10 फीसदी और गिर सकते हैं रबड़ के दाम, सस्‍ते इम्‍पोर्ट ने बढ़ाई मुश्किलें

COMMODITY TEAM

Sep 03,2015 07:43:00 AM IST
नई दि‍ल्ली। घरेलू बाजार में रबड़ की गिरती कीमतों को रोकने और रबड़ किसानों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार की कोशिशों का कोई खास असर नहीं हो रहा है। बीते तीन साल में रबड़ के दाम करीब 50 फीसदी घट चुके हैं। अगले 6 माह में कीमतें और 10 फीसदी घट सकती हैं। कर्नाटक जैसे प्रमुख रबड़ उत्पादक राज्‍य ने रबड़ किसानों को 300 करोड़ रुपए का राहत पैकेज दिया है, वहीं केंद्र सरकार ने रबड़ पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर 25 फीसदी कर दिया है। इसके बावजूद रबड़ की कीमतों में गिरावट बनी हुई है और अगले कुछ महीनों तक किसानों को कोई राहत मिलती नहीं दिख रही है।
दरअसल, ग्लोबल मार्केट में रबड़ के दाम 5 साल के निचले स्‍तर पर हैं, जिससे इसका इम्पोर्ट और सस्ता हो गया है। इससे मैन्युफैक्चरर्स घरेलू मार्केट से रबड़ खरीदने की बजाय इम्पोर्ट कर रहे हैं। वहीं, चीन की इकोनॉमी में आए स्लोडाउन से भी डिमांड में तेज गिरावट आई है।
ग्लोबल मार्केट में 23 फीसदी सस्ता है रबड़
पिछले तीन साल के दौरान रबड़ की कीमत आधी रह गई है। 2012 में 240 रुपए प्रति किलो बिकने वाला रबड़ (आएसएस4) आज 112 रुपए प्रति किलो बिक रहा है। इसकी प्रमुख वजह ग्लोबल मार्केट में रबड़ की कीमतों में आई गिरावट को माना जा रहा है। ग्लोबल मार्केट में रबड़ की कीमत घरेलू मार्केट के मुकाबले करीब 23 फीसदी सस्ता है। बुधवार को बैंकाक में रबड़ 91.56 रुपए प्रति किलो बिका और घरेलू बाजार में 112.50 रुपए प्रति किलो। वीनस रबड़ के डायरेक्टर निबु वर्गीस जोसफ ने बताया कि ग्लोबल संकेतों और प्रमुख रबड़ कंज्यूमर इंडस्ट्री की कमजोर मांग से आने वाले दिनों में भी रबड़ की कीमतों में गिरावट जारी रह सकती है। जोसफ के मुताबिक रबड़ कीमत चालू स्तर से 10 फीसदी कर गिर सकती है।
देश में रबड़ का रिकॉर्ड इंपोर्ट
कोट्टायम (केरल) स्थित बीटा रबर के प्रोपराइटर संजीव एस ने कहा कि इंपोर्ट से बढ़ते रबड़ की इन्वेंट्री के चलते पिछले कुछ महीने के दौरान रबड़ की कीमतों में तेज गिरावट आई है। दरसअल टायर कंपनियों के पास सस्ता विकल्प है जिसके कारण वह घरेलू रबड़ खरीदने से बच रही हैं। कारोबारियों के मुताबिक चीन के टायर 15-22 फीसदी सस्ता है। रसर्च फर्म आईसीआरए की रिपोर्ट के अनुसार देश में चीनी टायर का इंपोर्ट पिछले दो साल के दौरान दोगुना हो गया है। इस दौरान चीन से टायर का इंपोर्ट 550 करोड़ रुपए से बढ़कर 1000 करोड़ रुपए पहुंच गया है। वहीं रबड़ बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2014-15 (अप्रैल-मार्च) के दौरान कुल 4.42 लाख टन रबड़ इंपोर्ट हुआ है। कारोबारियों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2015-15 में इससे भी ज्यादा रबड़ इंपोर्ट होने की उम्मीद है।
गिरती कीमतों से सब्सिडी का कम होगा फायदा
इंडियन रबड़ डीलर्स फेडरेशन के प्रेसिडेंट जॉज वैली ने बताया कि कीमतों में लगातार गिरावट की वजह से सब्सिडी की रकम बढ़ती जा रही है। ऐसे में केरल सरकार की सब्सिडी स्कीम का फायदा सिर्फ 75 हजार टन रबड़ को ही मिल पाएगा। जब स्कीम का ऐलान हुआ था उस वक्त सरकार पर 21 रुपए प्रति किलो का सब्सिडी बोझ था। लेकिन अब यह बढ़कर 38 रुपए प्रति किलो पहुंच गया है। वैली के मुताबिक इस स्कीम से ओणम के बाद किसान रबड़ की ज्यादा टैपिंग कर सकते हैं।
सरकार के उठाए कदम नाकाफी
पलक्कड़ (केरल) स्थित फ्लेमिंगो रबड़ के प्रोपराइटर टॉम जॉर्ज के मुताबिक टायर कंपनियां घरेलू बाजार से कम मात्रा में रबड़ की खीरददारी कर रहे हैं। उनके मुताबिक सरकार रबड़ के इंपोर्ट पर रोकरने के लिए कड़े कदम नहीं उठा रही है। इसकी वजह से कीमतों में गिरावट आई और किसान और ट्रेडर्स परेशान हैं। सरकार ने हाल में कहा कि रबड़ प्रोडक्ट के इंपोर्ट पर प्रतिबंध लगाने पर सरकार कोई विचार नहीं कर रही है। फिलहाल रबड़ शीट पर 25 फीसदी और टायर पर सिर्फ 10 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी लगती है। इसकी वजह से घरेलू डिमांड घटी है।
अगली स्लाइड में पढ़िए, क्रूड की गिरावट का क्या होगा रबड़ पर असर...
चीन और क्रूड में आई गिरावट से घटेगी मांग चीन में आए अगस्त के कायसिन पीएमआई आंकड़ों के मुताबिक जुलाई के 47.8 के आंकड़ों की तुलना में अगस्त में यह आंकड़ा गिरकर 47.1 पर पहुंच गया और 50 के नीचे इस आंकड़े का साफ संकेत है कि चीन में मैन्यूफैक्चरिंग गतिविधियों कम हो रही है। चीन में मंदी की आशंका से क्रूड की कीमतें 6 साल के निचले स्तर पर आ गई हैं। रबर की कीमतें क्रूड वायदा को बारीकी से ट्रैक करता है क्योंकि सिंथेटिक रबड़ की कीमतें इससे तय होती हैं। ग्लोबल मार्कट में रबड़ की कीमतें 6 साल के निचले स्तर पर फिसल गई है। हालांकि चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था को रफ्ता देने के लिए ब्याज दरों में कटौती की है। इसके अलावा सिस्टम में बड़े पैमाने पर नकदी भी डाला है। इसे रबड़ की कीमतों को कुछ सहारा जरुर मिलेगा। कीमतों को सहारा देने के लिए सरकार उठा रही है कदम सस्ते इंपोर्ट से किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही है। एक किलो रबड़ का प्रोडक्शन कॉस्ट 140 रुपए प्रति किलो है जबकि मार्केट में दाम सिर्फ 112 रुपए प्रति किलो है। किसानो के हितो की रक्षा करने के लिए सरकार पीक सीजन के दौरान रबड़ के इंपोर्ट पर अपना नियंत्रण बना सकती है। इससे पहले सरकार नो इंपोर्ट ड्यूटी को बढ़ाया था। वहीं केरल सरकार ने रबड़ पर 300 करोड़ रुपए का सब्डिटी की घोषणा की है। भारत अपनी खपत को पूरा करने के लिए करीब 30 फीसदी रबड़ इंपोर्ट करता है।
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