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इन महिलाओं ने अपनी काबिलियत से कर लिया करोड़ों का कारोबार

Women's Entrepreneurship Day पर पढ़िए महिला उद्यमियों की सफलता की दास्तां

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नई दिल्ली. आज के दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में अपना नाम रौशन कर रही हैं। अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रही हैं। अब लड़कियां न सिर्फ टीचर, डॉक्टर, पायलट, इंजीनियर बन रही हैं, बल्कि बिजनेस की तरफ भी रुख कर रही हैं। अपनी नौकरियां छोड़कर सफल व्यापर खड़ा कर रही हैं। आज Women's Entrepreneurship Day पर हम आपको बता रहे हैं ऐसी महिलाओं की सफलता की दास्तां जिन्होंने तमाम चुनौतियों का सामना करके अपने दम पर न सिर्फ बिजनेस खड़ा किया बल्कि लोगों के लिए मिसाल भी बनीं। इन महिलाओं ने ये साबित किया कि अगर कुछ करने की ठान ली जाए तो इंसान अपनी जिंदगी बदल सकता है। 

 

श्रेया  मिश्रा ने तीन साल में खड़ी कर दी 155 करोड़ रुपए की कंपनी 

महिलाओं को पार्टीज में कपड़े रिपीट करना पसंद नहीं होता। बस इसी बात से मिले आइडिया के दम पर आईआईआईटी ग्रेजुएट श्रेया मिश्रा ने महज तीन साल के भीतर 155 करोड़ रुपए की कंपनी खड़ी कर दी । उनकी कंपनी फ्लाईरोब फैशन क्लोद्स ऑनलाइन किराये पर देती है। उनकी कंपनी को हाल में लगभग 26 करोड़ रुपए की फंडिंग हासिल हुई है। श्रेया ने साल 2012 में आईआईटी मुंबई से मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने के बाद बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप में नौकरी शुरू की। उसी दौरान श्रेया ने  स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के एन्टरप्रेन्योर समिट में हिस्सा लिया। इसी समित के दौरान उनके दिमाग में ऑनलाइन वार्डरोब तैयार करने का आईडिया आया, जहां महिलाएं बिना खरीदे रोजाना फैशनेबल कपड़ों का इस्तेमाल कर सकती हैं। बिजनेस शुरू करने से पहले उन्होंने 200 महिलाओं पर सर्वे किया। उसमें से 80 फीसदी महिलाओं ने पॉजिटिव जवाब दिया। इसके बाद उन्होंने प्रणय सुराना और तुषार सक्सेना दस साथ इस ऑनलाइन कंपनी को शुरू किया।

 

 

 75,000 से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं ऐप

फ्लाईरोब ने डिजाइनर लेबल आउट हाउस, मसाबा गुप्ता, रितु कुमार और शेला खान जैसे डिजाइनर के साथ टाईअप किया है। इन डिजाइनर के कपड़े फ्लाईरोब पर किराए में मिलते हैं। प्लेटफॉर्म पर वेस्टर्न वेयर, एथनिक, गाउन, लहंगा, ब्राइडल जैसे सभी कपड़े किराए पर मिलते हैं। प्लेस्टोर में कस्टमर्स ने इस एप को 4.3 स्टार्स की रेटिंग दी है। अभी तक उनके ऐप को 75,000 से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं। फ्लाईरोब ने अभी 53 लाख डॉलर का फंड जुटाया है।

 

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कुर्तियां बेचकर खड़ा किया 200 करोड़ का कारोबार

 

जब उनके बच्चे बड़े हो गए और हायर एजुकेशन के लिए बाहर चले गए तो दिल्ली की शीतल कपूर ने खुद को व्यस्त रखने के लिए 2009 में पति के बिजनेस में हाथ बटाना शुरु किया। उनके पति की कंपनी दूसरे ब्रांड के लिए कपड़े बनाती थी। तब उन्हें अपना क्लोदिंग ब्रांड शुरू करने का ख्याल आया। उनका मानना था कि कपड़े ऐसे होने चाहिए, जो आसानी से बजट में फिट हो जाएं, उनकी क्वॉलिटी बढ़िया हो और उनकी ड्राईक्लीन न करानी पड़े।

 

दुनिया को भायी श्री की कुर्तियां 

इसी सोच के साथ उन्होंने अपने लेबल श्री के तहत अफोर्डेबल दामों पर कुर्तियां बेचना शुरू किया। तब उन्हें कंप्यूटर चलाना भी नहीं आता था। ऑनलाइन बिजनेस के लिए उन्होंने कंप्यूटर सीखा और इस बिजनेस के लिए खुद को तैयार किया। उनके ब्रांड की पहली कुर्ती सिर्फ 450 रुपए में बिकी थी। आज देशभर में उनके 45 स्टोर खुल चुके है और उनकी कंपनी की ग्रॉस मर्चेन्डाइज वैल्यू 200 करोड़ रुपए हो गई है। यह कंपनी वे अपने पति संदीप कपूर के साथ मिलकर चलती हैं।

 

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अमेरिकी नौकरी छोड़ भारत में शुरू किया डिजिटल प्लेटफार्म मोबिक्विक

 

मूलरुप से कश्मीर की रहने वाली उपासना टाकू जालंधर एनआईटी से इंजीनियरिंग करने के बाद अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने गई। वहां डिजिटल वॉलेट पेपाल में नौकरी लगी और ग्रीनकार्ड भी मिल गया। 2006-08 में पेपाल की तरफ से स्पेन, जर्मनी जैसे कई देशों में डिजिटल वॉलेट लॉन्च किया। तब उन्हें लगा कि अब बहुत कुछ सीख लिया है, अब इसका इस्तेमाल अपने देश में करना चाहिए। उन्होंने इंडिया आने का मन बनाया और कंपनी में इस्तीफा दे दिया। माता पिता ने इस फैसले का विरोध किया और 2-3 महीने बातचीत नहीं की। इसके बावजूद 2008 में वे इंडिया लौट आई।

 

लोगों की सुविधा के लिए शुरू किया मोबिक्विक 

2008 में भारत लौटकर उन्होंने देखा कि मोबाइल का बिल पे करने के लिए दुकान में जाना पड़ता है। अलग-अलग बिल पे करने के लिए अलग-अलग साइट पर जाना पड़ता था। यहीं से आइडिया आया कि कोई ऐसा वॉलेट प्लेटफार्म क्यों नहीं बनाया जाए जिसके माध्यम से सारे पेमेंट चुटकी में हो जाएं। इसके बाद 2009 में मोबिक्विक लॉन्च किया। आज 10.7 करोड़ लोग मोबीक्विक यूज करते हैं। कंपनी की रेवेन्यू सालाना 3 से 4 गुना बढ़ रहा है।

 

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गरीबी से लड़कर अमेरिका में खड़ी कर दी 100 करोड़ कंपनी

 

अमेरिका के फीनिक्स स्थित सॉफ‌्टवेयर सॉल्यूशन इंक की सीईओ ज्योति रेड्डी का जन्म 1970 में तेलंगाना के एक बेहद गरीब परिवार में हुआ। ज्योति के परिवार में माता-पिता के अलावा 4 और बहनें थीं, जिनमें ज्योति सबसे छोटी थीं। परिवार में पैसे की कमी के कारण ज्योति की पढ़ाई लिखाई नहीं हो सकती थी, इसलिए उसे अनाथालय में रहना पड़ा। अनाथालय के बाद केवल 16 साल की उम्र में ज्योति की शादी करा दी गई। शादी के दो साल में ही ज्योति के दो बच्चे हो गए। बच्चों की परवरिश करने के लिए ज्योति ने नौकरी ढूंढी। लेकिन नौकरी नहीं मिलने की वजह से घर के पास एक खेत में 5 रुपए की मजदूरी पर काम करना शुरू कर दिया। कहीं से जानकारी मिलने के बाद ज्योति नेहरू युवा केंद्र से जुड़ीं। यहां आकर ज्योति ने फिर से अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना शुरू और टाइपिंग भी सीख ली। इसके बाद एक स्कूल में पढ़ाना शुरू किया, जहां उन्हें 398 रुपए महीने के मिलने लगे। ज्योति को घर से स्कूल जाने में करीब 2 घंटे लगते थे। आने-जाने में लगने वाले 4 घंटों का सही इस्तेमाल करने के लिए ज्योति साड़ियां बेचने लगी।

 

अमेरिका जाकर बदली किस्मत 

इस दौरान अमेरिका में रहने वाले उनके कजिन ने उन्हें अमेरिका चलने का ऑफर दिया। जयति इसके लिए राज़ी हो गई और अपने दोनों बच्चों को मिशनरी स्कूल में डाल अमेरिका चली गई। अमेरिका आने के बाद ज्योति ने अलग-अलग तरह के करीब 1 दर्जन जॉब किए। इस दौरान ज्योति अपने वीजा के काम को लेकर अक्सर वीजा दफ्तर और कोर्ट जाने लगी। वहां ज्योति ने देखा कि वीजा प्रोसेसिंग कराने के लिए लोग मुंह मांगा पैसा देने को तैयार रहते थे। ज्योति ने वीजा कंसल्टिंग का काम शुरू किया। धीरे-धीरे ज्योति का यह काम चल निकला, तो ज्योति ने वीजा मामले में कंसल्टिंग देने के लिए एक सॉफ्टवेयर बनाया और इसे कंपनी में तब्दील किया। ज्योति की बनाई इस कंपनी सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस की रिलायंस समेत कई बड़ी कंपनी क्लाइंट हैं। उनकी कंपनी की वैल्यू 100 करोड़ रुपए से भी ज्यादा है। 

 

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पूजा महाजन बन गई मोमोज वाली मैडम, शुरू की फूड प्रोसेसिंग कंपनी

 

कुछ साल पहले तक कॉरपोरेट इंडस्ट्री में काम करने वाली पूजा महाजन आज Unitas Foods की डायरेक्टर हैं और Yum! Yum! Dimsums नाम से उनके मोमोज और अन्य प्रोडक्ट्स देशभर में खरीदे जाते हैं। महीने भर में उनकी फ्रैक्ट्री में 10 से 12 लाख मोमोज बनाए जाते हैं और वह अपने घर की पहली महिला कारोबारी हैं। 1998 में उन्होंने कॉरपोरेट वर्ल्ड में काम करना शुरु किया। कई बड़ी कंपनियों से जुड़ी। जॉब करते वक्त लगा कि खुद का बिजनेस करना चाहिए।

 

रोजाना बनती हैं 30-35 हजार मोमोज 

2004 में अपनी जॉब छोड़कर गुड़गांव के डीएलएफ मॉल में बॉम्बे चौपाटी नाम से रेस्त्रां शुरू किया। अपनी इनकम को बढ़ाने के लिए उन्होंने ट्रॉली बिजनेस में इंवेस्ट किया। यह बॉम्बे का एक ब्रांड था सिड फ्रैंकी। यह बिजनेस बहुत अच्छा चल निकला। इसको देखकर उन्होंने मोमोज की ट्रॉली शुरू की। उस समय मार्केट में मोमोज की सप्लाई करने के लिए कोई भी आॅर्गेनाइज्ड प्लेयर नहीं था। तब उन्होंने 2008 में दिल्ली के घिटोरनी में माेमोज बनाने की फ्रैक्ट्री शुरू की। इसके लिए उन्हें सरकार की तरफ से लोन मिला और उन्होंने और ताइवान से मोमोज बनाने की मशीन इंपोर्ट की। इसके बाद कोल्ड रूम लगवाए। प्लांट में दिन के लाखों हजारों पीस बनते हैं जो ऑल इंडिया शिप होते हैं। देश के बड़े-बड़े सिनेमा हॉल, मल्टीप्लेक्सेस, होटल, बैक्विंट, केटरर्स, रेस्त्रां, कॉफी चेन में उनकी फैक्ट्री के मोमोज भेजे जाते हैं।

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