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ऑर्गेनिक दीयों से दिव्यांग बच्चों की जिंदगी में कर रही है रोशनी, छोड़ दी एम्स की नौकरी

1992 में रखी Society for Child Development की नींव, आज संवार रहीं सैंकड़ों लोगों की जिंदगी

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नई दिल्ली। मधुमिता पुरी दिल्ली स्थित एम्स के जेनेटिक यूनिट में मनोवैज्ञानिक के तौर पर अच्छी खासी नौकरी कर रही थीं। फिर एक दिन उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी आैर ऐसे बच्चों की जिंदगी संवारने में जुट गईं, जिन्हें समाज कमतर समझता था। बात है 1992 की जब उन्होंने मानसिक रूप से अस्वस्थ बच्चों के लिए गैर-सरकारी संस्थान सोसाइटी फॉर चाइल्ड डेवलपमेंट (Society for Child Development) की स्थापना की। आज इस संस्था के तहत कई प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, जहां हर तरह के दिव्यांग बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद की जाती है। यहां बच्चों को रद्दी चीजों को रिसाइकिल करके उपयोगी सामान बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है। दिवाली के मौके पर बच्चे व अन्य दिव्यांग सदस्य ऑर्गेनिक दीये, तोरण, रंगोली के रंग और भी बहुत कुछ बनाते हैं जिन्हें संस्था बेचती है। अब मधुमिता पुरी की उम्र 62 साल हो गई है, लेकिन आज भी वे पहले ही जैसे जज्बे और लगन के साथ जरूरतमंदों की जिंदगी को रौशन कर रही हैं। अपनी संस्था और लोगों की जिंदगी संवारने वाले प्रोजेक्ट्स के बारे में उन्होंने मनी भास्कर को बताया। पेश हैं बातचीत के कुछ अंश :

 

कैसे की शुरुअात?

जब मैं एम्स में काम करती थी, तो वहां गर्भ में बच्चों का सही से विकास नहीं होने से संबंधित कई केस आते थे। जब ऐसे बच्चे पैदा होते थे तो उनमें कोई शारीरिक या मानसिक कमी रह जाती थी। ऐसे बच्चों काे अस्पताल लाया जाता था। हालांकि ऐसे बच्चे आसानी से ठीक नहीं होते हैं। ऐसे में मुझे लगा कि मानसिक रूप से कमजोर बच्चों को एक नॉर्मल जिंदगी देने के लिए कुछ काम करना चाहिए। तब मैंने एम्स की नौकरी छोड़कर इन बच्चों के लिए नॉर्थ दिल्ली में प्रभात नाम से एक स्कूल शुरू किया।

 

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कमी पूरी करना है उद्देश्य

वहां कोई सुविधा नहीं थी। वहां लेबर और वर्किंग क्लास ज्यादा थी। उनमें से ज्यादातर लोग एेसे थेजो खुद तो पढ़े-लिखे नहीं थे। हालांकि वे पढ़ाई-लिखाई की अहमियत समझते थे। हमारा उद्देश्य था कि दिव्यांग चाहे बच्चा हो या बड़ा, सभी को हर जरूरी सुविधा उपलब्ध कराई जाए। इसीलिए बच्चों काे ट्रेनिंग देने की शुरुआत की।

 

क्यों चुना रिसाइकिलिंग का काम?

शुरुआत में पैसों की कमी की वजह से हमने रिसाइकिलिंग का काम चुना। हमने लोगों द्वारा फेंके गए सामान से नई चीजें बनाना शुरू किया। सबसे पहले हैंडीक्राफ्ट का काम सीखा और फिर रिसाइकिलिंग का काम शुरू किया।

 

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दीवाली के दीये सजाते हैं बच्चे

हमने सबसे पहले मंदिरों से फूल इकट्ठे किए और उनसे होली के रंगअगरबत्तियांनेचुरल डाई और अन्य बहुत सारी चीजें बनाना शुरू किया। दिवाली के मौके पर बहुत दीये बनाना का काम शुरू किया। हम इसमें कुम्हारों को जोड़ते हैं। कुम्हार हमारे लिए दीये बनाते हैं और हमारे लोग उन पर रंग करते हैं और उनमें मोमबत्तियां भरते हैंउन्हें सजाते हैं और बाजार में बेचने लायक तैयार करते हैं। बच्चे खुशी-खुशी ये काम करते हैं।

 

बनाते हैं ऑर्गेनिक दीये 

अब हम पेपरमैशे के सामान बनाते हैं। मधुबनी चित्रकला का काम शुरू किया। इसमें बहुत सारे डिजायनर हाउसेस हमारे साथ जुड़े। यहां बच्चे पेपरमैशे से दीये बनाते हैं। इसमें ढेर सारे अखबारों को पानी में गलाकर उनसे तरह की चीजें बनाई जाती हैं। बच्चे बहुत सुंदर दीये बनाते हैं जिन्हें हम सेल में बेचते हैं। एक छोटे ऑर्गेनिक दीये का दाम 15 रुपए और शो पीस की तरह लगाए जाने वाले बड़े दीए का दाम 150 रुपए है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम इन बच्चों को पैसो के लिए इंतजार नहीं करवाते हैं। जैसे ही वे दीये बनाकर देते हैंहम उन्हें पैसे दे देते हैं और उसके बाद उनकी सेल करते हैं।

 

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कई शहरों में काम करती है संस्था

इस संस्था के लोग वाराणसीपुणेहोशंगाबादकर्नाटक के कुछ शहरों अौर अजमेर में भी यह काम कर रहे हैं। इन शहरों में कई कंपनियाें और एनजीओ की मदद से दिव्यांगों को उनके पैरों पर खड़े होने की ट्रेनिंग दी जाती है।

 

आप भी खरीद सकते हैं ऑर्गेनिक दीये

अगर आप भी दिवाली के लिए ऑर्गेनिक दीये और तोरणरंगोली की डिजायन भी खरीदना चाहते हैं तो दिल्ली में शक्ति नगर में रोशनारा क्लब के पीछे संस्था के कार्यालय से खरीद सकते हैं। 

 
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