महंगाई /पेट्रोल-डीजल की अधिक कीमत देने के लिए रहें तैयार, मोदी सरकार के सामने होगी बड़ी चुनौती

  • अमेरिका ने तेल उत्पादन के लिए ड्रिलिंग प्रक्रिया को धीमा किया

Money Bhaskar

May 20,2019 04:20:00 PM IST

नई दिल्ली। एक्जिट पोल के नतीजों के मुताबिक केंद्र में एक बार फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने जा रही है। लेकिन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पेट्रोल-डीजल के दाम को काबू करने की होगी। इसकी मुख्य वजह है कि ऑर्गेनाइजेशन ऑफ दि पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) ने कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती का फैसला किया है जो अगले साल जनवरी से लागू होगा। ओपेक तेल के भंडार को भी कम करना चाहते हैं। इसका सीधा असर कच्चे तेल के दाम पर देखने को मिला। सोमवार को कच्चे तेल की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया।


पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम में हो सकती है बढ़ोतरी


पेट्रोलियम कंपनियों के अधिकारियों के मुताबिक भारत के पास 15-20 दिनों के लिए तेल का रिजर्व होता है और कच्चे तेल की कीमतों के मुताबिक ही रोजाना स्तर पर तेल की खुदरा कीमत तय की जाती है। ऐसे में, पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम में एक बार फिर से रोजाना स्तर पर बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। पिछले साल मई-जून में भी पेट्रोल-डीजल के दाम में लगातार बढ़ोतरी हुई थी और मुंबई में पेट्रोल की कीमत 90 रुपए प्रति लीटर तक चली गई थी। एजेंसी की खबरों के मुताबिक ओपेक के साथ रूस एवं अन्य पेट्रोलियम उत्पादक देश जिसे ओपेक प्लस के नाम से जाना जाता है, आगामी जनवरी से तेल के उत्पादन में रोजाना स्तर पर 12 लाख बैरल की कटौती का फैसला किया है। ताकि वे अपने तेल के स्टॉक को खत्म कर सके और तेल की कमजोर होती कीमतों में मजबूती ला सके। इस साल की दूसरी छमाही से वे अपनी इस योजना को अंजाम देने के लिए धीरे-धीरे अपने स्टॉक को घटाना शुरू कर देंगे।


अमेरिका ने भी तेल उत्पादन के लिए ड्रिलिंग प्रक्रिया को धीमा किया


एजेंसी की खबरों के मुताबिक दूसरी तरफ अमेरिका ने भी तेल उत्पादन के लिए ड्रिलिंग प्रक्रिया को धीमा कर दिया है। ऐसे में, कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव में बढ़ोतरी का रुख जारी रह सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल में तेजी से रुपए पर भी असर पडे़गा। रुपए के कमजोर होने की आशंका लगातार प्रबल होती जाएगी और व्यापार घाटे पर भी प्रतिकूल असर होगा। आयात बिल में सबसे अधिक योगदान पेट्रोलियम पदार्थों का होता है और अप्रैल माह में व्यापार घाटा 10 फीसदी से अधिक रहा जबकि निर्यात में 0.5 से भी कम की बढ़ोतरी रही।

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