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खास खबर : अच्‍छा मानसून क्‍या कि‍सानों के भी अच्‍छे दिन लाएगा, मोदी के सामने होगा चैलेंज

इसका फायदा करीब 26 करोड़ किसानों को मिलता है।

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नई दि‍ल्‍ली। मानूसन तय तारीख से तीन दि‍न पहले केरल आ पहुंचा है। भारतीय मौसम वि‍ज्ञान वि‍भाग (आईएमडी) ने जून-सितंबर में लंबी अवधि के लिए औसत मानसून 97 फीसदी एलपीए अनुमानित किया है। एलपीए (लॉन्‍ग पीरि‍यड एवरेज) का 96-104% तक होना सामान्य मानसून का सूचक होता है। भारत में 60 से 65 फीसदी खेती अभी भी मानसून पर निर्भर है। जून-सितंबर के मानसून से देश को वार्षिक वर्षा का लगभग 70 फीसदी हिस्सा मिलता है। इसका फायदा करीब 26 करोड़ किसानों को मिलता है। अच्‍छे मानसून से अच्‍छी पैदावार की संभावना तो जताई जा सकती है मगर क्‍या अच्‍छी पैदावार से कि‍सानों के अच्‍छे दि‍न आते हैं ये अब एक बड़ा सवाल है। 


अच्‍छा मानसून-रि‍कॉर्ड प्रोडक्‍शन 
वर्ष 2017 में मानसून सामान्‍य रहा और अनाज का रि‍कॉर्ड उत्‍पादन हुआ। तीसरे अग्रिम अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2017-18 के लिए देश में कुल खाद्यान्‍न उत्‍पादन 279.51 मिलियन टन हुआ है, जो वर्ष 2016-17 के दौरान हुए 275.11 मिलियन टन के पिछले रिकॉर्ड खाद्यान्‍न उत्‍पादन से 4.40 मिलियन टन अधिक है। 


रि‍कॉर्ड प्रोडक्‍शन - ओवर सप्‍लाई 
जब रि‍कॉर्ड प्रोडक्‍शन होता है तो बाजार में सप्‍लाई बढ़ जाती है। बाजार का सीधा सा नि‍यम यही है कि‍ सप्‍लाई बढ़ने पर दाम कमजोर हो जाते हैं। कि‍सानों के पास स्‍टोरेज की सुवि‍धा नहीं है और फि‍र उन्‍हें अगली फसल बोने के लि‍ए भी पैसों की जरूरत होती है ऐसे में उनकी मजबूरी हो जाती है कि‍ जो भी दाम मि‍ले उसी में संतोष कर लें। सरकार के पास अभी तक इतनी कैपेसि‍टी नहीं है कि‍ वह देशभर के कि‍सानों की उपज खरीद सके और यह प्रैक्‍टि‍कल भी नहीं है। जहां तक ऑप्‍शन एक्‍सपोर्ट को प्रमोट करने का है तो अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में कंपटीशन पहले से ही काफी टफ है जैसे इस बार चीनी और गेहूं के रेट इंटरनेशनल मार्केट में भी काफी नीचे हैं। 


नहीं मि‍ली वाजि‍ब कीमत 
इस साल आलू, टमाटर, मि‍र्च और दलहन की खेती करने वाले कि‍सानों को ज्‍यादा उत्‍पादन की वजह से कीमतों पर समझौता करना पड़ा। अप्रैल में चने का भाव बीते साल के मुकाबले करीब 42 फीसदी और एमएसपी से करीब 21 फीसदी कम गया था। इसी माह में तूअर का रेट भी कि‍सानों को एमएसपी से 25 फीसदी कम मि‍ल रहा था। 


मार्केट मि‍रर ग्रुप के एग्री रि‍सर्च हेड हि‍तेश भाला के मुताबि‍क, भले ही इस बार मानसून बहुत अच्‍छा हो। मगर बीते वर्ष दलहन कि‍सान को जो झटका लगा है उसकी वजह से इस बार इनकी बुवाई यकीनन कम होगी। बीते साल मानूसन अच्‍छा था, कि‍सानों ने बुवाई भी की और प्रोडक्‍शन भी दि‍या मगर सरकार अपने वादे को पूरा नहीं कर पाई। बाजार में सबसे बुरा हाल दलहन का हुआ। 


उदाहरण सामने है 
1 सड़कों पर फेंका टमाटर,  मार्च 2017 - वाजि‍ब दाम न मि‍ल पाने की वजह से छत्‍तीसगढ़ कि‍सानों पर टनों टमाटर सड़कों पर फेंक दि‍या। ठीक इसी तरह से उन्‍होंने 2016 में भी वि‍रोध जताया था। 
2 मि‍र्च की होली जलाई, 28 अप्रैल 2017 - मि‍र्च की सही कीमत न मि‍लने से नाराज तेलंगाना के कि‍सानों ने अपनी फसल को आग लगा दी थी। 
3 सड़कों पर बहा दूध, 1 जून 2017 -  महाराष्ट्र के किसानों ने बड़ा आंदोलन शुरू कि‍या जो बाद में हिंसक भी हो गया था। कि‍सानों ने सड़कों पर टनों दूध बहा दि‍या था। 
4 आलू फेंके, 6 जनवरी, 2018 - उत्तर प्रदेश विधानसभा के सामने आलू फेंककर किसानों ने अपना विरोध दर्ज कराया। किसान को 150 से 200 रुपये प्रति क्‍विंटल आलू बेचना पड़ रहा था।
5 गन्‍ना कि‍सानों को इंतजार - गन्‍ने का बंपर प्रोडक्‍शन होने के चलते इस बार चीनी का भी रि‍कॉर्ड उत्‍पादन हुआ है। इसकी वजह से बाजार में चीनी के दाम काफी नीचे आ गए। चीनी मि‍लों पर कि‍सानों का करीब 22 हजार करोड़ रुपए बकाया है। 


क्‍यूं नहीं पहुंचता कि‍सानों को फायदा 
एग्री बि‍जनेस एक्‍सपर्ट वि‍जय सरदाना कहते हैं कि कि‍सानों के साथ क्‍या हो रहा है ये आप एक छोटे से उदाहरण से समझें। हम जि‍स फल या सब्‍जी के लि‍ए दि‍ल्‍ली में 50 रुपए देते हैं। कि‍सान को उसके 5 से 10 रुपए ही मि‍लते है। हर ब्‍यूरोक्रेट और हर नेता को ये पता है कि‍ ये 40 रुपए कहां जाते हैं। एपीएमसी की वजह से मंडि‍यों में सरकारी मोनोपोली बन गई है। जब तक पॉलि‍सी लेवल पर सुधार नहीं होगा, पैदावार कुछ भी हो कि‍सानों तक उसका फायदा नहीं पहुंचेगा। 


फार्म ग्रोथ और मानसून का संबंध 
नीचे दी गई टेबल बताती है कि‍ मानसून कि‍स तरह से फार्म ग्रोथ रेट को प्रभावि‍त करता है। वर्ष 2014 और 2015 दोनों में सूखा पड़ा था। 

वर्ष  फार्म ग्रोथ  मानूसन
2013-14 5.6  सामान्‍य से अधि‍क
2014-15 - 0.2  12% कम 
2015-16  0.7 14% कम
2016-17  4.9 सामान्‍य 
     

   

ये है किसान की हालत 
देश की जीडीपी में तकरीबन 17 फीसदी की हि‍स्‍सेदारी एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर की है। देश की 50% वर्कफोर्स कि‍सी न कि‍सी रूप में एग्रीकल्‍चर एंड अलाइड सेक्‍टर से रोजगार मि‍लता है। मगर एनएसएसओ के 70वें राउंड के मुताबि‍क, भारत में कि‍सान परि‍वार की औसत मासि‍क आय 6426 रुपए है। देश के 4.69 करोड़ कि‍सान कर्जदार हैं। लगभग 80 करोड़ लोग गांवों में रहते हैं। 


पैसा आता है मगर कि‍सानों तक नहीं पहुंच पाता 
भारतीय कि‍सान यूनि‍यन के महासचि‍व धर्मेंद्र मलि‍क का कहना है कि‍ जब तक सरकार फूड प्रोसेसिंग की यूनि‍ट्स को गांवों में प्रमोट नहीं करती तब तक कि‍सानों को इसी तरह से नुकसान उठाना पड़ेगा। अगर गांवों के आसपास चिप्स बनाने व सॉस बनाने की फैक्‍ट्रियां होतीं तो आलू और टमाटर कि‍सान अपनी उपज सड़कों पर नहीं फेंकते। आप देखें कि भले ही आूल के थोक रेट 2 तक आ गए थे मगर मार्केट में चिप्स के दाम तो नहीं गि‍रे। भले ही टमाटर के थोक रेट 5 रुपए आ गए मगर सॉस के दाम तो नहीं घटे। सारा लाभ कॉरपोरेट की जेब में गया। 


 

सरकार के सामने होगी चुनौती
मोदी सरकार ने वर्ष 2022 तक कि‍सानों की आय दोगुनी करने का वादा कि‍या है।  सरकार अब एमएसपी भी लागत से डेढ़ गुना ज्‍यादा पर तय कर रही है। मगर तथ्‍य तो ये भी है कि‍ एमएसपी की गारंटी केवल उन्‍हीं कि‍सानों को है जि‍नकी उपज सरकार खरीदती है और शांता कुमार कमेटी के मुताबि‍क, देश के करीब 6 फीसदी कि‍सान ही एमएसपी का लाभ उठा पाते हैं। असली चुनौती खुले बाजार में उपज बेचने वाले कि‍सानों को एमएसपी के आसपास दाम दि‍लाना होगा। 

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