Home » Market » Commodity » AgriMakaibari tea from darjeeling is one of the most expensive teas in the World

खत्म हो रहा है मकईबाड़ी का जादू, पीएम मोदी ने महारानी एलिजाबेथ को तोहफे में दी थी यह चाय

सिर्फ चांदनी रात में ही तोड़ी जाती है इस चाय की पत्तियां

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नई दिल्ली.

कभी जिस चाय का जादू दुनिया के सिर चढ़कर बोलता था, अब उसका असर खत्म हो रहा है। दार्जिलिंग की मकईबाड़ी चाय के बागान अपने पुराने मालिक को अलविदा कह रहे हैं। मकईबाड़ी बागानों के मालिक स्वराज कुमार बनर्जी (राजा बनर्जी) ने अपने पुश्तैनी काम को अब छोड़ने का फैसला कर लिया है। ऐसे में इस चाय की खुशबू और स्वाद पहले जैसे लोगों को लुभा पाएगा या नहीं यह बड़ा सवाल है।

 

1.17 लाख प्रति किलो भाव

Forbes मैगजीन में छपी खबर के मुताबिक राजा बनर्जी इस चाय को उगाने वाले खानदान की चौथी पीढ़ी के हैं। 47 वर्षों तक इस चाय का व्यापार करने के बाद अब वे मकईबाड़ी चाय के बागानों में अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं। 2014 में यह चाय विदेश में 1.17 लाख रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेची गई जो कि एक रिकॉर्ड है। अब भी यह देश की सबसे महंगी चाय में से एक है। यह चाय Silver Tips Imperial ब्रांड नाम से बेची जाती है। इसका फ्लेवर इतना अलग है कि दुनिया के किसी कोने में इस स्वाद की चाय नहीं उगाई जा सकती है।

 

चांदनी रात में ही तोड़ी जाती है इसकी पत्तियां

खास बात यह है कि इस चाय की पत्तियों को सिर्फ चांदनी रात में ही तोड़ा जाता है और सुबह सूरज की किरणें पड़ने से पहले ही पैक कर दिया जाता है। यहां काम करने वाले मजदूरों के मुताबिक अगर सूरज की रोशनी इन पर पढ़ जाए तो इनकी रंगत और स्वाद कम हो जाता है।

 

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2016 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंग्लैंड के बकिंघम पैलेस में महारानी एलिजाबेथ से मिलने गए थेतो उन्होंने महारानी को इस चाय का पैकेट तोहफे में दिया था। 2008 के बीजिंग ओलंपिक और 2014 के ब्राजील में आयोजित फीफा वर्ल्ड कप के खिलाड़ियों और स्टाफ को यह चाय परोसी गई थी। मकईबाड़ी बागानों में सालाना एक लाख किलो चाय का उत्पादन होता है। इसमें से ज्यादातर जापानअमेरिका और ब्रिटेन में बेचा जाता है। 

 

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दार्जिलिंग का सबसे पुराना चाय बागान

दार्जिलिंग के 87 चाय बागानों में से मकईबाड़ी सबसे पुराना है। साथ ही यह दार्जिलिंग का अकेला ऐसा बागान है जिसपर कभी भी अंग्रेजों का अधिकार नहीं रहा। राजा बनर्जी की इस चाय में सिर्फ 12 फीसदी हिस्सेदारी रह गई हैजिसे वे छोड़ने वाले हैं। इसके बाद अब इस चाय पर लक्ष्मी टी कंपनी का पूर्ण अधिकार हो जाएगाजो फिलहाल मकईबाड़ी चाय का बागान संभाल रही है।

 

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राजा बनर्जी ने 47 साल पहले अपने पिता के कहने पर मकईबाड़ी चाय के बागानों को संभालने की जिम्मेदारी ली थी। तब वे सिर्फ 23 के थे। उनके परदादा गिरीश चंद्र बनर्जी ने 1859 में इस बागान की बागडोर संभाली थी। गिरीश चंद्र बैनर्जी कलकत्ता से 100 किमी दूर बोराई के एक जमींदार के बेटे थे। चार पीढ़ियों से चले आ रहे इस काम को किसी और के सुपुर्द के बारे में राजा बनर्जी ने तब सोचा जब उनका पुश्तैनी बंगलाजो 1600 एकड़ में फैला था और उनके किसी खजाने से कम नहीं थावह अाग में जलकर राख हाे गया। उनके दोनों बेटे पहले से ही इस खानदानी व्यापार से नहीं जुड़ें हैं। उनका एक बेटा अमेरिका और दूसरा बेंगलुरु में रहता है। फिलहाल वह चाय के बागानों के बीच ही रहने वाले हैं। वहां पर वे अपने लिए बैंबू कॉटेज बनवा रहे हैं। कुछ समय तक वे वहीं रहेंगे।

 

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विदेश में भी महकेंगे मकईबाड़ी के बागान

 

लक्ष्मी टी कंपनी के डायरेक्टर और मकईबारी के भावी मालिक रुद्रा चैटर्जी मकईबाड़ी के बागानों को विदेश ले जाने की योजना पर काम कर रहे हैं। वे अफ्रीकी देश रवांडा के 2,000 हेक्टेयर के टी एेस्टेट में मकईबाड़ी उगाने का प्रोजेक्ट तैयार कर रहे हैं।

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