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गेहूं से मशरूम उगा रहे पंजाब के किसान, कमाई व उत्‍पादन में 50 फीसदी की बढ़ोतरी

गेहूं और चावल की खेती के लिए प्रसिद्ध पंजाब के किसान मशरूम पैदा करने में भी नंबर वन है।

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नई दिल्‍ली। गेहूं और चावल की खेती के लिए प्रसिद्ध पंजाब के किसान मशरूम पैदा करने में भी नंबर वन है। वे अब नए तरीके से गेहूं से मशरूम भी पैदा कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी शिमला के प्रयोग ने गेहूं के दानों और फिर गेहूं के भूसे से मशरूम तैयार करने की विधि खोजी है। अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक पंजाब में पिछले दो सालों में मशरूम उत्‍पादन में पहले की अपेक्षा 70 फीसदी का इजाफा हुआ है। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अब इस विधि का पेटेंट भी कराने की तैयारी कर रहे हैं।
 
खर्च होते हैं सिर्फ 5 हजार कमाई होती है 15 की
यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अनंत कुमार ने इस नई विधि को वर्ष 2013 में इजाद किया था। इसके तहत 15 किलोग्राम मशरूम बनाने के‍ लिए 10 किलोग्राम गेहूं के दानों की आवश्‍यकता होती है। इस गेहूं को उबाला जाता है और इस पर मशरूम पाउडर डाला जाता है, जिससे मशरूम का बीज तैयार हो जाता है। इसे तीन महीने के लिए इस बीज को 10 किलोग्राम गेहूं के भूसे में 10 ग्राम बीज के हिसाब से रखा जाता है। 3 महीने बाद गेहूं के ये दाने मशरूम के रूम में अंकुरित होने शुरू हो जाते हैं। इसके बाद इन्‍हें 20 से 25 दिनों के लिए पॉलीथीन में डालकर 25 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान वाले कमरे में रखा जाता है। इस प्रक्रिया के बाद प्राप्‍त होने वाले मशरूम को सीधे बाजार में या किसी कंपनी के साथ कांट्रेक्‍ट कर बेचा जाता है। इस विधि में केवल 5 हजार रुपए का खर्च आता है और इससे जो मशरूम बिकता है वह करीब 15 हजार रुपए का होता है।
 
पंजाब में भारत का कुल 40 फीसदी मशरूम उत्‍पादन
बता दें कि पंजाब और हरियाणा में ही सबसे पहले 1987 में खाद्य मशरूम की खेती शुरू हुई थी। भारत में करीब 15000 टन प्रति वर्ष मशरूम का उत्‍पादन होता है। लेकिन, हरियाणा और पंजाब दोनों राज्‍य कुल मिलाकर इस क्षमता का 60 फीसदी से ज्‍यादा मशरूम उत्‍पा‍दन करते हैं। इसमें से भी करीब 40 फीसदी हिससेदारी अकेले पंजाब की है। यहां तकरीबन 6000 टन मशरूम उत्‍पादन होता है। पिछले दो सालों में पंजाब में मशरूम के उत्‍पादन में 50 से 60 फीसदी की बढ़ोतरी की उम्‍मीद है। गौरतलब है कि भारत का मशरूम निर्यात कोटा लगभग 4000 टन सालाना है। सबसे ज्‍यादा निर्यात भारत से अमेरिका को किया जाता है।   
 
अगली स्‍लाइड में जाने 2 साल में कितने किसान जुड़े नई विधि से....
 
 
2 सालों में 10 गुनी हुई किसानों की संख्‍या
शुरूआत में पंजाब और हिमाचल के कुछ किसानों ने यूनिवर्सिटी की सलाह और मॉडल को देखकर इस तरह मशरूम की खेती शुरू की थी। उस वक्‍त केवल 50 किसानों इस खेती को शुरू किया था। इनमें भी वे किसान शामिल थे जिन्‍हें पहले से मशरूम की खेती का अनुभव था। लेकिन, अब पिंजौर निवासी परविंदर सिंह बताते हैं कि मौजूदा समय में आसपास के जिलों में किसानों की संख्‍या 500 से अधिक है। उन्‍होंने बताया कि मशरूम की खेती में मेहनत और लागत कम है जबकि, फायदा अन्‍य फसलों से अधिक है। वे जो मशरूम पैदा करते हैं उनकी मांग पंजाब के ही बड़े शहरों में काफी है। अधिकतर किसानों ने कई कंपनियों के साथ भी समझौता किया हुआ है इसलिए वे तैयार मशरूम को उनके फार्म से ही खरीद लेते हैं। इसलिए मशरूम के बाजार की भी समस्‍या किसानों के सामने नहीं है।
 
भूसे और सड़ने वाले गेहूं का सही इस्‍तेमाल
दरअसल, पंजाब में गेहूं की कटाई बड़े-बड़े हार्वेस्‍टर मशीनों से होती है। इसमें गेहूं का आधा भाग खेत में ही रह जाता है और काफी गेहूं बर्बाद भी होता है। इसके बाद किसान गेहूं के इस हिस्‍से को जला देते हैं। इससे बड़ी मात्रा में प्रदूषण भी होता है। पंजाब में जलाए जाने वाले इस भूसे के लिए कई बार सरकारों के स्‍तर पर भी चिंता जताई जा चुकी है। सेटेलाइट चित्रों से भी कई बार धोखा होता है। ऐसे में इस तरह मशरूम के भूसे के बड़े इस्‍तेमाल से मशरूम की खेती की जाए तो भूसे को इस्‍तेमाल किया जा सकता है। साथ ही किसान बेकार होने वाले गेहूं को ही मशरूम बनाने में इस्‍तेमाल कर रहे हैं। 
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