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20% तक बढ़ी लखनवी चिकन गारमेंट की डिमांड, मैन्‍युफैक्‍चरिंग घटने से कीमतों में इजाफा

इस साल लखनवी चिकन गारमेंट्स की डिमांड में पिछले साल के मुकाबले 20 फीसदी तक की तेजी दिख रही है।

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नई दिल्‍ली. गर्मियों का सीजन धीरे-धीरे पीक पर पहुंच रहा है। इसी के साथ ही लखनऊ के दुनियाभर में मशहूर चिकन गारमेंट्स के बिजनेस में भी तेजी आ रही है। मैन्‍युफैक्‍चरर्स का कहना है कि इस साल लखनवी चिकन गारमेंट्स की डिमांड में पिछले साल के मुकाबले 20 फीसदी तक की तेजी दिख रही है। हालांकि डिमांड के हिसाब से कारोबारी प्रोडक्‍ट की सप्‍लाई नहीं कर पा रहे हैं। कुछ कारोबारियों का कहना है कि इसकी एक वजह जीएसटी के प्रोसिजर्स के चलते मैन्‍युफैक्‍चरिंग में आई कमी है। 

 

लखनऊ चिकन हाउस के ओनर मनन शर्मा ने moneybhaskar.com को बताया कि लखनवी चिकन गारमेंट की डिमांड में इस साल पिछले साल के मुकाबले 15-20 फीसदी का इजाफा है। हालांकि सप्‍लाई की रफ्तार थोड़ी धीमी है लेकिन बिजनेस अच्‍छा जाने की उम्‍मीद है। क्‍योंकि चिकन गारमेंट्स को गर्मियों के लिहाज से अच्‍छा माना जाता है, इसलिए इसकी डिमांड में हर साल इजाफा होता है। 

 

अच्‍छे काम के मिलते हैं अच्‍छे दाम 

मनन के मुताबिक, आज से कुछ साल पहले बिजनेस इतना सही नहीं था। लेकिन अब अच्‍छे काम की कद्र होने और अच्‍छे दाम मिलने के चलते बिजनेस बेहतर हुआ है। लोगों को हल्‍की और हैवी कारीगरी का फर्क समझ आने लगा है, जिससे वे अच्‍छी कारीगरी की कीमत देने में हिचकते नहीं हैं। उन्‍हें क्‍वालिटी वर्क चाहिए। इससे कारीगरों को भी फायदा हो रहा है। 

 

लगभग 400-500 करोड़ रु. की इंडस्‍ट्री 

पूरे लखनऊ में चिकनकारी का बिजनेस कितना बड़ा है, इसका कोई तय आंकड़ा तो नहीं है लेकिन इसके लगभग 400-500 करोड़ रुपए के होने का अनुमान है। यहां इस तरह के गारमेंट्स के मैन्‍युफैक्‍चरर्स की संख्‍या लगभग 1500 से 2000 है। इनमें से कइयों का सालाना कारोबार 1.5 करोड़ से 2 करोड़ के बीच है। 

 

मैन्‍युफैक्‍चरिंग कम होने से 150 रु तक बढ़ गई है कीमत 

लखनऊ के हैरीटेज चिकन में सेल्‍स मैनेजर प्रियम वाजपेयी ने बताया कि जीएसटी के तहत छोटी-छोटी चीजों के रिकॉर्ड मेंटेन करने पड़ रहे हैं, जिसके चलते मैन्‍युफैक्‍चरिंग प्रभावित हो रही है। डिमांड के मुताबिक सप्‍लाई नहीं हो पा रही है, जिसके चलते रेट बढ़ रहे हैं। प्रोडक्‍ट 100 से 150 रुपए तक महंगा हो रहा है। हालांकि धीरे-धीरे हालात में सुधार आ रहा है। 

 

यूरोप, ऑस्‍ट्रेलिया, अमेरिका आदि देशों में हो रहा एक्‍सपोर्ट 

लखनवी चिकन गारमेंट्स की डिमांड केवल भारत में ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी है। यूरोप, ऑस्‍ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा आदि देशों में इसका एक्‍सपोर्ट होता है। टोटल प्रोडक्‍शन का लगभग 10-15 फीसदी एक्‍सपोर्ट हो जाता है। एक्‍सपोर्ट होने वाले प्रोडक्‍ट की क्‍वालिटी और उसका वर्क बहुत ही अलग और बारीक होता है। बाहर जाने वाले चिकन गारमेंट्स का कपड़ा मलमल होता है। मनन का यह भी कहना है कि उसकी कीमत भी बहुत ज्‍यादा होती है। भारत में ज्‍यादातर कॉटन या जॉर्जेट पंसद किया जाता है लेकिन बाहर के देशों में इसके अलावा भी अन्‍य तरह के फैब्रिक्‍स के बने चिकन गारमेंट्स की काफी डिमांड है। एक्‍सपोर्ट होने वाले प्रोडक्‍ट्स में प्‍योर चिकन कारीगरी के साथ फ्यूजन भी शामिल होता है।   

 

2 लाख रु तक भी जाती है कीमत 

चिकनकारी वाले गारमेंट्स की कीमत 100-150 रुपए से लेकर लाख- 2 लाख तक भी कीमत जाती है। इनमें सबसे महंगे आइटम लंहगे हो जाते हैं क्‍योंकि उनमें जरदोजी और आरी का काम भी शामिल हो जाता है। साथ ही गारमेंट्स पर जैसा वर्क यानी कढ़ाई होती है कीमत उसी हिसाब से बढ़ती चली जाती है। चिकनकारी में कुर्ती, साड़ी, लहंगा, दुपट्टा, रेडीमेड सलवार सूट, सूट का कपड़ा, मेन्‍स कुर्ते, शेरवानी, कुशन कवर, टेबल कवर आदि कई तरह की चीजें बनती हैं। साडियों की कीमत 30-40 हजार तक जाती है। 

 

जनवरी-फरवरी में ही आ जाते हैं ऑर्डर 

लखनवी चिकन घर के ओनर विनोद खन्‍ना ने बताया कि चिकन के गारमेंट्स के लिए होलसेलर्स के पास ऑर्डर्स जनवरी-फरवरी में ही आ जाते हैं। गारमेंट्स और प्रोडक्‍ट तैयार करने के लिए पहले कपड़े पर डिजाइन की छपाई नील से होती है। रेडीमेड गारमेंट के मामले में पहले कपड़े से प्रोडक्‍ट जैसे कुर्ती, साड़ी बना लिए जाते हैं, उसके बाद उस पर डिजाइन छापी जाती है। फिर उसे चिकन की कढ़ाई के लिए दिया जाता है। 

 

पूरी तरह से हाथ से होती है कढ़ाई 

कढ़ाई का काम लखनऊ में घर-घर में होता है। चिकन की कढ़ाई केवल हाथ से की जाती है। पूरा प्रोडक्‍ट तैयार होने में मिनिमम 1 महीने से लेकर 5- 6 महीने तक का वक्‍त लगता है, जो कढ़ाई के पैटर्न पर निर्भर करता है। इसके बाद इसकी सप्‍लाई शुरू होती है। देश में सबसे महंगा जॉर्जेट का प्रोडक्‍ट बिकता है। 

 

आगे पढ़ें- पूरे साल बिजनेस 

पूरे साल होता रहता है बिजनेस 

विनोद ने बताया कि चिकनकारी वाले गारमेंट का बिजनेस चलता तो पूरे साल है लेकिन पीक पर गर्मियों में रहता है। जहां गर्मियों का सीजन केवल तीन महीने का होता है, वहां से तीन महीने बाद बिजनेस हल्‍का हो जाता है लेकिन जहां पूरे साल गर्मी रहती है जैसे मुंबई, बेंगलुरु, मद्रास जैसी जगहों से पूरे साल डिमांड रहती है। भारत में कोई राज्‍य ऐसा नहीं है, जहां से इसकी डिमांड न आती हो। 

 

आगे पढ़ें- मुगलकाल में शुरू हुई थी ये कारीगरी

नूरजहां ने किया था ईजाद 

लखनऊ में चिकनकारी का काम करने वाले मिर्जा जावेद ने बताया कि चिकनकारी मुगलकाल से चली आ रही है। ऐसा कहा जाता है कि इसे नूरजहां ने शुरू किया था और सबसे पहले टोपी पर यह कारीगरी की गई थी। धीरे-धीरे यह नवाबों का शौक बन गई। चिकनकारी कढ़ाई के स्टिचेस के बखिया, उल्‍टी बखिया, फंदा बखिया, मुर्री बखिया, जाली, आदि नाम होते हैं। इसके अलावा कुछ क‍ढ़ाई के भी नाम हैं जैसे- बिजली, कंजन, घास-पत्ती, चना पत्‍ती, कील आदि। 

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