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जिसे खरीदने में तीन बार नाकाम हुए अंबानी, आज नौकरी के मामले में दुनिया की उम्दा कंपनियों में शुमार

दुनिया के बेस्ट एम्प्लॉयर्स की फोर्ब्स लिस्ट में L&T 22वें स्थान पर

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नई दिल्ली। कंस्ट्रक्शन एंड इंजीनियरिंग सेक्टर की प्रमुख कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को दुनिया के बेस्ट एम्प्लॉयर की लिस्ट में 22वां स्थान मिला है। फोर्ब्स (Forbers) पत्रिका की शीर्ष 2000 एम्प्लॉयर कंपनियों की लिस्ट में टॉप 25 एम्प्लॉयर्स में शामिल होने वाली L&T एकमात्र भारतीय कंपनी है। 1990 के दशक में तीन बार रिलायंस इंडस्‍ट्रीज और एक बार कुमारमंगलम बिड़ला ने L&T के होस्‍टाइल टेकओवर की ऐसी कोशिश की थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सके।

 

गूगल की पैरेंट कंपनी लिस्ट में टॉप पर

फोर्ब्स पत्रिका की शीर्ष 2000 एम्प्लॉयर्स कंपनियों की लिस्ट में गूगल की पैरेंट कंपनी अल्फाबेट टॉप पर है। अल्फाबेट इस लिस्ट में लगातार दूसरे साल टॉप पर रही है। दूसरे स्थान पर माइक्रोसॉफ्ट का नाम है। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 10 एम्पलॉयर्स में से छह अमेरिका से हैं। इनमें अमेरिका की एप्पल इंक तीसरे, वॉल्ट डिज्नी कंपनी चौथे, अमेजन पांचवें और सेलजेन कॉरपोरेशन नौवें स्थान पर है।

 

लिस्ट में 24 भारतीय कंपनियां

इन 2000 कंपनियों में केवल 24 कंपनियां ही शामिल हैं। टॉप 100 में महिंद्रा एंड महिंद्रा (M&M) 55वें, ग्रासिम इंडस्ट्रीज 59वें और HDFC 91वें स्थान पर रही हैं। लिस्ट में शामिल 24 भारतीय कंपनियों में जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ( GIC) 106वें, आईटीसी 108वें, सेल 139वें, सन फार्मा 172वें, एशियन पेंट्स 179वें, एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) 183वें, अडाणी पोर्ट्स सेज 201वें, जेएसडब्ल्यू स्टील (JSW Steel) 207वें, कोटक महिंद्रा 253वें, हीरो मोटोकॉर्प 295वें, टेक महिंद्रा 351वें और ICICI बैंक 359वें पर हैं। इसके अलावा विप्रो 362वें, हिंडाल्को 378वें, SBI 381वें, बजाज ऑटो 417वें, टाटा मोटर्स 437वें, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन 479वें, एक्सिस बैंक 481वें और इंडियन ओवरसीज बैंक 489वें स्थान पर हैं। 

 

आगे पढ़ें, कैसे चला पूरा खेल

L&T की ग्रोथ के सभी थे कायल 

 

कंपनी की ग्रोथ देखकर धीरूभाई अंबानी का भी इस पर दिल आ गया था और उन्होंने इसके अधिग्रहण के लिए तीन बार कोशिशें कीं। धीरूभाई के लिए L&T इसलिए भी अहम थी, क्योंकि कंपनी आरआईएल के पेट्रोकेमिकल्स कॉम्पलेक्स का निर्माण भी कर रही थी। धीरूभाई की L&T के पास मौजूद भारी नकदी में भी दिलचस्पी थी।

 

मुकेश और अनिल भी आए कंपनी के बोर्ड में   

 

धीरूभाई एलएंडटी के अधिग्रहण की दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने अपने दोनों बेटों (मुकेश और अनिल) को भी बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में जगह दिला दी।

बोर्ड ने भांप लिए उनके इरादे 

L&T बोर्ड इस बात को भांप रहा था कि अंबानी कंपनी पर पूरा होल्ड चाहते हैं। उस समय एलएंडटी में धीरूभाई की स्थिति इतनी मजबूत हो गई थी कि उन्होंने कंस्ट्रक्शन कंपनी के नाम पर बाजार से करोड़ों रुपए भी उठा लिए थे।

 

एलआईसी ने दिया L&T का साथ

 

तब तक कंपनी में अंबानी की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 19 फीसदी तक हो चुकी थी, लेकिन 1989 में राजनीतिक परिदृश्य इस तरह बदला कि धीरूभाई के हाथ से यह मौका भी निकल गया। इस बार एलआईसी (उस वक्त की सबसे बड़ी शेयरहोल्डर) आगे आई और उसकी पहल पर अंबानी को L&T से बाहर जाना पड़ा।

 

जाते-जाते बिड़ला को बेच गए इक्विटी

 

धीरूभाई को आखिरकार जाना पड़ा, लेकिन जाते-जाते वह अपनी हिस्सेदारी एक अन्य दिग्गज कारोबारी कुमार मंगलम बिड़ला को बेच गए। यह इसलिए भी अहम था, क्योंकि बिड़ला की कंपनी उस वक्त एलएंडटी की सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी कंपनियों में से एक थी। उस वक्त बिड़ला भी एलएंडटी में दिलचस्पी ले रहे थे। बिड़ला के लिए एलएंडटी बाजार का ऐसा ‘नगीना’ थी, जिसके अधिग्रहण पर उनका बाजार पर काफी हद तक एकाधिकार हो जाता। लेकिन बिड़ला का ख्वाब भी एक ऐसे शख्स ने तोड़ा, जिसे उन्होंने खुद एलएंडटी का सीईओ और एमडी बनवाया था।

 

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नाइक ने किया आह्वान, कर्मचारी खुद बनें मालिक

 

 

बिड़ला ने 2010 के दशक की शुरुआत में खुद ही नाइक को कंपनी का सीईओ और एमडी नियुक्त किया था। संभवतः वह नाइक को पहचान नहीं सके और यही बात उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। नाइक ने बिड़ला की कंपनी में एंट्री रोकने और कंपनी में कॉरपोरेट कल्चर बरकरार रखने की पूरी कोशिश की। इसके लिए नाइक ने अपने कर्मचारियों को भी समझाया कि यदि हम सब इसके मालिक रहेंगे तो कोई भी बाहर का व्यक्ति दोबारा कंपनी को खरीदने की कोशिश नहीं करेगा।

 

बाद में महीनों तक चली चर्चा के बाद L&T के कर्मचारियों के ट्रस्ट ने बिड़ला की पूरी हिस्सेदारी खरीद ली और बिड़ला को बाहर का रास्ता दिखाया। फिर नाइक की अगुआई में L&T के लिए नए युग का आगाज हुआ।

 

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