lending rate /समझें MCLR की पूरी  A, B, C, D, इससे तय होती है आपके लोन की ब्याज दर

  • आरबीआई ने 1 अप्रैल, 2016 से लागू किया था एमसीएलआर 

Moneybhaskar.com

Jun 07,2019 02:41:44 PM IST

नई दिल्‍ली. हर बार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की बाई-मंथली मॉनिटरी की तारीख नजदीक आने के साथ ही बैंकों की ब्याज दरों में कमी को लेकर चर्चाएं होने लगती हैं। हालांकि बैंकों की लेंडिंग रेट तय करने के लिए एक अलग ही फॉर्मूला है, जो एमसीएलआर (MCLR) यानी मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड बेस्ड लेंडिंग रेट (Marginal Cost of Funds based Lending Rate) है। आरबीआई ने 1 अप्रैल, 2016 से एमसीएलआर (MCLR) को लागू किया था।

इसके तहत बैंकों को इंटरेस्‍ट रेट उसी समय से कम करना है, जिस वक्‍त आरबीआई (RBI) अपनी प्रमुख दरों में कटौती करता है। इससे पहले कई बैंक आरबीआई की ओर से की गई कटौती की तुलना में ब्‍याज दरों में कटौती में देरी करने के साथ ही अपने हिसाब से ब्याज दरों में कटौती करते थे। नए नियम के लागू हो जाने के बाद एसबीआई ने कस्‍टमर को इसका फायदा देना शुरू किया है। आइए जानते हैं क्‍या है एमसीएलआर फॉर्मूला...

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1. क्‍या है एमसीएलआर फॉर्मूला

बैंकों के लिए लेंडिंग इंटरेस्‍ट रेट तय करने के फॉर्मूले का नाम मार्जिनल कॉस्‍ट ऑफ फंड लेंडिंग रेट (एमसीएलआर) है। दरअसल आरबीआई के द्वारा बैंकों के लिए तय फॉर्मूला फंड की मार्जिनल कॉस्‍ट पर आधारित है। इस फॉर्मूले का उद्देश्य कस्‍टमर को कम इंटरेस्‍ट रेट का फायदा देना और बैकों के लिए इंटरेस्‍ट रेट तय करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना है। अप्रैल, 2016 से ही बैंक नए फॉर्मूले के तहत मार्जिनल कॉस्ट से लेंडिंग रेट तय कर रहे हैं। साथ ही बैंकों को हर महीने एमसीएलआर की जानकारी देनी होती है। आरबीआई द्वारा जारी इस नियम से बैंकों को ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिलने और इकोनॉमिक ग्रोथ में भी इसका लाभ मिलने की उम्मीद थी।

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2. एमसीएलआर फॉर्मूले का फायदा

इस फॉर्मूले से कस्‍टमर को सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि जैसे ही आरबीआई रेट में कटौती करता है, वैसे ही बैंकों को अपनी ब्याज दर कम करनी होती है। जबकि पहले के लेंडिंग रेट फॉर्मूले में बैंकों के ऊपर यह बाध्यता नहीं थी। इस वजह से लोन लेने वाले कस्टमर को सस्‍ते कर्ज के लिए काफी इंतजार करना पड़ता था। लेकिन अब यदि कोई कस्मटर अपने लोन को इस फॉर्मूले (MCLR) के आधार पर शिफ्ट कराता है तो उसे सस्ते कर्ज का लाभ जल्‍द से जल्‍द मिल जाएगा।

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3. पुराने कस्‍टमर को भी होगा लाभ

एमसीएलआर फॉर्मूले का फायदा नए कस्टमर के साथ ही पुराने कस्‍टमर को भी मिलता है। जिस कस्‍टमर ने एमसीएलआर बदलने से पहले लोन लिया है और उसका लोन लेंडिंग रेट फॉर्मूले से जुड़ा हुआ है, तो एमसीएलआर घटने के साथ ही उसकी ईएमआई कम हो जाती है।

4. कैसे तय होता है MCLR

मार्जिनल का मतलब होता है- अलग से या अतिरिक्त। जब भी बैंक लेंडिंग रेट तय करते हैं, तो वे बदली हुई स्थ‍ितियों में खर्च और मार्जिनल कॉस्ट को भी कैलकुलेट करते हैं। बैंकों के स्तर पर ग्राहकों को डिपॉजिट पर दिए जाने वाली ब्याज दर शामिल होती है। MCLR को तय करने के लिए 4 फैक्टर को ध्यान में रखा जाता है. इसमें

-फंड का अतिरिक्त चार्ज
- निगेटिव कैरी ऑन CRR
-ऑपरेशन कॉस्ट
-टेन्योर प्रीमियम

 

 

5. क्या है कैश रिजर्व रेश्यो (CRR)

कैश रिजर्व रेश्यो वह रेश्यो होता है, जिसके आधार पर बैंकों को कुछ पैसे आरबीआई के पास जमा रखने पड़ते हैं।

6. आप पर ऐसे पड़ता है असर

जब भी कैश रिजर्व  रेश्यो बढ़ता है, तो बैंक कम लोन देते हैं। दरअसल सीआरआर बढ़ने से उन्हें आरबीआई के पास ज्यादा पैसे रिजर्व में रखने पड़ते हैं। इससे बैंक कम कर्ज देते हैं और वह लेंडिंग रेट्स बढ़ा देते हैं। वहीं, जब  भी  सीआरआर में कटौती की जाती है, तो बैंकों पर ज्यादा कर्ज देने का दबाव बनता है।
 

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