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कॉरपोरेट दिग्गजों को नहीं रास आया टेलिकॉम, दिवालिया होने के कगार पर पहुंचे अंबानी से लेकर धूत

टेलिकॉम सेक्टर के बदलते गणित ने देश के कई दिग्गज कॉरपोरेट्स को जमीन पर ला दिया है।

Entry in telecom sector socks big corporates like Dhoot and Ambani

 

नई दिल्ली. टेलिकॉम सेक्टर के बदलते गणित ने देश के कई दिग्गज कॉरपोरेट्स को जमीन पर ला दिया है। इस लिस्ट में ऐसे नाम शामिल हैं, जिनके बिजनेस में फेल होने के बारे में कभी सोचा भी नहीं जा सकता था। खास तौर से जब नाम के आगे अंबानी और धूत जुड़ा हो। पिछले 20 साल में 2जी स्कैम और बढ़ते कॉम्पिटिशन ने भारत के दिग्गजों के साथ-साथ विदेशी टायकून को भी कारोबार समेटने को मजबूर कर दिया है। आइए जानते हैं कि टेलिकॉम सेक्टर में ऐसा क्या हुआ जिससे अनिल अंबानी, वेणुगोपाल धूत जैसे भारतीय दिग्गजों की कंपनी दिवालिया होने के कगार पहुंच गई है।


 

 

एक्सपेंशन स्ट्रैटजी हुई फेल

एक्सपर्ट्स का कहना है कि एक समय अनिल अंबानी ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी रही ऑर-कॉम गलत एक्सपेंशन प्लान की वजह से परेशानी में पड़ गई। कंपनी पर कर्ज बढ़ता गया, जो वह चुका नहीं पाई।

फॉर्च्‍युन फिस्‍कल के डायरेक्टर जगदीश ठक्कर का कहना है कि मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी में जब बिजनेस को लेकर बंटवारा हुआ था तो अनिल अंबानी के हिस्से में टेलिकॉम कंपनी आई थी। 2010 तक आर-कॉम का मार्केट शेयर टेलिकॉम इंडस्ट्री में 17 फीसदी था और वह दूसरी बड़ी कंपनी थी। उस दौरान कंपनी के विस्तार को लेकर कर्ज बढ़ना शुरू हुआ और उसका सही मैनेजमेंट नहीं हो पाया। आज कंपनी दिवालिया होने के कगार पर है।

 

बढ़ते कॉम्पिटिशन से घट गया मार्जिन

टेलिकॉम कंपनियों की सबसे ज्यादा समस्या तब बढ़ी, जब मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस जियो का आगाज हुआ। इसके साथ ही फ्रीबीज (मुफ्त ऑफर) की होड़ शुरू हो गई और डाटा वार का आगाज हो गया। डाटा की कीमत कई गुना कम हो गई। कॉम्पिटीशन बढ़ने के साथ टेलिकॉम कंपनियों के मार्जिन घटते गए, जिसका बिजनेस पर खासा निगेटिव असर पड़ा।

टेलिकॉम इंडस्ट्री से जुड़े एक एक्सपर्ट ने बताया कि रिलायंस जियो के आने के बाद से टेलिकॉम इंडस्ट्री में जो डाटा वार चला, उसमें आर-कॉम का टिकना मुश्किल होता गया। जियो, एयरटेल और आइडिया व वोडाफोन जैसी कंपनियां ने अपना कस्टमर बेस बनाए रखने के लिए खर्च बढ़ा दिया। जिससे उनका कस्टमर बेस अभी भी बचा हुआ है। वहीं आर-कॉम इस खेल में पीछे हो गई। उसके प्राइम और एवरेज कस्टमर सभी उससे दूर होते गए।

 

 

बढ़ता गया कर्ज

कॉम्पिटीशन बढ़ने और मार्जिन घटने से कंपनियों ने ज्यादा कर्ज लेना शुरू कर दिया। इसके साथ ही कर्ज लौटाना भी उनके वश की बात नहीं रही। फाइनेंशियल ईयर 2010 में आरकॉम पर 25 हजार करोड़ कर्ज था, अब बढ़कर 45 हजार करोड़ हो चुका है। वहीं वीडियोकॉन ग्रुप पर कर्ज बढ़कर 40 हजार करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है। इसके अलावा एयरसेल पर फिलहाल 19 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है।

 

कंपनी             कर्ज

आरकॉम         45 हजार करोड़

वीडियोकॉन ग्रुप  40 हजार करोड़

एयरसेल         19 हजार करोड़

 

कंपनियों ने कोर बिजनेस से हटाया फोकस

वीडियोकॉन जैसी कंपनियों के लिए कोर बिजनेस से फोकस हटाना खासा भारी पड़ा। कंपनी एक समय टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन और एसी जैसे प्रोडक्‍ट्स के लिए जानी जाती थी। उस दौर में यह मुनाफे वाली कंपनी हुआ करती थी, लेकिन तेजी से बढ़ने की कोशिश में जिस तरह से कंपनी ने कोर बिजनेस के अलावा टेलिकॉम, एनर्जी जैसे दूसरे क्षेत्र में कारोबारी विस्‍तार का रास्‍ता अपनाया, वह उसे रास नहीं आया।

जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज के रिसर्च हेड गौरांग शाह का कहना है कि वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज ने अपने मुख्य बिजनेस को छोड़ दूसरे बिजनेस में हाथ आजमाया। कंपनी ने 2008 के बाद से टेलिकॉम, डायरेक्ट टू होम, ऑयल एंड गैस जैसे सेक्टर में भारी निवेश किया था। लेकिन कंपनी को इन बिजनेस से मुनाफा नहीं आया। कंपनी पर कर्ज बढ़ता गया, जिसे चुकाना मुश्किल हो गया। दूसरी ओर इसी कर्ज के चलते कंपनी का अपने कोर बिजनेस से भी फोकस हटता गया।

 

विवादों से भी रहा नाता

टेलिकॉम सेक्टर के लिए 2जी स्कैम सब ज्यादा घातक रहा। इसके चलते कई कंपनियों के स्पेक्ट्रम लाइसेंस कैंसिल हो गए। इसके चलते कंपनियों के लिए ऑपरेशन कॉस्ट भी खासी बढ़ गई।

वहीं एयरसेल के मामले में तो अभी तक सीबीआई की जांच चल रही है। सीबीआई मैक्सिस के हाथों टेकओवर में हुई अनियमितताओं के आरोपों की जांच कर रही है। सीबीआई के मुताबिक, 2005 में तत्कालीन टेलिकॉम मिनिस्टर दयानिधि मारन ने एयरसेल के पुराने ओनर सी शिवशंकरन को अपनी हिस्सेदारी मैक्सिस को बेचने के लिए मजबूर कर दिया। तमाम विवादों के बीच उसके कई कस्टमर दूसरी कंपनियों में पोर्ट करने में नाकाम रहे।

 
 

 

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