बिज़नेस न्यूज़ » Market » Commodity » Agriखास खबर: शुगर इंडस्‍ट्री को बार-बार क्‍यों पड़ रही पैकेज की जरूरत, क्‍या है स्‍थायी हल

खास खबर: शुगर इंडस्‍ट्री को बार-बार क्‍यों पड़ रही पैकेज की जरूरत, क्‍या है स्‍थायी हल

ऐसा पहली बार नहीं है जब शुगर इंडस्‍ट्री को इस तरह के पैकेज की जरूरत पड़ी हो।

Sugar payment crisis : Is there any permanent soulution?

नई दि‍ल्‍ली. केंद्र सरकार ने शुगर इंडस्‍ट्री को राहत देने के इरादे से 8000 करोड़ रुपए के पैकेज को मंजूरी दे दी है। ऐसा पहली बार नहीं है जब शुगर इंडस्‍ट्री को इस तरह के पैकेज की जरूरत पड़ी हो। यूपीए सरकार भी 6000 करोड़ रुपए व राजग भी 1500 करोड़ रुपए पैकेज शुगर इंडस्‍ट्री को दे चुकी है, मगर गन्‍ना कि‍सानों के बकाए का संकट हर साल खड़ा होता है। गन्‍ना केवल एक फसल नहीं है और गन्‍ना कि‍सान केवल कि‍सान नहीं है वह देश की राजनीति का अहम कि‍रदार है। moneybhaskar ने मार्केट एक्‍सपर्ट, इंडस्‍ट्री एक्‍सपर्ट और कि‍सान नेताओं से इस समस्‍या के स्‍थायी समाधान पर बातचीत की। 

 


कैसे बि‍गड़े हालात? 
आंकड़ों के मुताबि‍क, 30 अप्रैल 2018 तक ही देश में करीब 310.37 लाख टन चीनी का उत्‍पादन को चुका था, जबकि‍ देश में चीनी की खपत करीब 250 लाख टन है। वर्ष 2016-17 मार्केटिंग सीजन में कुल 203 लाख टन चीनी का उत्‍पादन हुआ था। इस बार रि‍कॉर्ड प्रोडक्‍शन के चलते चीनी की कीमतें काफी नीचे आ गईं।

 

चीनी का एक्‍स मि‍ल प्राइस 25.60 रुपए से लेकर 26.22 रुपए आ गया, जो कि लागत से भी कम है। इसकी वजह से चीनी मि‍लों के पास नकदी का संकट खड़ा हो गया और कि‍सानों का बकाया लगातार बढ़ता गया। आज कि‍सानों का करीब 22 हजार करोड़ रुपए से ज्‍यादा चीनी मि‍लों पर बकाया हो गया है। 

 

चीनी का उत्‍पादन, मि‍लि‍यन टन में 

2015-16 25.13
2016-17  20.3
2017-18 25 
2018-19 31.37 


अगले साल संकट और बढ़ सकता है

कृषि‍ मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबि‍क, मई 2018 के आखि‍र तक करीब 4.9 मि‍लि‍यन हेक्‍टेयर इलाके में गन्‍ने की बुवाई हो चुकी है। यह बीते साल की इसी अवधि के मुकाबले 1.2 फीसदी ज्‍यादा है। इसके बाद इस बार मानूसन भी सामान्‍य रहने की उम्‍मीद है। अभी तक उसकी चाल भी ठीक है। अगर कुछ अप्रत्‍याशि‍त घटना नहीं हुई तो इस बार गन्‍ने का उत्‍पादन 355.1 मि‍लि‍यन टन (2017-18) से भी ज्‍यादा होगा। वहीं चीनी की मांग में केवल 4 से 5 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है। 

 

इंडि‍यन शुगर मि‍ल्‍स एसोसिएशन, इस्‍मा के डीजी अवि‍नाश वर्मा के मुताबि‍क, हमारे पास 170 से 180 लाख टन का क्‍लोजिंग स्‍टॉक होगा। इसके बाद जैसा कि आंकड़े बता रहे हैं प्रोडक्‍शन और बढ़ेगा तो स्‍थि‍ति और बि‍गड़ेगी। 

 

अब तक सरकार ने क्‍या कदम उठाए

- 8000 करोड़ रुपए का बेलआउट पैकज।
- चीनी का 30 लाख टन का बफर स्‍टॉक बनाया जाएगा। 
- इथनॉल के खरीद मूल्‍य में 6 से 7 रुपए की बढ़ोतरी मंजूर। 
- चीनी का एक्‍स मि‍ल प्राइस न्‍यूनतम 29 रुपए होगा। 
- इथनॉल प्रोडक्‍शन की क्षमता के वि‍स्‍तार के लि‍ए चीनी मि‍लें जो लोन लेंगी उसके ब्‍याज का आधा हि‍स्‍सा सरकार भरेगी। 
- इथनॉल पर जीएसटी 18 फीसदी से घटाकर 12 फीसदी कि‍या। 
- प्रति क्‍विंटल गन्‍ने पर 5.50 रुपए की सब्‍सि‍डी।
- चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी को 100 फीसदी कि‍या। 
- एक्‍सपोर्ट ड्यूटी को पूरी तरह से खत्‍म कर दि‍या गया और चीनी मि‍लों को 20 लाख टन चीनी एक्‍सपोर्ट करने को कहा।


क्‍या इससे संकट का हल नि‍कल जाएगा?
इस पैकेज से शुगर इंडस्‍ट्री को फौरी राहत तो मि‍ल जाएगी। ऑल इंडि‍या शुगर ट्रेड एसोसिएशन के चेयरमैन प्रफुल्‍ल विठलानी के मुताबि‍क, सबसे बड़ी राहत चीनी की न्‍यूनतम एक्‍स मि‍ल प्राइस को तय करने से मि‍ल रही है। अभी तक जो चीनी 27 रुपए के भाव से उठ रही थी, वही चीनी अब 32 के भाव पर उठ रही है। यानी, एक कि‍लो चीनी पर अब पहले के मुकाबले 5 रुपए ज्‍यादा मि‍ल रहे हैं। 


हालांकि‍, इस्‍मा ने इसे नाकाफी बताते हुए कहा है कि‍ चीनी की प्रोडक्‍शन कॉस्‍ट ही 35 रुपए है। ऐसे में 29 रुपए दाम तय करने से उन्‍हें फायदा नहीं होने वाला। अवि‍नाश के मुताबि‍क, सरकार ने जो पैकेज दि‍या है वह भी नाकाफी है, क्‍योंकि‍ उसमें से 4500 करोड़ तो इथनॉल कैपेसि‍टी बिल्‍डिंग के लि‍ए ही हैं। मि‍लों को सरकारी मदद मि‍लते-मि‍लते अक्‍टूबर आ जाएगा, तो कि‍सानों को आखि‍र कैसे भुगतान हो पाएगा। वर्मा के मुताबि‍क, यह इस समस्‍या का स्‍थायी समाधान नहीं है। जब तक इस दि‍शा में ठोस कदम नहीं उठाए जाते तब तक हर साल यही स्‍थि‍ति‍ बनेगी। 

 

केवल 40% बकाया ही चुकता हो पाएगा 

रेटिंग एजेंसी क्रि‍सि‍ल के मुताबि‍क, बफर स्‍टॉक बनाने और एक्‍स शुगर मि‍ल प्राइस को न्‍यूनतम 29 रुपए करने से शुगर मिल्‍स को अगले एक साल में करीब 9100 करोड़ रुपए का कैश फ्लो बढ़ जाएगा। हालांकि‍ मौजूदा बकाये का यह केवल 40 फीसदी के आसपास ही होगा। इसके अलावा इथनॉल प्रोडक्‍शन की क्षमता बढ़ाने के सरकारी प्रयास ज्‍यादा असर दि‍खाएंगे इसकी संभावना भी कम है क्‍योंकि चीनी मि‍लें फि‍लहाल इसमें ज्‍यादा रुचि नहीं दि‍खा रहीं। 

 

तो क्‍या हो सकता है समाधान ?

1. इंडि‍यन शुगर मिल्‍स एसोसिएशन के महानि‍देशक अवि‍नाश वर्मा ने बताया कि‍ हर साल चीनी मि‍लों को सरकार के सामने हाथ ना फैलाना पड़े इसके लि‍ए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। उनका कहना है कि‍ गन्‍ने की कीमत को चीनी की कीमतों से लिंक कि‍या जाए। अगर बाजार में चीनी की कीमतें कम हैं तो गन्‍ने के दाम भी कम होने चाहि‍ए। मार्केट इसी तरह से खुद को बैलेंस करती है।
सरकार गन्‍ने  के दाम तय करना बंद करे।

 

इससे कि‍सान मार्केट और मार्केट प्राइज को देखते हुए फैसला लेगा कि उसे गन्‍ने की कितनी खेती करनी है। सरकार को अन्‍य फसलों जैसे दालों को ज्‍यादा सपोर्ट देना चाहि‍ए।  बाजार में चीनी के मूल्‍य और गन्‍ने की कीमतों में मि‍स मैच को खत्‍म करना होगा। तभी भारतीय चीनी मि‍लों इंटरनेशनल मार्केट में खड़ी हो पाएंगी। 

 

वर्मा के मुताबि‍क, सरकार अगर कि‍सानों को पैसा देना चाहती है तो एक अलग से फंड बनाया जाए, जि‍समें पैसा या तो चीनी उपभोक्‍ता दे या सरकार दे। इसी फंड से गन्‍ना कि‍सानों को पेमेंट की जाए। 

 

2. ऑल इंडि‍या शुगर ट्रेड एसोसि‍एशन के चेयरमैन प्रफुल्‍ल वि‍ठलानी कहते हैं कि‍ गन्‍ने की कीमतों को कम करना होगा, हालांकि‍ मौजूदा राजनीति‍क हालात में ऐसा करना मुमकि‍न नहीं दि‍ख रहा। भारत में गन्‍ने की कीमतें दुनि‍या के मुकाबले करीब 40 फीसदी और सबसे बड़े एक्‍सपोर्टर ब्राजील से करीब 70 फीसदी अधि‍क है।  

 

वि‍ठलानी कहते हैं कि‍ चीनी मि‍लों को इंटरनेशनल मार्केट के हि‍साब से कॉम्पिटिटीव बनाना होगा। गन्‍ने के साथ राजनीति जुड़ी हुई और जब तक इसे राजनीति से अलग नहीं कि‍या जाएगा तब तक कुछ ठोस नहीं हो पाएगा। बकाए का संकट हर साल ना खड़ा हो इसके लि‍ए हमें चीनी की कीमतों और गन्‍ने की कीमतों को लिंक करना होगा। 

 

3. भारतीय कि‍सान यूनि‍यन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता राकेश टि‍कैत के मुताबि‍क चीनी को दो हिस्सों में वर्गीकृत कर घरेलू और व्यापारिक उपयोग की चीनी के दाम अलग-अलग तय किए जाएं। घरेलू उपयोग में आने वाली चीनी का मूल्य 25 रुपए किलोग्राम एवं व्यापारिक चीनी (चॉकलेट, कोल्ड ड्रिंक, मिठाई आदि) के उपयोग के दाम 100 रुपए प्रति किलोग्राम तय किए जाएं। उनका कहना है कि‍ देश में एथेनॉल को बढ़ावा दिया जाए। पेट्रोलियम में 25 प्रतिशत तक एथेनॉल ब्लैन्डिंग की जाए। 


टि‍कैत के मुताबि‍क, सरकार को चीनी के निर्यात पर सब्सिडी देनी चाहि‍ए और देश में शुगर केन फंड की स्थापना की जाए। गन्ना दिये जाने के 24 घण्टे बाद इस फंड से किसानों का भुगतान किया जाए। समय पर भुगतान न करने वाली शुगर मिलों से ब्याज वसूला जाए। वहीं चीनी आयात पर शत-प्रतिशत आयात ड्यूटी लगाई जाए एवं आयात रोकने हेतु मात्रात्मक प्रतिबन्ध भी लागू किए जाएं।

 

4. एग्री बि‍जनेस एक्‍सपर्ट वि‍जय सरदाना कहते हैं कि सरकार को इथनॉल प्रोडक्‍शन पर ज्‍यादा से ज्‍यादा फोकस करना चाहि‍ए। पेट्रोल में 20 परसेंट की इथनॉल ब्लेडिंग को अनिवार्य कर दिया जाए। इथनॉल मिक्‍सिंग की बदौलत हम कम से कम 1 लाख करोड़ रुपए ऑयल इम्‍पोर्ट में हम बचा सकते हैं। इसका एक हिस्‍से का इस्‍तेमाल किसानों के वेलफेयर में किया जा सकता है। 
सरदाना के मुताबि‍क, देश की सभी पेट्रोलियम कंपनियां सार्वजनिक हैं।

 

अगर प्राइवेट मिलों में किसी तरह का इश्‍यू है तो ये कंपनियां इथनॉल प्रोडक्‍शन के लिए उनमें स्‍टेक ले सकती हैं। यह समाधान उपलब्‍ध है और आसानी से लागू भी हो सकता है मगर इससे राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। इसीलिए सरकार इसे लागू नहीं करती।

 

prev
next
मनी भास्कर पर पढ़िए बिज़नेस से जुड़ी ताज़ा खबरें Business News in Hindi और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट