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मोदी के लिए क्रूड बनेगा मुसीबत, इकोनॉमी सर्वे ने GDP गिरने और महंगाई बढ़ने का बताया खतरा

इंटरनेशनल मार्केट और इंडियन बास्केट में क्रूड की बढ़ रही कीमतें मोदी सरकार के लिए बड़ा चैलेंज बन गई हैं।

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नई दिल्ली. इंटरनेशनल मार्केट और इंडियन बास्केट में क्रूड की बढ़ रही कीमतें मोदी सरकार के लिए बड़ा चैलेंज बन गई हैं। इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि कच्चे तेल की कीमतें फाइनेंशियल ईयर 2019 में 12 फीसदी तक बढ़ सकती हैं। अगर ऐसा होता है कि देश की इकोनॉमी पर इसका असर दिखेगा। सर्वे के अनुसार कच्चे तेल में हर 10 डॉलर की बढ़ोत्तरी से जीडीपी 0.3 फीसदी तक गिर सकती है, वहीं महंगाई दर भी 1.7 फीसदी ऊंची हो सकती है। यह स्थिति मोदी के लिए चुनौतीपूर्ण साबित होगी। 

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जून 2017 के पहले तेल सरकार के लिए बना एडवांटेज 
मिड जून 2017 के पहले पिछले 3 साल भारत को इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड की कम कीमतों का फायदा मिला है। मोदी सरकार जब सत्ता में आई थी, तब कच्चे तेल की कीमतें इंटरनेशनल मार्केट में 110 डॉलर प्रति बैरल थीं, जो जून 2017 में घटकर 48 डॉलर तक आ गईं। यानी कीमतों में 50 फीसदी से ज्यादा कमी आई। इससे सरकार को बैलेंसशीट में सुधार करने और महंगाई कंट्रोल करने में मदद मिली। देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आती गई। लेकिन, अब तेल की बढ़ रही कीमतों के बीच यह एडवांटेज सरकार को नहीं मिल पा रहा है। 

 

नहीं मिल पा रहा सस्ते तेल का फायदा 
जून 2017 के बाद से कच्चे तेल की कीमतें इंटरनेशनल मार्केट में 55 फीसदी से ज्यादा बढ़ चुकी हैं। वहीं, इसके आगे 12 फीसदी और बढ़ने का अनुमान है। बता दें कि भारत अपनी जरूरतों का करीब 82 फीसदी तेल दूसरे देशों से खरीदता है। देश में हर दिन 45 लाख बैरल यानी करीब 72 करोड़ लीटर कच्चे तेल की खपत है। इस लिहाज से भारत यूएस और चीन के बाद दुनिया में तीसरे पायदान पर है। खपत के रेश्‍यो में देश का ऑयल रिजर्व कम है। इस वजह से सरकार को तेल पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। तेल की बढ़ती कीमतों से सरकार का यह खर्च बढ़ रहा है। 

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क्रूड में 10 डॉलर की बढ़ोत्तरी से ग्रोथ में 0.3% कमी
सर्वे में कहा गया कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती हैं तो उस रेश्‍यो में ग्रोथ में 0.2 से 0.3 फीसदी तक कमी आती है। वहीं, डबल्यूपीआई इनफ्लेशन में 1.7 फीसदी की बढ़ोत्तरी होती है। इसी तरह से करंट अकाउंट डेफिसिट 1000 करोड़ डॉलर बढ़ सकता है। देखा जाए तो जून 2017 के बाद से कच्चे तेल की कीमतें 44 डॉलर से बढ़कर 70 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई हैं। यानी कीमतों में 26 डॉलर प्रति बैरल का इजाफा हो चुका है। वहीं, आगे इसमें 12 फीसदी और इजाफा होने का अनुमान है जो इकोनॉमी के लिए निगेटिव संकेत है। 

 

क्रूड 3 साल के हाई पर, पेट्रोल-डीजल में रिकॉर्ड तेजी 
इस हफ्ते क्रूड की कीमतें 71 डॉलर प्रति बैरल पार कर गई थीं जो दिसंबर 2014 के बाद सबसे ज्यादा है। वहीं, डबल्यूटीआई क्रूड की कीमतें भी 66 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर पर हैं। क्रूड में तेजी का असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर देखा जा रहा है। सोमवार को दिल्ली में पेट्रोल 72.84 रुपए प्रति लीटर तो डीजल 63.93 रुपए प्रति लीटर के रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया। वहीं, पेट्रोल-डीजल महंगा होने से आम आदमी की जेब पर बोझ लगातार बढ़ रहा है। 
 

क्यों बढ़ रही है क्रूड की कीमतें 
केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया के मुताबिक , यूएस में लगातार 10वें हफ्तें में क्रूड इन्वेंट्री में कमी आई है। वहीं, डॉलर लगातार कमजेार बना हुआ है। जिसका असर क्रूड की कीमतों पर दिख रहा है। दूसरी ओर ओपेक (OPEC) देशों के अलावा रूस में तेल का प्रोडक्शन घटा देने से मार्केट में सप्लाई कमजोर हुई है। इन वजहों से मार्केट में ओवरबॉट की स्थिति बनी है, जिसका असर क्रूड की कीमतों पर दिख रहा है। आगे भी यह कंसर्न जारी रहने की उम्मीद है और क्रूड 75 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है। 
 
एक्साइज ड्यूटी घटाने का दबाव 
पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार ने 3 अक्अूबर 2017 को एक्साइज ड्यूटी में कटौती की थी। पेट्रोल और डीजल दोनों पर 2 रुपए प्रति लीटर ड्यूटी घटाई गई थी। हालांकि 3 अक्टूबर के बाद पेट्रोल और डीजल उससे भी ऊंचे स्तरों पर वापस पहुंच गया है।  3 अक्टूबर को इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड 55 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर था जो 29 जनवरी 2018 को 70 डॉलर के लेवल पर पहुंच गया। इंडियन बास्केट में भी क्रूड इसी रेश्‍यो में महंगा हुआ है। ऐसे में कंज्यूमर्स को राहत देने के लिए सरकार पर फिर एक्साइज ड्यूटी घटाने का दबाव बन गया है। वहीं, जब क्रूड सस्ता था तो सरकार को एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर खजाना भरने का मौका मिल गया था। 
 

एक्साइज ड्यूटी से भरा था खजाना
शुरू के 3 साल में सस्ते क्रूड से सरकार को पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाने का मौका मिल गया। 3 अक्टूबर 2017 के पहले 3 साल में सरकार ने पेट्रोल पर एक्‍साइज ड्यूटी 15.5 प्रति लीटर से बढ़ाकर 22.7 रुपए प्रति लीटर कर दिया, वहीं डीजल पर यह 5.8 प्रति लीटर से 19.7 रूपए प्रति लीटर पर पहुंच गया। पिछले चार साल के आंकड़े बताते हैं कि केंद्र एवं राज्य, दोनों सरकारों ने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स से मोटी रकम जुटाई है। मसलन, 2013-14 में केंद्र सरकार को पेट्रोलियम पर टैक्स से 1.1 लाख करोड़ रुपए की आमदनी हुई, जो साल 2016-17 में बढ़कर 2.5 लाख करोड़ रुपए हो गई।

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क्या होगा असर?
1) बढ़ सकता है करंट अकाउंट डेफिसिट 

- क्रूड की कीमतें बढ़ने से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है। असल में भारत अपनी जरूरतों का 82 % क्रूड इंपोर्ट करता है। क्रूड की कीमतें लगातार बढ़ने से भारत का इंपोर्ट बिल उसी रेश्‍यो में महंगा होगा, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट की स्थिति बिगड़ेगी। 
 
2) महंगाई बढ़ने की आशंका
- क्रूड की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ने का भी डर होता है। इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड महंगा होने से इंडियन बास्केट में भी क्रूड महंगा हो जाता है। इससे तेज कंपनियों पर मार्जिन का दबाव भी बढ़ता है।
- तेल कंपनियां क्रूड की कीमतों में होने वाली बढ़ोत्तरी को कंज्यूमर्स पर डाल सकती है। ऐसे में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी से महंगाई बढ़ने का भी डर होता है। हाल ही में फॉरेन ब्रोकरेज हाउस यूबीएस ने रिपोर्ट में कहा था कि अगर क्रूउ की कीमतें 10 % बढ़ती हैं तो सीपीआई इन्फलेशन में 25 बेसिस प्वॉइंट की बढ़ोत्तरी हो सकती है।

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