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मोदी सरकार का नया दांव : कांट्रैक्ट फॉर्मिंग, कॉरपोरेट के सहारे बढ़ेगी कि‍सान की इनकम

कि‍सानों की आय दोगुनी करने के अपने वादे को पूरा करने के प्रयास में अब सरकार प्राइवेट कंपनि‍यों पर दांव खेल रही है।

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नई दि‍ल्‍ली। कि‍सानों की आय दोगुनी करने के अपने वादे को पूरा करने के प्रयास में अब सरकार प्राइवेट कंपनि‍यों पर दांव खेल रही है। सरकार ने कांट्रैक्‍ट फार्मिंग का जो मॉडल कानून जारी कि‍या वह कि‍सानों और कॉरपोरेट के बीच समझौतों को आसान बनाएगा।     केंद्र के पास अभी भी ऐसा तंत्र नहीं है जि‍सकी बदौलत कि‍सानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्‍य दि‍लाया जा सके। सरकार ने भले ही एमएसपी को लागत से 1.5 रखने की घोषणा की हो मगर तथ्‍य ये भी है कि अभी देश के केवल 6% कि‍सानों को ही एमएसपी का फायदा मि‍ल पाता है।  ऐसे में प्राइवेट प्‍लेयर्स को जगह देना सरकार को वाजि‍ब वि‍कल्‍प नजर आ रहा है। हालांकि एक्‍सपर्ट्स ने इसके खतरों के प्रति सरकार को आगाह भी कि‍या है। 

 

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कांट्रैक्‍ट फार्मिंग में कि‍सान और कंपनी के बीच फसल के मूल्‍य और उसकी मात्रा को लेकर बुवाई से पहले ही समझौता हो जाता है। फसल कटने के बाद बाजार भाव कुछ भी रहे मगर कि‍सान को वह तय दाम मि‍लता है। अभी महाराष्‍ट्र, हरि‍याणा, कर्नाटक और मध्‍य प्रदेश जैसे राज्‍यों के कुछ कि‍सान कांट्रैक्‍ट फार्मिंग कर रहे हैं। वाजि‍ब कानून के आभाव में कई बार उन्‍हें हि‍तों से समझौता करना पड़ता था। इसलि‍ए कांट्रैक्‍ट फार्मिंग पर मॉडल कानून लाया गया है। 

 

रास्‍ता खुलता है तो उसका स्‍वागत होना चाहि‍ए 


नीति आयोग में लैंड पॉलि‍सी सेल के चेयरमैन डॉक्‍टर टी. हक के मुताबि‍क, इस मॉडल लॉ में कई ऐसे प्रावधान हैं, जो कि‍सानों के हि‍त में हैं जैसे कि‍सी भी सूरत में जमीन का अधि‍कार ट्रांसफर नहीं होगा। इंडि‍यन कांट्रैक्‍ट एक्‍ट 1872 के तहत एक एग्रीमेंट में शामि‍ल दोनों पक्षों को बराबर माना जाता है, मगर इसमें कि‍सानों को कंपनी से कमजोर माना गया है। कि‍सी भी तरह के वि‍वाद के नि‍पटारे के वक्‍त कि‍सान की स्‍थि‍ति‍ को ध्‍यान में रखा जाएगा। 

 

अभी भी नहीं मि‍ल पाता एमएसपी 
हक कहते हैं कि आज भी कि‍सानों को उनकी उपज का लाभकारी दाम तो दूर की बात है एमएसपी भी नहीं मि‍ल पाता है। ऐसे में अगर कि‍सानों को अच्‍छे दाम मि‍लने का कोई वि‍कल्‍प सामने आता है तो उसका स्‍वागत होना चाहि‍ए। कांट्रैक्‍ट फार्मिंग कि‍सानों के लि‍ए फायदेमंद है। हमें केवल ये देखना चाहि‍ए कि कानूनों का उल्‍लंघन ना हो। 


ट्रेनिंग और तकनीक भी देती हैं कंपनि‍यां 
हक के मुताबि‍क, अगर कि‍सान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्‍य मि‍ल रहा है व फसल बिकने की गारंटी मि‍ल रही है तो उसमें बुराई ही क्‍या है। जि‍स भी तरीके से कि‍सानों का वेलफेयर हो उसे अपनाना चाहि‍ए। कंपनि‍यां केवल माल ही नहीं लेतीं बल्‍कि कि‍सानों को ट्रेनिंग,बीज और अन्‍य तकनीकी सहायता भी मुहैया कराती हैं। इससे उनकी प्रोडक्‍टि‍विटी बढ़ती है। 


कंपनि‍यों का मकसद केवल वेलफेयर नहीं होता 
वहीं इंडि‍यन इकोनॉमि‍क सर्वि‍सेज के पूर्व अधि‍कारी डॉक्‍टर महीपाल कहते हैं कि‍ गांवों में जोत छोटी होती जा रही है। सरकार को लोगों की ऑपरेशनल होल्‍डिंग बढ़ाने पर ध्‍यान देना चाहि‍ए। कांट्रैक्‍ट फार्मिंग नई शक्‍ल में पुरानी जंमीदारी प्रथा को जन्‍म दे सकता है। जब बड़ी कंपनि‍यां एग्रीकल्‍चर में उतरेंगी तो उनका मकसद सिर्फ कि‍सानों का वेलफेयर नहीं हो सकता। 


अपने ही खेत पर मजदूर न बन जाए कि‍सान 
हमें इसका दूसरा पहलू भी देखना चाहि‍ए। हर कांट्रैक्‍ट के दो पक्ष होते हैं और जो भी पक्ष एग्रीमेंट तोड़ना है उसे उसका दंड भुगतना पड़ता है। कांट्रैक्‍ट फार्मिंग से कहीं ज्‍यादा बेहतर होती है कॉरपोरेट फार्मिंग, सरकार को इसे प्रमोट करना चाहि‍ए। इस देश में 70 फीसदी कि‍सान छोटे और सीमांत हैं। कहीं ऐसा ना हो कि कांट्रैक्‍ट फार्मिंग की वजह से वह अपने खेत पर केवल एक मजदूर की भूमि‍का में रह जाएं। 


एग्रीकल्‍चर में कॉरपोरेट एंट्री का रास्‍ता 
इधर जय कि‍सान आंदोलन के राष्‍ट्रीय संयोजक अवि‍क साहा कहते हैं कि‍ ‍सान और कंपनि‍यों के बीच कांट्रैक्‍ट हो जाएगा। कि‍सान को उपज का वाजि‍ब दाम मि‍ल जाएगा। ये सब देखने में तो बिल्‍कुल परफेक्‍ट लगता है, मगर कांट्रैक्‍ट फार्मिंग कॉरपोरेट घरानों की एग्रीकल्‍चर में एंट्री का रास्‍ता खोलता है। मॉडल लॉ में जरूर ये लि‍खा है कि कि‍सी भी सूरत में जमीन का टाइटल ट्रांसफर नहीं होगा मगर जमीन छीन लेने का मतलब केवल जमीन छीनना नहीं होता, उसका उपज को छीन लेना भी लैंड ग्रैब होता है। 


20 से 25 करोड़ लोगों का क्‍या होगा 
साहा कहते हैं कि‍ ‍खेत से लेकर आम इंसान की थाली के बीच केवल कि‍सान और आढ़ती  नहीं होता, एक बहुत बड़ी चेन होती है, जि‍समें वो ठेली वाला भी शामि‍ल है जो आपके घर लाकर सब्‍जी देता है। इस चेन में 20 से 25 करोड़ लोग जुड़ें हुए हैं। जब कंपनि‍यां ही उत्‍पादन करेंगी और कंपनि‍यां ही प्रोडक्‍ट बेचेंगी तो बाजार पर उनका एकाधि‍कार बनेगा। ये इस सेक्‍टर से समाजवाद को खत्‍म कर देगा। 

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