Home » Market » Stocksरेलवे से कमाई का मौका - Chance of earning from railways

अब गाय का गोबर खरीदेगी रेलवे, सफाई के लिए बनाया यह प्लान

भारतीय रेलवे के साथ जुड़कर कमाई के ढेरों मौके हैं।

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नई दिल्‍ली. भारतीय रेलवे के साथ जुड़कर कमाई के ढेरों मौके होते हैं। लेकिन पर्यावरण की प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते इस बार बिल्‍कुल नए तरह का मौका सामने आया है। रेलवे को ऐसे सामान की जरूरत जिसे आमतौर पर लोग बेकार का समझते हैं। रेलवे को करीब ऐसे 42 करोड़ रुपए के सामान की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि इस आपूर्ति के बाद मौके खत्‍म हो जाएंगे, बल्कि यह मौका हर साल मिलता रहेगा।

 
 

बायोट्वालेट के लिए रेलवे को चाहिए कुछ खास

भारतीय रेलवे अपने इस्‍तेमाल होने वाले सवारी गाड़ी के डिब्‍बों में बायोट्वायलेट लगा रही है। अभी तक रेलवे अपने 44.8 फीसदी डिब्‍बों में इसे लगा चुकी है, और उसका लक्ष्‍य 2018 में सभी डिब्‍बों में बायोट्वालेट लगाना है। इन ट्वालेट में कुछ खास कीड़े इस्‍तेमाल किए जाते हैं, जिनको देश में बेकार समझी जाने वाली चीज से बनाया जाता है। रेवले इसका इस्‍तेमाल लगातार बढ़ाता जा रहा है।
 
 

गाय का गोबर सबसे बेहतर

प्रत्‍येक बायोट्वालेट में 60 लीटर गाय के गोबर से बनाए गए रसायन की जरूरत होती है। इस बात की जानकारी हाल ही में सीएजी की रिपोर्ट में सामने आई है। सीएजी ने यह रिपोर्ट संसद में पेश की है। रेलवे को इतने रसायन की जरूरत रोज अपने प्रत्‍येक बायोट्वालेट के लिए पड़ती है।
 
 

2018 में रेलवे खर्च कर सकता है 42 करोड़ रुपए

रेलवे गाय का गोबर खरीदने पर 2018 के दौरान 42 करोड़ रुपए खर्च कर सकता है। इस गोबर से रिचार्ज बना कर बायोट्वालेट में डाल कर पर्यावरण की सुरक्षा की जा सकती है।
 
 

कैसे आया 42 करोड़ रुपए का आंकड़ा

सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार रेलवे ने वर्ष 2016 की मई में 3600 लीटर गाय का गोबर 68400 रुपए में खरीदा था। इस रेट के हिसाब से रेलवे को अपने 97,761 बायोट्वालेट के लिए करीब 2.34 करोड़ लीटर गोबर की जरूरत होगी। अगर इस बात को आसानीसे समझना हो तो करीब 3350 ट्रक गोबर की जरूरत रेलवे को 2018 में होगी। इसकी कीमत मई 2016 में हुई खरीद के हिसाब से करीब 42 करोड़ रुपए की होती है।
 
आगे पढ़ें : बायोट्वालेट कैसे काम करता है
 
 

 

क्‍या होता है बायोट्वालेट

यह एक तरह से छोटा सीवेज ट्रीटमेंट प्‍लांट होता है। इसमें बेक्‍टीरिया पानी और मीथेन में बदल देते हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान नहीं होता है। इसके अलावा स्‍टेशन और रेल की पटरियों पर गंदगी भी नहीं रहती है। इस बेक्‍टीरिया की खोज एक डिफेंस वैज्ञानिक ने 2005 में अंटार्टिका में की थी। इसके 10 साल बाद उसे इसका पेटेंट भी मिल गया था। बाद में 2007 में रेलवे के रिसर्च विंग डीआरडीओ ने इसका देसी संस्‍करण तैयार किया, जिसका अभी रेलवे में इस्‍तेमाल हो रहा है।
 
 

नागपुर में है एक फैक्‍ट्री

अभी रेवले के पास इस बेक्‍ट्रीरिया को तैयार करने की एक फैक्‍ट्री नागपुर में है। इसकी क्षमता 30 हजार लीटर बेक्‍टीरिया हर माह तैयार करने की है। हालांकि रेलवे ने 2011 में तय किया था कि वह ऐसी फैक्‍ट्री कपूरथला और पेराम्‍बुर में स्‍थातिप करेगा, लेकिन अभी तक कोई काम आगे नहीं बढ़ा है।
 
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