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ट्रेड वार से घरेलू कॉटन कंपनियों को मिलेगा फायदा, इन वजहों से बढ़ेगा एक्सपोर्ट

ट्रेड वार बढ़ने से चीन अब दूसरे देश से कॉटन इम्पोर्ट करेगा, जिसका बेनिफिट घरेलू कॉटन कंपनियों को मिल सकता है।

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नई दिल्ली.  यूएस ने चीन से होने वाले इंपोर्ट पर 60 अरब डॉलर का टैरिफ लगा दिया है। जिसके बाद चीन ने भी अमेरिकी गुड्स पर टैरिफ लगाने की योजना बनाई है, जिसमें कॉटन भी शामिल है। दुनिया में कॉटन की सबसे ज्यादा खपत चीन में है और वह इसकी पूर्ति अमेरिका से कॉटन इंपोर्ट के जरिए करता है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि टैरिफ लगने से यूएस कॉटन महंगा होगा, वहीं इंडियन कॉटन दूसरे देशों के मुकाबले सस्ता है। ऐसे में चीन में इंडियन कॉटन की डिमांड बढ़ने की उम्मीद है। 

 

 

चीन में हर साल 29% की दर से बढ़ा इंपोर्ट 
मार्केट मिरर सर्विसेज के फाउंडर गिरीश काबरा का कहना है कि जनवरी से दिसंबर 2017 के दौरान चीन ने 1.153 मिलियन फॉरेन कॉटन का इंपोर्ट किया है औऱ साल दर साल आधार पर इसमें 28.93 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। कस्टम स्टैटिक्स के मुताबिक, इस दौरान चीन ने 505,000 टन अमेरिकी कॉटन, 258,000 टन ऑस्ट्रेलियन कॉटन और 112,000 टन इंडियन कॉटन इंपोर्ट किया है। चीन में भारत से कॉटन का इंपोर्ट सिर्फ 9.71 फीसदी है। अब अमेरिका से टेंशन बढ़ने से भारत को चीन में कॉटन का एक्सपोर्ट बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

 

इंडियन कॉटन सबसे सस्ता
काबरा का कहना है कि इस समय इंडियन कॉटन का दाम इंटरनेशनल मार्केट में सबसे कम है। पश्चिमी अफ्रीकी देशों से अभी भारत में इम्पोर्ट के लिए कॉटन 93 सेंट प्रति पाउंड (एफओबी) पर उपलब्ध है, जबकि भारत में कॉटन इस समय करीब 83 सेंट प्रति पाउंड है। इस तरह 10 सेंट प्रति पाउंड सस्ता होने से भारतीय कॉटन के प्रति विदेशी बाजार में भी रुझान देखा जा रहा है। इससे चीन में भारतीय कॉटन की मांग बढ़ सकती है। 

 

एक्सपोर्ट बढ़ने की उम्मीद
चालू फसल सीजन में कॉटन का एक्सपोर्ट 70 लाख बेल्स होने का अनुमान है जबकि पहले 55 लाख बेल्स कॉटन के एक्सपोर्ट का अनुमान था। पिछले साल 63 लाख बेल्स कॉटन का एक्सपोर्ट हुआ था। वहीं, कॉटन का इम्पोर्ट चालू सीजन में घटकर 20 लाख बेल्स ही होने का अनुमान है जबकि पिछले सीजन में 27 लाख बेल्स कॉटन का इम्पोर्ट हुआ था

 

 

 

# इन वजहों से बढ़ेगा एक्सपोर्ट

 

इस साल कॉटन की बुआई में कमी की आशंका
देश में 2018-19 फसल वर्ष के दौरान कॉटन खेती में 12 फीसदी की कमी आ सकती है। पिछले साल पिंक बॉलवर्म के हमले के कारण कॉटन की फसल बर्बाद हुई थी। इस साल भी इसका प्रकोप रह सकता है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएआई) के मुताबिक, 2018/19 में अक्टूबर से शुरू होने वाले मार्केटिंग सीजन में कॉटन की बुआई का एरिया घटकर 10.8 मिलियन हेक्टेयर रह सकता है, जबकि करंट ईयर में 12.26 मिलियन हेक्टेयर में कॉटन की बुआई हुई थी। इससे ग्लोबल स्तर पर कॉटन की कीमतों में और तेजी आएगी। 
आगे पढ़ें, और किन वजहों से कीमतों को सपोर्ट ...........

 

 

डिमांड में सुधार आने का अनुमान
उत्पादक राज्यों की मंडियों में फरवरी के आखिर तक कॉटन की आवक 247.10 लाख बेल्स की हो चुकी है। स्पॉट मार्केट में कॉटन का भाव 40,100 रुपए प्रति कैंडी (एक कैंडी- 356 किलो) रहे। आगे एक्सपोर्ट्स की मांग बढ़ने से इसके भाव में सुधार आने का अनुमान है।

 

घरेलू भाव को मिलेगा सहारा
एंजेल ब्रोकिंग कमोडिटी के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट अनुज गुप्ता ने कहा कि पिछले साल भारत ने 63 बेल्स कॉटन का एक्सपोर्ट किया था। देसी कॉटन सस्ता होने से इंपोर्ट में कमी आएगी क्योंकि मिलों को कॉटन का इंपोर्ट महंगा पड़ेगा। इससे घरेलू भाव को सहारा मिलेगा।

 

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