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शेयर बॉयबैक-डिफॉल्टर कंपनियों पर बड़ा फैसला संभव, मार्केट रिफॉर्म पर सेबी की आज बैठक

नई दिल्ली। शेयर बॉयबैक के नियमों में मार्केट रेग्युलेटर सेबी बड़ा बदलाव कर सकती है। इसके तहत बॉयबैक शेयरों की अधिकतम सीमा तय की जा सकती है। वहीं, यह भी तय किया जा सकता है कि कोई भी कंपनी पिछले बॉयबैक के खत्म होने के एक साल के अंदर बॉयबैक प्रस्ताव नहीं ला सकेगी। इसके अलावा इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया से गुजर रही लिस्टेड कंपनियों को सेबी से कुछ राहत मिल सकती है। ऑडिटर्स की भूमिका, डिफॉल्टर कंपनियों, एंजेल फंड और म्युचुअल फंड को लेकर भी सेबी आज  स्टॉक मार्केट के रिफॉर्म पर हो रही अहम बैठक में बड़े फैसले ले सकती है। ये फैसले ऐसे समय लिए जा सकते हैं, जब फ्रॉड के मामले बढ़े हैं। 

 

 

बॉयबैक पर आ सकता है नया नियम
सेबी शेयरों के बॉयबैक पर भी नया नियम ला सकती है। इसके तहत वापस खरीदे जाने वाले शेयरों की अधिकतम सीमा कंपनी के पेड अप कैपिटल और अन्य रिजर्व्स का 25 फीसदी होगी। कंपनी मौजूदा सिक्युरिटी होल्डर्स से टेंडर ऑफर के जरिए समानुपातिक आधार पर या बुक बिल्डिंग प्रॉसेस और स्टॉक एक्सचेंज के जरिए खुली पेशकश से या ऑड लॉट होल्डर्स से स्टॉक बॉयबैक कर सकती है। हालांकि यह तभी लागू होगा जब  इसके तहत ओपेन मार्केट के विकल्प के जरिए पेडअप कैपिटल और कंपनी के फ्री रिजर्व के 15 फीसदी के बराबर स्टॉक के बॉयबैक के लिए कोई पेशकश नहीं की गई हो। 

 

क्या है बॉयबैक पर अन्य प्रस्ताव 
प्रस्ताव के अनुसार कोई भी कंपनी पिछले बॉयबैक के खत्म होने के एक साल के अंदर बॉयबैक प्रस्ताव नहीं ला सकेगी। कोई भी कंपनी मार्केट से स्क्रिप डीलिस्ट करने के लिए अपने स्टॉक बॉयबैक नहीं कर सकेगी। कोई कंपनी अपने स्टॉक  को किसी सब्सिडरी या इन्वेस्टमेंट कंपनी के जरिए नहीं खरीद सकेगी। अगर कंपनी ने कभी डिफॉल्ट किया है तब भी वह डायरेक्ट या इनडायरेक्ट अपने स्टॉक नहीं खरीद सकेगी। हालांकि डिफॉल्ट का मामला सुलझने के बाद ऐसा हो सकेगा। 

 

ऑडिटर्स पर लगेगा अंकुश 
सेबी ऑडिटर्स के लिए नए प्रावधान लागू कर सकती है। नए नॉर्म्स के तहत अगर कोई भी ऑडिटर किसी कंपनी की गलत फाइनेंशियल स्टेटस की जानकारी देने में दोषी पाया गया तो आगे से ऑडिट या वैल्युएशन रिपोर्ट जारी करने पर रोक लगेगी। वहीं पेनल्टी भी लगाई जाएगी। 
सेबी का यह प्रस्ताव अहम माना जा रहा है। क्योंकि गलत ऑडिट रिपोर्ट के जरिए मार्केट में फ्रॉड के मामले आ रहे हैं। इससे न केवल निवेशकों का हित प्रभावित होता है, बल्कि मार्केट की साख भी खराब होती है। माना जा रहा है कि कुछ कंपनियां गलत ऑडिट रिपोर्ट के जरिए अपने फाइनेंशियल स्थिति की बढ़ा-चढ़ाकर जानकारी देती हैं। इससे वे गलत तरह से मार्केट से फायदा लेने में कामयाब हो जाती हैं। 

 

निवेशकों के हित के लिए फैसला जरूरी 
इस मसले पर शेयर बाजार के एक एक्‍सपर्ट का कहना है कि ऑडिटर्स की वैल्युएशन रिपोर्ट अहम होती है। इसका उद्देश्‍य है कि  किसी कंपनी की सही वित्तीय स्थिति के बारे में मार्केट और निवेशकों को पता चले। बहुत तक वैल्युएशन रिपोर्ट ही निवेशकों के फैसले का आधार बनती हे। लेकिन अगर कोई जानकर गलत रिपोर्ट देता है तो इससे निवेशकों का हित प्रभावित होता है। ऐसे में सेबी के लिए यह तय करना जरूरी है कि किसी कंपनी की सही फाइनेंशियल स्थिति व अन्य जानकारियां सामने आएं। 

 

इनसॉल्वेंसी नॉर्म्स में मिल सकती है राहत 
इनसॉल्वेंसी की प्रक्रिया से गुजर रही लिस्टेड कंपनियों को मार्केट रेग्युलेटर सेबी से कुछ राहत मिल सकती है। सेबी इन कंपनियों को डिस्कलोजर्स नियमों में कुछ नरमी दे सकती है। इन कंपनियों की एसेट्स को खरीदने वाली कंपनियों के लिए 25 फीसदी हिस्सेदारी शेयर बाजार के जरिए बेचने संबंधी नियमों में भी कुछ रियायत दी जा सकती है। अगर आईबीसी के तहत ली गई कंपनी लिस्टेड है तो उसे मार्केट से अलग करने की प्रक्रिया को भी आसान बनाने पर फैसला हो सकता है। 

 

आगे पढ़ें, डिफॉल्टर्स कंपनियों पर क्या हो सकता है फैसला.....

 

 

 

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