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97% घटकर 28 करोड़ रु रह गया IndiGo का प्रॉफिट, महंगे फ्यूल से लगा झटका

IndiGo का परिचालन करने वाली कंपनी इंटरग्लोब एविएशन को महंगे फ्यूल की वजह से तगड़ा झटका लगा है।

IndiGo Q1 net plummets 97% on forex loss, high fuel prices

 

मुंबई. देश की सबसे बड़ी एयरलाइन IndiGo का परिचालन करने वाली कंपनी इंटरग्लोब एविएशन को महंगे फ्यूल की वजह से जून, 2018 में समाप्त तिमाही के दौरान तगड़ा झटका लगा है। सोमवार को जारी तिमाही नतीजों के मुताबिक कंपनी का प्रॉफिट 96.6 फीसदी घटकर 27.8 करोड़ रुपए रह गया। खराब नतीजों की मुख्य वजह अप्रैल-जून, 2018 तिमाही के दौरान फॉरेन एक्सचेंज का निगेटिव असर, फ्यूल की ऊंची कीमतें, लोअर यील्ड्स और ऊंची मेंटेनेंस कॉस्ट रही है।

 

 

ऑपरेशनल सेल्स रही 651 करोड़ रु

कंपनी द्वारा जारी बयान के मुताबिक बीते साल समान तिमाही के दौरान गुड़गांव की बजट कैरियर ने 811.10 करोड़ रुपए का प्रॉफिट दर्ज किया था। हालांकि चालू वित्त वर्ष 2018-19 की पहली तिमाही के दौरान उसकी ऑपरेशन से सेल्स 13.2 फीसदी बढ़कर 651.20 करोड़ रुपए हो गई, जबकि जून, 2017 में समाप्त क्वार्टर के दौरान यह आंकड़ा 575.29 करोड़ रुपए रहा था।

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पैसेंजर टिकट रेवेन्यू रहा 576.94 करोड़ रु

जून, 2018 में समाप्त तिमाही के दौरान कंपनी का पैसेंजर टिकट रेवेन्यू 13.6 फीसदी बढ़कर 576.94 करोड़ रुपए और एंसिलरी रेवेन्यू 16 फीसदी बढ़कर 68.27 करोड़ रुपए हो गया। इंडिगो के को-फाउंडर और एंटरिम चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर राहुल भाटिया ने नतीजों के बाद एक एनालिस्ट कॉल के दौरान कहा, ‘तिमाही के दौरान कंपनी के प्रॉफिट में कमी की मुख्य वजह फ्यूल की कीमतों में बढ़ोत्तरी, यील्ड्स पर लगातार जारी प्रेशर और मेंटेनेंस कॉस्ट में बढ़ोत्तरी रही।’

 

 

40 फीसदी बढ़ा कुल खर्च

हालांकि जून क्वार्टर के दौरान कंपनी का कुल व्यय सालाना आधार पर 40.5 फीसदी बढ़कर 678.70 करोड़ रुपए, जबकि फ्यूल कॉस्ट 54.5 फीसदी बढ़कर 271.56 करोड़ रुपए हो गई।

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इसके अलावा एवरेज टिकट प्राइस पर यील्ड्स 5.4 फीसदी घटकर 3.62 रुपए प्रति किलोमीटर रह गई, जबकि बीते साल समान अवधि के दौरान यह आंकड़ा 3.82 रुपए प्रति किलोमीटर रही थी।

 

 

न्यूनतम हैं किरायेः भाटिया

भाटिया ने कहा, ‘रेवेन्यू के लिहाज से मौजूदा परिदृश्य मुख्य रूप से 0-15 दिनों की बुकिंग विंडो में कमजोर बना हुआ है। बीते साल की समान तिमाही की तुलना में किराए न्यूनतम बने रहे। इनपुट कॉस्ट में बढ़ोत्तरी को देखते हुए हमें नहीं लगता कि ऐसे किराये टिकाऊ हैं।’

लोड फैक्टर 1.3 फीसदी बढ़कर 89.3 फीसदी के स्तर पर पहुंच गया, जबकि बीते साल समान अवधि के दौरान यह 88 फीसदी के आसपास था।

उन्होंने कहा, ‘स्पष्ट तौर पर इंडस्ट्री का लोड फैक्टर 80-90 फीसदी की हाई रेंज में है। ऐसे हालात में भी किरायों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।’

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