31 मार्च को आपके शेयर हो सकते हैं बेकार, अगर नहीं किया है यह काम

SEBI extended date for conversion of physical shares into demat: भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (SEBI) एक और मौका लेकर आया है। सेबी ने फिजिकल फार्म में पड़े शेयरों को डीमैट करवाने की अंतिम तिथि पांच दिसंबर 2018 को बढ़ाकर 31 मार्च 2019 कर दिया है।

Money Bhaskar

Mar 08,2019 03:26:00 PM IST

नई दिल्ली। इस समय देश में बड़ी संख्या में शेयर फिजिकल फार्म में पड़े हैं अर्थात जो अभी डीमैट फॉर्म में नहीं है और लाखों निवेशकों के बीच में बंटे हैं। इनमें से ज्यादातर को इस बात की जानकारी ही नहीं है। ऐसे लोगों के लिए भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (SEBI) एक और मौका लेकर आया है। सेबी ने फिजिकल फार्म में पड़े शेयरों को डीमैट करवाने की अंतिम तिथि पांच दिसंबर 2018 को बढ़ाकर 31 मार्च 2019 कर दिया है।

लाखों निवेशकों को होगा फायदा
चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) मनीष कुमार गुप्ता के अनुसार, देश में इस समय करीब 5.30 लाख करोड़ रुपए के शेयर फिजिकल फॉर्म में पड़े हैं। इनमें बड़ी संख्या में कई परिवारों के लीगैसी शेयर हैं, जिन्हें सर्टिफिकेट्स पूर्वजों से मिले थे। इनमें से कुछ के नाम और पते बदल गए हैं तो कुछ एनआईआई बन गए हैं। अब सेबी के नए ऑर्डर के मुताबिक सभी लिस्टेड कंपनियों की शेयर सिक्योरिटीज का ट्रांसफर एक्सचेंजों या क्रेता-विक्रेता के बीच ऑफ मार्केट ट्रांजैक्शंसन के जरिए फिजिकल फॉर्मैट में 31 मार्च 2019 के बाद नहीं हो पाएगा जो की नई बढ़ाई गई डेट है । 31 मार्च 2019 के बाद सभी पेपर शेयर जाम हो जाएंगे अर्थात उनका बेचना संभव नहीं होगा।

क्या होते हैं फिजिकल-डीमैट शेयर
मनीष कुमार गुप्ता के अनुसार, शेयर का मतलब, किसी कंपनी की पूंजी को छोटे-छोटे बराबर हिस्से में बांटने पर जो पूंजी का सबसे छोटा हिस्सा आता है, उस हिस्से को शेयर (SHARE) कहते हैं। उदाहरण के लिए जैसे एक कंपनी की कुल पूंजी 1 करोड़ है, और कंपनी अपनी 1 करोड़ की पूंजी को, 1 लाख अलग-अलग, बराबर मूल्य के हिस्से में बांट देती है। अब बांटा गया हर एक हिस्सा कंपनी की पूंजी का एक सबसे छोटा भाग है जिसकी कीमत अब 100 रुपए है। पूंजी के इसी छोटे भाग को ही शेयर कहा जाता है। कंपनी की पूंजी का एक भाग यानी जब भी आप शेयर खरीदते हैं और पैसे चुकाते हैं तो आप शेयर खरीद कर उस कंपनी को खरीदे गए शेयर के मूल्य के बराबर पूंजी दे रहे हैं और जैसे बिजनेस में पूंजी लगाने वाला बिजनेस का मालिक होता है, अर्थात वह प्रोप्राइटर और पार्टनर होता है। ठीक इसी तरह आपके पास किसी कंपनी के जितने शेयर होते हैं, आप उन शेयर्स की कीमत के बराबर उस कंपनी में मालिक बन जाते हैं।

फिजिकल शेयर रखने की परेशानियां और डीमैट द्वारा समाधान
कुछ साल पहले तक इंडिया में स्टॉक ब्रोकिंग का मामला फैमिली बिजनेस जैसा होता था। हिसाब-किताब में होशियार और हाई एटीट्यूड वाले लोग ट्रेडिंग किया करते थे। शेयर सर्टिफिकेट्स के बंडल स्टॉक एक्सचेंज ले जाना पड़ता है। वहां बैठकर लिस्ट वेरिफाई करने के बाद सेटलमेंट के लिए फिजिकल शेयर सर्टिफिकेट देना होता था और ट्रेडिंग में बड़ा रिस्क होता था। कुछ लोगों के सौदे बैड डिलीवरी हो जाते थे। मतलब दाम चुकाकर स्टॉक एक्सचेंज से खरीदे गए शेयरों की डिलीवरी सेटलमेंट समय पर नहीं हो पाती थी। कुछ बेईमान ऑपरेटर पैसे तो पूरे लेते थे लेकिन फर्जी या फटे शेयर सर्टिफिकेट थमा देते थे या भाव उलटा पुलटा कर देते थे। तब फर्जीवाड़े या जोड़ तोड़ की बहुत सी घटनाएं होती थीं। खासतौर पर ऐसा तब होता था जब आईपीओ आता था। इनवेस्टर्स शेयर के लिए पेमेंट करते थे और उन्हें अलॉटमेंट भी हो जाता था। लेकिन उन्हें भेजे गए शेयर सर्टिफिकेट को शातिरों का गिरोह बीच में ही गायब कर उन्हें बाजार में बेच देता था। खरीदार जब शेयरों को अपने नाम ट्रांसफर करने के लिए भेजता था, तब पता चलता कि उस पर किए गए दस्तखत जाली हैं और सेलर फ्रॉड था। इस बीच ओरिजनल बायर अलॉटमेंट वाले शेयर नहीं मिलने की शिकायत दर्ज करा देता था। स्टॉक एक्सचेंज पर रिस्की और बैड डिलीवरी, जालसाजों के शेयर सर्टिफिकेट में फर्जीवाड़े की समस्या दूर करने के लिए कानून में यह व्यवस्था की गई कि डिपॉजिटरी बन जाने पर वे इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में होंगे। कानून में शेयरों को फिजिकल फॉर्म में रखने की मनाही नहीं थी। जो निवेशक सर्टिफिकेट चाहते थे, उन्हें शेयरों को इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म से फिजिकल फॉर्म में कनवर्ट कराना होता था। लेकिन फिजिकल शेयरों को उन स्टॉक एक्सचेंजों के जरिए ट्रांसफर या सेल नहीं किया जा सकता था, जहां सेटलमेंट इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में होता था ।

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