भुत है। मैं शहर के बीचों-बीच ब्रह्मस्थान की कल्पना से अभिभूत हूँ। एक शहरी बसाहट में यह एक दार्शनिक शाासक की संसार को सबसे बड़ी देन है। सवाल यह है कि इस ब्रह्मस्थान पर भोज के समय क्या बनाया गया था? सन् 1720 के बाद भोपाल में नवाबों की सल्तनत शुरू हुई। यहाँ कई बेगमों ने भी नवाब की गद्दी से राज किया है। कुदसिया बेगम ऐसी ही एक नवाब हुई हैं। उनकी एक किताब है-हयाते कुदसी। इसमें जामा मस्जिद के निर्माण की जानकारी है। इसका निर्माण 1832 में शुरू हुआ और 1857 में पूरा हुआ था। यह किताब इस जगह पर मिले एक प्राचीन शिलालेख का ब्यौरा इन शब्दों में देती है-इस स्थान पर प्राप्त पुराने सभामंडल के एक शिलालेख पर लिखा था कि राजा उदयादित्य की पत्नी रानी श्यामली ने सभा मंडल नाम से पत्थर का एक विशाल मंदिर बनवाया था। सन् 1151 ईसवी में इसका निर्माण शुरू हुआ और 1184 में पूरा हुआ। राजा और रानी ने यहाँ 500 ब्राह्मणों को नियुक्त किया था, जो यहाँ पूजा के अलावा चार वेद, छह शास्त्र और 18 पुराणों के अलावा संस्कृत की अन्य शाखाओं की शिक्षा देते थे।

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फिर कैसे गायब हुआ भोपाल का नाम

संभवत: भोज के जीवन के अंतिम वर्षों में भोपाल में ये विशाल निर्माण कार्य हुए। इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है कि अपनी वैभवशाली धार नगरी से बाहर भोज इस पैमाने पर खुद को यहाँ क्यों केंद्रित कर रहे थे। क्या वे धार से राजधानी को बाहर स्थानांतरित करना चाहते थे? अगर हाँ तो इसका कारण क्या है? धार पर कौन से संकट आ गए थे? राजा भोज के बाद ढाई-तीन सौ सालों तक परमार राजाओं का सितारा बुलंद रहा। लेकिन पृथ्वीराज चौहान की पराजय के साथ ही दिल्ली पर गुलाम वंश के सुलतानों के काबिज होने के चालीस साल के भीतर पहली बार सन् 1235 में इल्तुतमिश ने इस इलाके पर भीषण हमला बोला था। पूरे भूभाग के सारे पुराने महल-मंदिर मिट्‌टी में मिला दिए गए थे। उज्जैन का प्रसिद्ध महाकाल मंदिर इसी धावे में ध्वस्त किया गया था। इस इलाके से हुई बेहिसाब लूट के विवरण तत्कालीन लेखकों ने लिख छोड़े हैं। परमार वंश के आखिरी राजा महलकदेव थे, जिनके बाद भोज की महान विरासत इतिहास के अंधेरे में खोने लगती है। भोपाल में उनके बाद क्या हुआ, इसके विवरण न के बराबर मिलते हैं। फिर 1720 के आसपास गोंड वंश की रानी कमलापति पटल पर आती हैं, जिनके समय दिल्ली से भागकर आए अफगान दोस्त मोहम्मद खान के किस्से इतिहास में जुड़ने लगते हैं।

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हेरिटेज सिटी का दावा

परमार राजाओं की मंदिर निर्माण शैली के विशेषज्ञ इतिहासकार डॉ. रहमान अली का कहना है कि परमार राजाओं ने भोपाल में शहर, बांध और मंदिर के हैरतअंगेज निर्माण कराए हैं। भोज की कल्पना के आधार पर भोपाल यह दावा कर सकता है कि यह भारत की एक ऐसी हेरिटेज सिटी है, जिसकी प्लानिंग दस्तावेज पर भी है और आप शहर को भी देख सकते हैं। पुरातत्वशास्त्री पूजा सक्सेना के अनुसार भोज के समय छोटा तालाब नहीं था। बड़े तालाब का पानी शहर के चारों तरफ खाई में होकर बहता था। यह नगर की सुरक्षा के लिए एक बाहरी इंतजाम था।


नोट : विजय मनोहर तिवारी भारत के कोने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएं करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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