Home » Market » ForexRupee fall likely to be big worry for modi govt before 2019 general election

खास खबर: 4 साल बाद फिर लौटा रुपए का भूत, क्या मनमोहन के बाद अब मोदी की बारी

रुपए का लगातार कमजोर होना अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है।

1 of

नई दिल्ली। 2014 में आम चुनावों के पहले मौजूदा पीएम नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह पर रुपए में गिरावट को लेकर बड़ा तंज कसा था। रुपए में लगातार गिरावट बढ़ने पर मोदी ने कहा था कि रुपया मनमोहन सिंह की उम्र के बराबर हो गया है। फिलहाल 4 साल बाद देश में रुपए का यह भूत फिर लौट आया है। रुपए में जिस कमजोरी को तब मुद्दा बनाया गया था, आज हालात उसी तरह से होते जा रहे हैं। रुपया पिछले 16 माह में सबसे कमजोर होकर बुधवार को 68 प्रति डॉलर का स्तर पार कर गया। जानकार इसके 72 प्रति डॉलर के स्तर तक जाने की बात कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जो रुपया यूपीए गवर्नमेंट में पीएम मनमोहन सिंह के लिए मुसीबत बना था, अब मोदी के लिए

चुनावों में मुसीबत बन जाएगा। 

 

 

इकोनॉमी के लिए बन सकता है खतरा 
पिछले साल नोटबंदी, जीएसटी और बैंकिंग सेक्टर में बढ़ते एनपीए से इंडियन इकोनॉमी की ग्रोथ सुस्त रही। नए साल यानी 2018 में सरकार का फोकस इकोनॉमी में टर्न अराउंड को लेकर था, लेकिन अब रुपए ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। डॉलर के मुकाबले रुपया 16 महीनों के निचले स्तर पर आ गया है। एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि अभी कई घरेलू और बाहर के स्तर पर कारण हैं, जिससे रुपए में कमजोरी बढ़ेगी। ऐसे में रुपए का लगातार कमजोर होना अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है। इससे सरकार की बैलेंसशीट बिगड़ने और महंगाई बढ़ने का डर है ही, कॉरपोरेट मार्जिन पर भी बड़ा असर दिख सकता है। ये सभी कारण इकेानॉमिक टर्नअराउंड के रास्ते में रोड़ा बन सकते हैं। 

 

पिछले साल रुपए में जहां 6.75 फीसदी की तेजी रही थी, वहीं इस साल रुपया अबतक 5.15 फीसदी तक कमजोर हो चुका है। दूसरी ओर यूएस के आंकड़े अच्छे आने से डॉलर इंडेक्स पिछले 3 महीने में 5 फीसदी तक मजबूत हो गया है। डॉलर इंडेक्स 89 के स्तर से 93.30 के स्तर पर पहुंच गया है। यूएस में डाटा अच्छा आने से डॉलर इंडेक्स और मजबूत होने के आसार हैं। जो रुपए के लिए निगेटिव है। 

 

72 प्रति डॉलर का दिख सकता है स्तर
केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया का कहना है कि यूएस में इनफ्लेशन का 2 फीसदी का टारगेट पूरा हो गया है। ऐसे में वहां सेंट्रल बैंक 3 से ज्यादा बार भी इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकती है। ऐसा होने पर डॉलर इंडेक्स में और मजबूती आएगी। 10 साल के बॉन्ड यील्ड में लगातार तेजी है, जिससे निवेशकों का रूझान इक्विटी में कम हो रहा है। भारत से भी विदेशी निवेशक लगातार पैसे निकाल रहे हैं, जिससे रुपए में कमजेारी और बढ़ रही है। क्रूड में अभी कमी होने के आसार नहीं हैं। क्रूड खरीदने के लिए डॉलर की मांग बढ़ रही है, जिसका रुपए पर निगेटिव असर है। रिजर्व बैंक द्वारा भी अभी दखल देने की ज्यादा उम्मीद नहीं है। क्योंकि ट्रेड डेफिसिट बिगड़ा है, वहीं डॉलर इंडेक्स हाई पर है। ऐसे में रुपया 72 प्रति डॉलर का स्तर दिखा सकता है। 

 

कैसे बनेगा सरकार के लिए मुसीबत 

 

बढ़ेगा ऑयल इंपोर्ट बिल
रुपए में कमजोरी से देश के ऑयल इंपोर्ट बिल पर असर दिखने लगा है। अप्रैल में सालाना आधार पर ऑयल इंपोर्ट बिल 41.49 फीसदी बढ़कर 1041 करोड़ डॉलर हो गया है। बता दें कि भारत अपनी जरूरतों का 82 फीसदी क्रूड इंपोर्ट करता है। दूसरी ओर कच्चे तेल की कीमतें भी इंटरनेशनल मार्केट में लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में इस मोर्चे पर सरकार को दोहरी मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। रुपए में कमजोरी के चलते सरकार को डॉलर में ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। इससे बैलेंसशीट और बिगड़ने का खतरा बना हुआ है। 
 

चालू घाटा बढ़ने का डर
एक रिपोर्ट के अनुसार, फाइनेंशियल ईयर 2018-19 में चालू खाता घाटा (सीएडी) जीडीपी का 2.4 फीसदी रह सकता है। अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में यदि क्रूड आगे और महंगा होता है तो यह और बढ़कर 2.9 फीसदी रह सकता है। जाहिर है कि क्रूड महंगा होने और रुपए में कमजेारी का यहां भी खामियाजा उठाना पड़ रहा है। 
 

ट्रेड डेफिसिट का बढ़ रहा है गैप 
रुपए में कमजेारी से इंपोर्ट महंगा होता है, जिसका सीधा असर ट्रेड डेफिसिट पर देखा जा सकता है। कॉमर्स मिनिस्ट्री के डाटा के अनुसार अप्रैल में भारत का आयात 4.60 फीसदी बढ़कर 3963 करोड़ डॉलर हो गया। इसके चलते अप्रैल का ट्रेड डेफिसिट 1372 करोड़ डॉलर का रहा। 
 

इंपोर्ट बेस्ड कंपनियों के मार्जिन पर दबाव , महंगाई भड़कने का डर
रुपए में गिरावट से इंपोर्ट बेस्ड कंपनियां प्रभावित होती हैं। उन्हें इंपोर्ट के बदले डॉलर में पेमेंट करना होता है। ऐसे में डॉलर मजबूत होने से कंपनियों को इंपोर्ट के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ता है। जिसका असर सीधे तौर पर उनके मार्जिन पर पड़ता है। कॉरपोरेट अर्निंग घटने का असर इकोनॉमी पर होता है। मसलन मिनरल्स, इंजीनियरिंग, केमिकल, इलेकट्रॉनिक्स, एडिबल ऑयल, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, मेटल, माइनिंग और जेम्स एंड ज्वैलरी सेक्टर से जुड़ी कंपनियों को नुकसान होगा। 
 

भारत के फॉरेक्स रिजर्व में कमी 
रुपए में गिरावट का भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी असर दिखा है। 4 मई तक के डाटा के अनुसार एक हफ्ते में विदेशी मुद्रा भंडार 143 करोड़ डॉलर घटकर 41890 करोड़ डॉलर रह गया है। रुपए में गिरावट कम करने के लिए आरबीआई द्वारा डॉलर सेल करने की वजह से मुद्रा भंडार में कमी आई है। इसके पहले 13 अप्रैल को विदेशी मुद्रा भंडार 42602 करोड़ डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था। हालांकि एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) के चीफ इकोनॉमिस्ट यासुयुकी सवादा के अनुसार भारत में विदेशी मुद्रा भंडार बेहतर स्थिति में है। ऐसे में रुपए का मौजूदा लेवल ज्यादा चिंता की वजह नहीं है। 


आगे भी पढ़ें, 

 

इक्विटी मार्केट से आउटफ्लो का डर 
डॉलर में मजबूती से इक्टिी मार्केट से विदेशी निवेशकों के निकलने का खतरा बना रहता है। वहीं, नए सिरे से विदेशी निवेश में भी कमी आती है। डॉलर में मजबूती का असर इक्विटी मार्केट पर दिख भी रहा है। इस साल अप्रैल तक विदेशी निवेशकों ने घरेलू शेयर बाजार से करीब 1675 करोड़ रुपए निकाल लिए हैं। 

prev
next
मनी भास्कर पर पढ़िए बिज़नेस से जुड़ी ताज़ा खबरें Business News in Hindi और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट